चीन पर किस हद तक भरोसा!

पिछले महीने ब्रिक्स शिखर बैठक में प्रतिभाग करने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आये थे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी अलग से बातचीत भी हुई थी। गलवान झड़प के बाद भारत आये शी जिनपिंग ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहा था ‘आइए, हम साथ मिलकर काम करें। दरअसल, अमेरिका की ढुलमुल टैरिफ नीति के चलते भारत के लिए चीन ही व्यापारिक रूप से बेहतर विकल्प है लेकिन भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे चीन की नीयत को लेकर संदेह जताते हैं। वह कहते हैं कि गलवान झड़प के बाद ही घटनाओं से यह साफ हो गया है कि चीन के साथ सीमा विवाद का कोई सैन्य समाधान संभव नहीं है। सीमा पर अशांति से व्यापार भी प्रभावित होगा। इसलिए चीन को साथ मिलकर काम करने से पहले सीमा पर भी स्थायी शांति का वादा करना होगा। भारत के अरुणाचल प्रदेश पर चीन की बदनीयती अभी खत्म नहीं हुई। वहां आज भी चीनी सैनिकों के साथ आमना-सामना चल रहा है। गत 22 अक्टूबर को ही आईटीबीपी के 65वें स्थापना दिवस पर महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने चीनी पीएलए सैनिकों के साथ आमने-सामने की झड़प में साहसी शौर्य कमांडो को बधाई दी थी।
भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा है कि गलवान झड़प के बाद की घटनाओं से यह साफ हो गया कि चीन के साथ सीमा विवाद का कोई सैन्य समाधान संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि इस घटना ने बातचीत और संवाद के जरिए इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिशों को नई गति जरूर दी है। नरवणे ने कहा कि चीन के साथ हमारी सीमा का मसला अभी सुलझा नहीं है। मैं जानबूझकर बाउंड्री (सीमा) शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि एक इंटरनेशनल बॉर्डर के विपरीत- जो स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है और जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त होती है- बाउंड्री की परिभाषा उतनी स्पष्ट नहीं होती। उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में सीमा को लेकर असहमति है, वहां झड़पें जारी रहेंगी। उन्होंने गलवान की झड़प को ऐसी ही एक घटना का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा, जहां भी असहमति वाले ऐसे इलाके हैं, वहां हमारी झड़पें होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। पूर्व आर्मी चीफ ने कहा, गलवान की झड़प इस तरह की घटनाओं का एक और उदाहरण थी। हालांकि, अहम बात यह है कि गलवान के बाद की घटनाओं ने साफ कर दिया है कि चीन के मामले में, सीमा विवाद का सैन्य समाधान अब कोई विकल्प नहीं है।
नरवणे ने यह भी कहा कि सीमाओं को बदलने के लिए एकतरफा तरीके से बल प्रयोग करने के मुद्दे पर भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, हमने साफ कर दिया है कि सीमाओं को बदलने के लिए एकतरफा बल प्रयोग करना स्वीकार्य नहीं है। नरवणे के अनुसार, इस रुख से एक बदलाव आया है और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिशों को नई गति मिली है।
उन्होंने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की व्यवस्था के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, यही वजह है कि दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। नरवणे ने कहा कि गलवान झड़प के बाद हुई घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति को और मजबूत किया है। उन्होंने कहा, गलवान से जो सबसे बड़ा सबक मिला है, वह यह है कि भारत ने विश्व मंच पर अपनी साख को काफी मजबूत किया है- चाहे वह सैन्य, राजनयिक या राजनीतिक स्तर पर हो।
