नितिन नवीन को भाजपा की कमान

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व ने एक बार फिर राजनीतिक पंडितों को चैंका दिया जो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को तरह-तरह की भविष्यवाणी कर रहे थे। कोई धर्मेन्द्र प्रधान को भावी अध्यक्ष के रूप मंे देख रहे थे तो कोई संजय जोशी को लेकर भी अपने तर्क दे रहे थे। भाजपा नेतृत्व ने कई राज्यों में मुख्यमंत्रियों को लेकर भी इसी प्रकार का चैंकाने वाला निर्णय लिया। बिहार सरकार के कैबिनेट मंत्री नितिन नबीन के बारे मंे कोई चर्चा भी नहीं कर रहा था लेकिन पार्टी ने अपने एक कर्मठ कार्यकर्ता को सर्वोच्च दायित्व सौंपा है। गत 14 दिसम्बर को बताया गया कि नितिन नवीन भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष होंगे तो बधाइयों का तांता लग गया। पूर्ववर्ती अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भाजपा को राजनीतिक ऊंचाइयां दी हैं और उन्हंे और ऊपर ले जाने का दायित्व नितिन नवीन को सौंपा गया है। अगले साल ही पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। भाजपा के लक्ष्य में तमिलनाडु में बेहतर प्रदर्शन और पश्चिम बंगाल में सरकार बनाना शामिल है। नितिन नवीन भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और पांच बार विधायक चुने जा चुके हैं। पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से लगातार चार बार विधायक बने। उनको राजनीति विरासत मिली है। नितिन के पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा राज्य मंे भाजपा के कद्दावर नेता हुआ करते थे। पिता के निधन के बाद नितिन नवीन ने राजनीति में कदम रखा और उन्हंे कभी पराजय का सामना नहीं करना पड़ा। नितिन ने अपनी राजनीतिक क्षमता का प्रदर्शन छत्तीसगढ़ में भी किया था। वह सह प्रभारी थे और 2023 में वहां भाजपा की सरकार बनी।
भाजपा ने बिहार सरकार में कैबिनेट मंत्री नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड ने नबीन को इस पद के लिए चुना है। भाजपा के कई बड़े नेताओं ने भी उन्हें सोशल मीडिया पर भी बधाई दी। वहीं भाजपा का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त होने पर नितिन नबीन ने कहा, केंद्रीय नेतृत्व, प्रधानमंत्री जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को बहुत-बहुत अभिनंदन। मुझे यह अवसर देने के लिए मैं केंद्रीय नेतृत्व, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और केंद्रीय नेतृत्व में सभी का आभार व्यक्त करता हूं। मुझे प्रधानमंत्री का आशीर्वाद प्राप्त है और मैं उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन और नेतृत्व को आगे बढ़ाऊंगा। पीएम मोदी ने अपनी पोस्ट में लिखा, नितिन नबीन ने एक कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई है। वे एक युवा और कर्मठ नेता हैं, जिन्हें काफी संगठनात्मक अनुभव है और बिहार में विधायक और मंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल प्रभावशाली रहा है। उन्होंने जनता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए बहुत मेहनत की है। वे अपने विनम्र स्वभाव और व्यावहारिक कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। मुझे भरोसा है कि उनकी ऊर्जा और समर्पण आने वाले वक्त में हमारी पार्टी को मजबूती देगा।
कायस्थ समुदाय से संबंध रखने वाले नबीन (45) के मौजूदा भाजपा
अध्यक्ष जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी बनने की संभावना है और पार्टी नेताओं के अनुसार, वह इस पद पर आसीन होने वाले सबसे युवा नेताओं में से एक हैं। नबीन पांच बार के विधायक हैं। वर्तमान में वह बिहार में पथ निर्माण मंत्री और पटना के बांकीपुर से विधायक हैं। वह पहले भी कई बार मंत्री रहे हैं। नड्डा को जनवरी 2020 में भाजपा अध्यक्ष नियुक्त किया गया था और वह अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। नड्डा को 2024 के लोकसभा चुनावों तक पार्टी का नेतृत्व करने के लिए कार्यकाल विस्तार दिया गया था। नितिन नवीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने का मतलब है कि नए अध्यक्ष मिलने तक नितिन नवीन जेपी नड्डा की जिम्मेदारी संभालते नजर आएंगे। आम तौर पर जब चुनाव करीब होता है, तब कार्यकारी बनाए जाते हैं। यह चुनाव से पहले की एक अहम प्रक्रिया है। हालांकि नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना, उनको मिली एक बड़ी जिम्मेदारी है। बीजेपी में परंपरा है कार्यकारी अध्यक्ष ही पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त होते रहे है।
