अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा… 9

दुष्टों से बनाए रखिए दूरी

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में देवताओं की वंदना, गुरु की महिमा और सत्संग के प्रभाव को बताते हुए दुष्ट लोगों से बचने का भी उपाय बताया है। दुष्ट लोग सब कहीं पाये जाते हैं और उनको चाहे जितना समझाओ लेकिन वे अपनी दुष्टता से बाज नहीं आते। हमारे पड़ोस में ही यदि कोई दुष्ट व्यक्ति रहता है तो हम क्या करेंगे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने पाकिस्तान को लेकर एक बार कहा था कि आप अपना पड़ोसी नहीं बदल सकते, तब दो ही रास्ते बचते हैं कि या तो अपना घर बदल दें या पड़ोसी को खुश रखने का प्रयास करें इसी तरह अच्छे और बुरे लोग होते हैं जो कहीं भी मिल सकते हैं और उनका स्वभाव दुष्टता है तो वह परेशान भी करेंगे इसलिए दुष्टों की भी गोस्वामी तुलसीदास ने वंदना की है-
बहुरि बंद खलगन सति भाएं, जे बिनु काम दाहिनेहु बाएं।
परहित हानि लाभ जिन्ह केरें, उजरे हरष, विषाद घनेरें।
हरिहर जस राकेस राहु से, पर अकाज भट सहस बाहु से।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी, परहित घृत जिन्ह के मन माखी।
तेज कृसानु रोष महिषेसा,
अघ अवगुन धन धनी धनेसा।
उदय केत सम हित सबही के, कुंभकरन सम सोवत नीके।
अर्थात अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूं जो बिना ही प्रयोजन अपना हित करने वाले के प्रति भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है, जिनको दूसरे के उजड़ने में खुशी और बसने से विषाद अर्थात दुख होता है। ऐसे दुष्ट दायें-बाएं मिल ही जाते हैं। इन दुष्टों को भगवान विष्णु और शंकर (हरिहर) के यश रूपी चन्द्रमा अच्छा नहीं लगता और यह चन्द्रमा जब पूर्णिमा जैसा हो जाता है तो ये दुष्ट राहु के समान आचरण करते हैं। चन्द्र ग्रहण के बारे में यह धारणा है कि समुद्र मंथन के समय जब अमृत निकला तो एक राक्षस ने भेष बदलकर देवताओं के बीच बैठकर अमृत पी लिया था। चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया तो भगवान विष्णु ने चक्र सुदर्शन से उसके दो टुकड़े कर दिये थे जो राहु और केतु के रूप में जाने जाते हैं। यही राहु पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा को ग्रसता है तो चन्द्र ग्रहण होता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान विष्णु और शंकर की कथा जब होती है तो ये दुष्ट राहु की तरह ही बाधा पहुंचाते हैं। दुष्ट लोग बुराई करने के मामले में सहस्त्रबाहु के समान हो जाते हैं और दूसरे के दोषों को हजार नेत्रों से देखते हैं। दूसरों के हित रूपी घृत अर्थात घी में मक्खी की तरह गिरकर उसे दूषित करने का प्रयास करते हैं। हालांकि घी में गिरकर मक्खी स्वयं मर जाती है लेकिन वह दूसरे को घी खाने नहीं देती। इस प्रकार दुष्ट लोग दूसरे के बने-बनाये काम को अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं। इस प्रकार के दुष्ट तेज अर्थात दूसरों को जलाने वाले ताप में आग के समान हैं, क्रोध करने में यमराज के समान हैं और अवगुण रूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं ऐसे दुष्टों की ताकत जब बढ़ जाती है तो वे केतु अर्थात पुच्छल तारे के समान हो जाते हैं। ऐसे दुष्ट यदि कुंभकर्ण की तरह सोते रहें, तब ही भलाई है।
गोस्वामी तुलसीदास ने दुष्टों के बारे में यह भी कहा है-
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं, जिमि हिमउपल कृषी दलि गरही।
बंदहुं खल जस सेष सरोषा, सहस वदन बरनइ परदोषा
पुनि प्रनवउं पृथुराज समाना, पर अघ सुनइ सहस दस काना।
बहुरि सक्रसम विनवउं तेही, संतत सुरानीक हित जे ही
वचन वज्र जेहि सदा पियारा, सहस नयन परदोष निहारा।
