मांझी व पासवान का टकराया स्वार्थ

आरक्षण को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए के दो घटक दलों के नेताओं के स्वार्थ टकरा गये हैं। लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से सवाल पूछ रहे थे कि दलितों के साथ भेदभाव क्यों किया गया। कांग्रेस लम्बे समय तक सत्ता में रही है तो उसे जवाब देना चाहिए। आरक्षण पर बहस बढ़ते-बढ़ते क्रीमीलेयर तक पहंुच गयी। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के नेता संतोष कुमार सुमन ने क्रीमीलेयर का मामला उठाया तो चिराग पासवान ने जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन से इस्तीफे की मांग कर डाली। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने जब एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर की बात कही थी तब भी जीतन राम मांझी का चिराग पासवान ने विरोध किया था। केन्द्र सरकार ने विवाद से बचने के लिए ही सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को स्वीकार नहीं किया था। अब यह मामला फिर उभरा है। चिराग पासवान दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें ज्यादातर लोग सम्पन्न हैं अर्थात क्रीमीलेयर वाले हैं जबकि जीतनराम मांझी महादलित समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें बहुत कम लोग क्रीमीलेयर वाले हैं।
आरक्षण पर बढ़ते बहस के बीच अब एनडीए के अंदर ही मतभेद दिखने लगे हैं। दलित आरक्षण में क्रीमी लेयर के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बयान पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने पलटवार किया है। उन्होंने केंद्र में मंत्री मांझी और बिहार सरकार में मंत्री उनके बेटे संतोष सुमन से इस्तीफे की मांग कर डाली। चिराग ने कहा कि जब दलित और महादलित का बंटवारा करने की कोशिश हुई थी, तब भी उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी।
चिराग पासवान ने कहा, मैं अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को आरक्षण देने की बात कर रहा हूं। उनके बारे में लोग पूछते हैं, इसमें क्रीमी लेयर का प्रावधान क्यों नहीं है? तो ठीक है, वे इसे छोड़ दें, वे आरक्षण का लाभ लेना बंद कर दें। अगर जीतन राम मांझी को लगता है कि ये उपाय लागू होने चाहिए, तो क्या उन्हें पहले इस्तीफा नहीं देना चाहिए? उन्हें क्रीमी लेयर का कॉन्सेप्ट लाना चाहिए, आखिरकार, वे भी तो उसी कैटेगरी में आएंगे, है ना? उन्हें इस्तीफा देना चाहिए, और उनके बेटे को, जो यहां मौजूद हैं, उन्हें भी इस्तीफा देना चाहिए। बिहार सरकार में मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के नेता संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण को लेकर कहा था कि इसकी समीक्षा होनी चाहिए लेकिन इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए। आरक्षण का फायदा उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। सुमन ने आरक्षण में उप-वर्गीकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि दलित समाज की कुछ जातियों को लंबे समय से आरक्षण का ज्यादा लाभ मिला है, जबकि कई जातियां अभी भी पीछे हैं। इसलिए आरक्षण के भीतर जरूरतमंद और अधिक पिछड़ी जातियों के लिए अलग हिस्सा तय करने पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 79 साल की आजादी के बाद यह सवाल पूछना गलत कैसे हो सकता है कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों को कितना मिला और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े कौन-से लोग आज भी इससे वंचित हैं? लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा कि जो लोग आरक्षण के आकलन की बात करते हैं, वे सही मायनों में आरक्षण और खासतौर पर अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग को मिलने वाले आरक्षण को समझ नहीं पा रहे हैं।
चिराग ने कहा, आरक्षण का आकलन करने का मतलब है लोगों को सिस्टम से बाहर करना और इसके दायरे को कम करना। संविधान में हर स्तर पर हर तरीके के आरक्षण की व्यवस्था है। जब आप अनुसूचित जाति और जनजाति में आरक्षण की बात करते हैं तो यहां पर आधार आर्थिक हो ही नहीं सकता है। यह सामाजिक न्याय की लड़ाई है। इसका आधार ही सामाजिक न्याय का रहा है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति से आने वाले ये कौन से लोग हैं? ये वो लोग हैं जिनको संविधान ने शेड्यूल किया है, जिनका आधार छुआछूत रहा है, जिनको गांव से दूर रखा जाता था, छूना तो दूर की बात है, देखना पाप माना जाता था। वहीं, शेड्यूल ट्राइब (अनुसूचित जनजाति) की अलग विशेषताएं (वेश-भूषा, रहन-सहन और बोल-चाल) रही हैं। पासवान ने कहा कि इन दो अनुसूचित जाति और जनजाति को शेड्यूल किया गया है, जिसकी वजह से आरक्षण दिया गया है। जब इनको आरक्षण देने का आधार ही भेदभाव रहा है तो इसमें आर्थिक व्यवस्था कैसे जोड़ी जा सकती है।
उन्होंने कहा कि मैं लोगों से पूछना चाहता हूं कि क्या आज भेदभाव नहीं होते हैं? कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ घटनाएं हो रही हैं। आज एकजुट हैं, तब इस वर्ग को इतना संघर्ष करना पड़ रहा है। सोचिए, जब ये बंट कर तीन-चार प्रतिशत रह जाएंगे तो इनकी बात कौन सुनेगा? आज एक हैं तो आवाज बन रहे हैं, बटेंगे को कोई सुनेगा नहीं।
ध्यान रहे बिहार सरकार में मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के नेता संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दलित समाज की कुछ जातियों को लंबे समय से आरक्षण का ज्यादा लाभ मिला है, जबकि कई जातियां अभी भी पीछे हैं। इसलिए आरक्षण के भीतर जरूरतमंद और अधिक पिछड़ी जातियों के लिए अलग हिस्सा तय करने पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि सभी को समान अवसर मिल सकें।
बिहार सरकार के मंत्री संतोष कुमार सुमन ने कहा, यह सवाल पूछना गलत कैसे हो सकता है कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों को कितना मिला और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े कौन-से लोग आज भी इससे वंचित हैं? संतोष कुमार सुमन ने कहा, हमारे देश में सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को पहचानने के लिए वर्गीकरण की व्यवस्था पहले भी हुई है। सामान्य वर्ग के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए ईडब्ल्यूएस की व्यवस्था बनी, पिछड़े वर्गों में भी पिछड़ा और अतिपिछड़ा की अलग पहचान की गई। जब एक ही बड़े सामाजिक वर्ग के भीतर वास्तविक वंचितों तक लाभ पहुंचाने के लिए अलग श्रेणियां बनाई जा सकती हैं, तो फिर दलित समाज के भीतर भी यह देखना क्यों गलत है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचित लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं? संतोष कुमार सुमन ने कहा कि दलित समाज कोई एकरूप वर्ग नहीं है। उसके भीतर भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में अंतर है। यदि कुछ जातियां आरक्षण का लाभ लगातार अधिक प्राप्त कर रही हैं और कुछ आज भी पीछे हैं, तो उन तक अवसर पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण क्यों नहीं होना चाहिए? उन्होंने कहा आरक्षण बचाना है तो उसकी पहुंच भी न्यायपूर्ण बनानी होगी। इस प्रकार मांझी और चिराग का स्वार्थ टकरा रहा है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



