अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा… 12

जड़-चेतन में है ईश्वर का अंश

हम दूसरे को सम्मान देंगे, तभी हमको सम्मान मिलेगा। हम चाहे जितने बड़े पद पर हों या समृद्ध हों लेकिन यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे को भी सम्मान प्रिय है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना करने से पहले इसीलिए सभी जड़-चेतन को सम्मान देते हुए कहा
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि
बंदउं सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब
बंदउं किन्नर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब।
अर्थात जगत में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सभी को प्रभु राम के समान जानकर उन सबके चरण कमलों की दोनों हाथ जोड़कर वंदना करता हंू। देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर और निशाचर सबको मैं प्रणाम करता हूं। अब सब मुझ पर कृपा कीजिए।
आकर चारि लाख चैरासी, जाति जीव जल थल नभबासी
सीय राममय सब जग जानी, करउं प्रनाम जोरि जुग पानी
जानि कृपा कर किंकर मोहू, सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू
निज बुधिबल भरोस मोहि नाहीं, ताते विनय करउं सब पाहीं।
अर्थात चैरासी लाख योनियों में चार प्रकार के जीव जल, पृथ्वी और आकाश में रहते हैं। ये चार प्रकार के जीव स्वेदज (गर्भ से पैदा होने वाले) अण्डज (अण्डे से पैदा होने वाले) उद्भिज्ज और जरायुज होते हैं जो भिन्न-भिन्न तरह से उत्पन्न होते हैं। इस सबसे भरे हुए सारे जगत को श्री सीता राममय जानकर में दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं।
जानि कृपा कर किंकर मोहू, सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू
निज बुधिबल भरोस मोहि नाहीं, ताते विनय करउं सब पाहीं
अर्थात आप सभी मुझको अपना दास (सेवक) समझकर हर प्रकार का छल-कपट छोड़कर कृपा कीजिए क्योंकि मुझे अपने बुद्धि बल का भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूं।
करन चहउं रघुपति गुनगाहा, लघुमति मोरि चरित अवगाहा
सूझ न एकउ अंग उपाऊ, मन मति रंक मनोरथ राऊ
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सभी चराचर की कृपा इसलिए चाहता हूं क्योंकि मैं एक बहुत बड़ा काम भगवान रामचन्द्र जी का गुणगान करना चाहता हूं परंतु मेरी बुद्धि बहुत छोटी है और श्री रामजी का चरित्र अथाह है। इसके लिए मुझे उपाय का एक अंग अर्थात एक अंश भी पता नहीं है, मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं और मेरा मनोरथ अर्थात मन की इच्छा राजा के समान है।
मति अति नीच ऊंचि रुचि आछी, चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई, सुनि हहिं बाल बचन मन लाई
जौं बालक कह तोतरि बाता, सुनहिं मुदित मन पितु अरू माता
हंसिहहिं क्रूर कुटिल कुविचारी, जे पर दूषन भूषन
धारी
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मेरी बुद्धि तो अत्यंत नीची है और चाह बड़ी ऊंची है। चाह तो अमृत पाने की है लेकिन जगत में जुड़ती छांछ भी नहीं है। इसलिए सज्जन मेरी इस ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बाल व चनों को मन लगाकर अर्थात प्रेमपूर्वक सुनेंगे। ठीक उसी तरह से जैसे बालक जब तोतले शब्द बोलता है तो उसके माता-पिता उन्हें प्रसन्न मन से सुनते हैं लेकिन क्रूर, कुटिल और बुरे विचार वाले लोग जो दूसरे के दोषों को ही आभूषण की तरह धारण किये रहते हैं, वे हमारे इस काव्य को सुनकर हंसेंगे।
निज कवित्त केहि लाग न नीका, सरस होउ अथवा अति फीका
जे पर भनित सुनत हरषाहीं, ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।
जग बहु नर सर सरि सम भाई, जो निज बढ़ि बढ़हिं जल पाई
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई, देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।
यहां पर गोस्वामी तुलसीदास ने लोगों के सामान्य व्यवहार के बारे में बताने का प्रयास किया है। उन्होंने यह तो कहा कि सभी को सम्मान देना चाहिए तभी आपको भी सम्मान मिलेगा लेकिन कुछ लोग स्वभावगत ही दुष्ट होते हैं उनको दूसरे की कमियां ही दिखाई पड़ती हैं, इसलिए ऐसे लोगों की ज्यादा परवाह करने की भी जरूरत नहीं है। अपनी कविता तो सभी को अच्छी लगती है चाहे वह रसीली हो या फीकी लेकिन दूसरे की रचना को सुनकर जो लोग हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगत में बहुत कम हैं। इसका उदाहरण देते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने कहा कि जगत में तालाब और नदियांे की भांति ही मनुष्य अधिक हैं जो जल पाकर ही अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं अर्थात अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं लेकिन समुद्र जैसा कोई बिरला (बहुत कम) ही सज्जन होता है जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर उमड़ पड़ता है अर्थात दूसरे की उन्नति देखकर खुश होता है। इसलिए-
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउं एक विस्वास।
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास।
मेरा भाग्य छोटा है अथवा मेरा अंश (आकार) बहुत छोटा है लेकिन इच्छा बहुत बड़ी है, जड़-चेतन गुण दोष मय है, दूसरे की उन्नति देखकर खुश होने वाले मुट्ठी भर लोग हैं परंतु एक विश्वास है कि इस रामचरित मानस को सुनकर सभी सज्जन सुख पाएंगे और दुष्ट लोग हंसी उड़ाएंगे। गोस्वामी तुलसीदास मानते हैं कि इस परिस्थिति से बचना असंभव है। यह प्रसंग हम सभी के लिए प्रेरणादायक हैं। हम कोई काम करते हैं तो आलोचना करने वाले ज्यादा मिल जाते हैं, तारीफ करने वाले और प्रोत्साहित करने वाले कम मिलते हैं। आलोचना के डर से कुछ लोग अच्छा काम भी रोक देते हैं। धैर्यवान लोग किसी कार्य को तुच्छ नहीं समझते। व्यापार जगत में आज जिनका नाम बड़े गर्व से लिया जाता है उन्होंने भी शुरूआत बहुत छोटे काम से की थी। धीरू भाई अंबानी ने शुरूआत में पेट्रोल पम्प पर काम करने में भी शर्म नहीं महसूस की। आज उनके बेटे मुकेश अम्बानी देश के सबसे
धनाढ्य व्यापारी हैं। इसलिए आलोचना से कभी घबड़ाना नहीं चाहिए और किसी के प्रति असम्मान नहीं प्रकट करना चाहिए।-क्रमशः (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)

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