माना जा रहा था कि जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भाजपा पिछड़ा वर्ग या दलित समुदाय से किसी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकती है, लेकिन सबको चैंकाते हुए कायस्थ जाति से आने वाले नितिन नबीन को पार्टी की कमान सौंपी गई है। देश भर में कायस्थों की आबादी 2.5 से 3 करोड़ तक बताई जाती है, जो कुल आबादी का 2 से ढाई फीसदी तक है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में इनकी बड़ी आबादी है और बड़ा राजनीतिक असर भी है। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और लाल बहादुर शास्त्री भी इसी समुदाय से थे। हरिवंशराय बच्चन, मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य जगत में नाम रोशन किया। विज्ञान के क्षेत्र में शांति स्वरूप भटनागर, जगदीश चंद्र बोस और सत्येंद्र नाथ बोस अविस्मरणीय हैं। स्वतंत्रता आंदोलनकारियों की बात करें तो सुभाष चंद्र बोस, चितरंजन दास, रासबिहारी बोस, खुदीराम बोस, गणेश शंकर विद्यार्थी को भी भुलाया नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल में कायस्थों की आबादी 27 लाख से अधिक बताई जाती है। बंगाल के ज्यादातर हिस्सों में कायस्थ फैले हुए हैं। घोष, बोस, दत्ता, गुहा और अन्य उपनामों से इन्हें जाना जाता है। कायस्थ समुदाय बंगाल में भी संपन्न और प्रभावशाली समुदायों में से एक हैं। इस प्रकार नितिन नवीन की बंगाल विधानसभा चुनाव में भी उनकी बड़ी भूमिका रहेगी। कोलकाता के आसपास भी इनकी उल्लेखनीय संख्या है। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के अनुसार, यूपी में कायस्थों की आबादी 1.5 से 2 करोड़ के बीच है, जो प्रदेश की जनसंख्या का 3 से 4 फीसदी तक है। प्रदेश के 37 जिलों की 67 विधानसभा सीटों पर उनकी अच्छी खासी तादाद है और राज्य की 25 सीटों पर वो निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कायस्थों को लाला भी कहते हैं। यूपी, बिहार में श्रीवास्तव, सिन्हा, माथुर, सक्सेना उपनाम से ये पहचाने जाते हैं।कायस्थ खुद को भगवान चित्रगुप्त का वंशज मानते हैं। आढ़ती, बनिया भी काफी संख्या में इसी समुदाय से होते हैं। कानपुर, उन्नाव, लखनऊ, आगरा, बरेली से लेकर अलीगढ़ तक उनकी संख्या अच्छी खासी संख्या में है।
माना जा रहा है कि 14 जनवरी को मकर संक्रांति के बाद नितिन नवीन को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाया जा सकता है। अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद जेपी नड्डा भी पहले कार्यकारी
अध्यक्ष थे। बिहार में रविशंकर प्रसाद, ऋतुराज सिन्हा और संजय मयूख भी इसी समुदाय से आते हैं। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उनकी संगठन क्षमता, चुनावी रणनीति, प्रशासनिक अनुभव और जमीनी पकड़ को ध्यान में रखते हुए यह जिम्मेदारी सौंपी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, यह नियुक्ति केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला कदम माना जा रहा है। नितिन नवीन को बीजेपी में एक ऐसे नेता के तौर पर देखा जाता है, जिन्होंने संगठन के हर स्तर पर काम किया है। युवा मोर्चा से लेकर राज्य सरकार और अब राष्ट्रीय संगठन तक उनका सफर पार्टी के भीतर भरोसे का प्रतीक माना जाता है।पार्टी के अंदर उन्हें एक डिसिप्लिन्ड ऑर्गनाइजर, स्ट्रॉन्ग स्ट्रैटेजिस्ट और ग्राउंड कनेक्ट लीडर के रूप में जाना जाता है। यही वजह है कि जब र्टी को राष्ट्रीय स्तर पर संगठन को और धार देने की जरूरत महसूस हुई, तो नेतृत्व की नजर नितिन नवीन पर जाकर ठहरी।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