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प भारत-चीन संबंधों में एक बड़ा मोड़ साबित हुई। इस टकराव में दोनों पक्षों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा। इस घटना के कारण पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक सैन्य गतिरोध बना रहा, जिसमें दोनों देशों ने एलएसी के पास अपने सैनिक और सैन्य उपकरण तैनात कर दिए। इसके बाद, भारत और चीन ने सीमा पर गतिरोध को सुलझाने और टकराव वाले बिंदुओं से सैनिकों को पीछे हटाने के लिए कई दौर की सैन्य और राजनयिक बातचीत की। अक्टूबर 2024 में, दोनों देश पूर्वी लद्दाख के डेपसांग और डेमचोक इलाकों में गश्त की व्यवस्था पर एक समझौते पर पहुंचे। इससे 2020 के गतिरोध से जुड़े बाकी टकराव वाले बिंदुओं से भी सैनिकों को पीछे हटाने में मदद मिली। यह समझौता तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, हालांकि इससे सीमा से जुड़ा बड़ा विवाद हल नहीं हुआ। तब से दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिशें जारी हैं। अगस्त 2025 में, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक द्विपक्षीय बैठक हुई। इस दौरान दोनों पक्षों ने अपने मतभेदों को संभालते हुए संबंधों को सुधारने का प्रयास किया।
हालांकि अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन की सीमा पर कई जगहों पर चीनी सैनिकों के साथ आमना-सामना चल रहा है। यह बात आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने 22 अक्टूबर को आईटीबीपी के 65वें स्थापना दिवस से पहले आयोजित एक सम्मान समारोह के दौरान अपने जवानों को संबोधित करते हुए कही। आईटीबीपी के महानिदेशक ने चीनी पलीएलए सैनिकों के साथ आमना-सामने की स्थिति में बेहतरीन कौशल दिखाने के लिए नई कॉम्बैट टीम, शौर्य कमांडो को बधाई दी। आईटीबीपी प्रमुख ने कहा, हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में ऐसी स्थिति बनी, जहां कई जगहों पर आमना-सामना हुआ, और इनमें से कुछ स्थितियां अभी भी जारी हैं। वहां तैनात हमारी शौर्य कमांडो टीमों ने बहुत ही शानदार प्रदर्शन किया है। उन्होंने आगे कहा, हमने पहले ही आईटीबीपी की हर बटालियन में एक कमांडो टीम तैयार कर ली है, और अब दो और टीमें बनाई जा रही हैं। हमारा लक्ष्य हर बटालियन में एक पूरी कमांडो कंपनी तैयार करना है। इसके अलावा, हम एक अलग बटालियन बनाने पर भी काम कर रहे हैं, जो पूरी तरह से कमांडो ऑपरेशंस के लिए होगी। हमारा ऑपरेशंस विंग इस पर काम कर रहा है, और मुझे उम्मीद है कि अगले एक-दो दिनों में इसका खाका तैयार हो जाएगा। ये बेहतरीन कमांडो यूनिट्स आईटीबीपी की एक खास पहचान बनेंगी। इस बीच, शत्रुजीत सिंह कपूर ने ड्रोन से बढ़ते खतरों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि इस तकनीक ने पारंपरिक युद्ध के तरीकों को काफी हद तक बदल दिया है, जिसके चलते रक्षा बलों की भूमिका भी बदल रही है। उन्होंने कहा कि आईटीबीपी हर प्लाटून में एक ड्रोन यूनिट बनाने की योजना बना रही है। साथ ही, वे अपने स्तर पर ड्रोन का उत्पादन बढ़ा रहे हैं और ड्रोन पायलटों को प्रशिक्षित भी कर रहे हैं। कपूर ने यह भी बताया कि जल्द ही एक अलग स्ट्राइक कॉर्प्स (हमला करने वाली सैन्य इकाई) तैयार होने की उम्मीद है।
उन्होंने चीन द्वारा अपनी सेना, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और उसकी मीडिया क्षमताओं में किए गए भारी निवेश का जिक्र करते हुए कहा कि बीजिंग ने पारंपरिक युद्ध के क्षेत्र में काफी प्रगति की है। हालांकि, उन्होंने सुझाव दिया कि बदलते युद्ध के मैदान में ड्रोन एक बराबरी लाने वाले (इक्वलाइजर) साधन के रूप में काम कर सकते हैं। रूस-यूक्रेन के लंबे समय से चल रहे युद्ध का उदाहरण देते हुए, कपूर ने कहा कि यूक्रेन जैसे छोटे देश ने पिछले चार वर्षों में रूस को जो नुकसान पहुंचाया है, वह दिखाता है कि युद्ध का स्वरूप किस तरह बदल रहा है। उन्होंने संघर्ष के बदलते स्वरूप के एक और उदाहरण के तौर पर ईरान का भी जिक्र किया।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