अर्थात दुष्ट लोग दूसरों के काम में बाधा डालने के लिए अपने शरीर की भी परवाह नहीं करते हैं जैसे ओले खेती का नाश करके खुद भी गल जाते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसे शेषनाग की तरह हजार मुख वाले दुष्टों को शेषनाग समझकर प्रणाम करता हंू जो दूसरों के दोषों को (कमियों को) हजार मुख से दूसरों को सुनाते हैं। इतना ही नहीं दुष्टों को राजा पृथु के समान जानकर भी प्रणाम किया है जो हजारों कानों से दूसरे के पापों को सुनते हैं। राजा पृथु ने तो भगवान का यश सुनने के लिए हजार कान मांगे थे। दुष्टों को इंद्र के समान मानकर भी गोस्वामी तुलसीदास ने वंदना की है। इन्द्र को मदिरा (शराब) बहुत प्रिय है और सुरानीक अर्थात देवताओं की सेना हितकारी हैं। ऐसे दुष्टों को कठोर वचन रूपी ब्रज सदा प्यारा लगता है और जो हजार आंखों से दूसरों के दोष देखते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि दुष्टों की कुछ आदत ही ऐसी होती है।
उदासीन अरिमीत हित सुनत जरहिं खलरीति।
जानि पानि जुगजोरि जन विनती करइ सप्रीति।
अर्थात दुष्टों की यह नीति है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र किसी का भी हित (कल्याण समृद्धि) देखकर जलते (ईष्र्या) हैं। यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह जन अर्थात गोस्वामी तुलसीदास प्रेमपूर्वक उनसे विनती करता है। इतनी विनय करने के बाद भी तुलसीदास कहते हैं-
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा, तिन्ह निजओर न लाउब भोरा।
बायस पलि अहिं अति अनुरागा, होहिं निरामिष कबहुं कि कागा।
मैंने अपनी ओर से विनती की है लेकिन वे (दुष्ट) अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे क्योंकि उनका यही स्वभाव है। कौओं (वायस) को बड़े प्रेम से पालिए लेकिन वे कभी भी मांस के त्यागी अर्थात निरामिष नहीं हो सकते। इसलिए अब मैं संत और असंत दोनों की वंदना करता हूं-
बंदउं संत असज्जन चरना,
दुख प्रद उभय बीच कछु वरना
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं, मिलत एक दुख दारुन देहीं।
उपजहिं एक संग जग माही, जलज जोंक जिमि गुन विलगाहीं
सुधा सुरासम साधु-असाधू, जनक एक जग जलधि अगाधू
भल अनभल निजनिज करतूती, लहत सुजस अपलोक विभूती
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू, गरल अनल कलिमल सर ब्याधू
गुन अवगुन जानत सब कोई, जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।
अर्थात संत और असंत दोनों की वंदना करता हूं। दोनों ही दुख देते हैं लेकिन इनमें कुछ अंतर कहा गया है। यह अंतर है कि एक अर्थात संत जब हमसे बिछड़ जाते हैं अर्थात दूर हो जाते हैं तो लगता है हमारे प्राण ही निकल गये और दूसरे असंत जब मिलते हैं तो दारुण अर्थात कठोर दुख देते हैं। दोनों संत और असंत जगत में एक साथ पैदा होते हैं पर एक साथ पैदा होने वाले कमल और जोंक की तरह उनका आचरण अलग-अलग होता है। कमल का पुष्प शरीर से स्पर्श करने पर सुखद अनुभूति देता है जबकि जोंक यदि शरीर से स्पर्श कर जाए तो रक्त चूसने लगती है। साधु अमृत के समान मृत्युरूपी संसार से उबारने वाला और दुष्ट मदिरा के समान मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाले होते हैं। दोनों को उत्पन्न करने वाला अगाध (गहरा) जल (समुद्र) ही है। समुद्र मंथन से अमृत और विष दोनों उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार भले और बुरे अपनी-अपनी करतूतों (करनी) के अनुसार सुन्दर यश और अपयश प्राप्त करते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि सुधा अर्थात अमृत, सुधाकर (चंद्रमा) सुरसरि (गंगानदी) साधु
और विष, आग, कलियुग के पापों को नाश करने वाली कर्मनाशा नदी, हिंसा करने वाला ब्याध इनके गुण-अवगुण सभी जानते हैं लेकिन जिसे जिसकी भावना होती है उसे वही अच्छा
लगता है। -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button