बांग्लादेश में कट्टरपंथी निरंकुश

पिछले कुछ समय से भारत के पड़ोसी देशों के समीकरण बदल रहे हैं बांग्लादेश में बढ़ रही निरंकुश मजहबी अराजकता वहां के हिन्दुओं के लिए खतरा बढा रही है, वहीं भारत के लिए नयी चुनौती बन रही है। शेख हसीना की सरकार के खिलाफ उपद्रव के बाद से बांग्लादेश पिछले करीब डेढ़ साल से अराजकता और चरमपंथी धर्मांधता की आग में गंभीर रूप से झुलस रहा है। शेख हसीना की सरकार गिराने के बाद देश में शांति लाने का वादा करने वाली मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार हिंसा रोकने में नाकाम रही। हसीना सरकार के विरोध में हिंसक आंदोलन चलाने वाले छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में एक बार फिर आग भड़क गई। इस दौरान ढाका के पास भालुका में धर्म का अपमान करने के आरोप में एक हिंदू युवक को पीट-पीटकर मार डाला। युवक के शव को नग्न करके पेड़ से लटका कर आग लगा दी गई। ऐसी बर्बरता पर दुनिया चुप्पी साधे हुए हैं। उपद्रवियों ने देश के सबसे बड़े अखबार डेली स्टार और प्रोथोम आलो के ऑफिस में भी घुसकर तोड़फोड़ और आग लगा दी। हिन्दू पत्रकार के घर को लूट कर आग लगा दी। भारतीय राजनयिक के परिसरों और उनके घरों पर हमले किए गए हैं। इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान के आवास में तोड़-फोड़ की गई। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के ऑफिस को भी जला दिया गया है। उपद्रवियों ने सबसे पुरानी सांस्कृतिक संस्था छायानट में भी आग लगा दी है और दुर्लभ पुस्तकें तथा अन्य महत्वपूर्ण सामान तोड़ डाले हैं। छायानट की स्थापना गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की जन्म शताब्दी के अवसर पर 1961 में की गयी थी। इस संस्था का उद्देश्य बांग्ला साहित्य और संस्कृति को प्रसारित करना था। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षाओं तथा साहित्य को लेकर भी यहां काम होता था। वंचितों और पिछड़े लोगों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संस्था है। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय छायानट के तत्वावधान में स्वतंत्रता सेनानियों और शरणार्थियों के लिए कार्यक्रम आयोजित कराये जाते थे। इसके अतिरिक्त बांग्ला संस्कृति, संगीत और साहित्यके लिए लगातार काम करने वाली इस संस्था का अत्यधिक महत्व है।
इंकलाब मंच के नेता उस्मान हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा में बांग्लादेश को बड़ा नुकसान पहुंचा है। उपद्रवियों ने शेख मुजीबुर्रहमान की प्रतिमा तोड़ डाली और टीवी चैनलों के कार्यालयों को भी निशाना बनाया गया है। हादी देश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में एक प्रत्याशी भी थे। पिछले सप्ताह ढाका के विजयनगर क्षेत्र में चुनाव प्रचार शुरू करते समय नकाबपोश बन्दूकधारियों ने उनके सिर पर गोली मार दी थी। बाद में उनकी मौत हो गयी।
बांग्लादेश की हालत बेहद खराब है। कानून व्यवस्था खत्म हो चली है और राजनीतिक अस्थिरता है। बांग्लादेश के हालात भारतके लिए गम्भीर चिन्ता का विषय है। इन दिनों भारत और बंगलादेश के बीच द्विपक्षीय सम्बन्ध खराब चल रहे हैं। पिछले दिनों ढाका में भारतीय उच्चायोग को एक धमकी मिली थी। इस मामले में उच्चायोग ने अपनी आपत्तियां भी दर्ज करा दी हैं और दिल्ली में बंगलादेश के हाई कमीश्नर रियाज हमिदुल्लाह को समन कर तलब किया है। ढाका में भारतीय वीजा कलेक्शन सेण्टर को भी बंद कर दिया गया है। बांग्लादेश में हिन्दुओं सहित अन्य अल्पसंख्यकों पर बराबर अत्याचार हो रहे हैं। हिन्दुओं की हत्याएं और मन्दिरों को क्षतिग्रस्त किया जा रहा है। इससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सम्बन्ध भी सामान्य नहीं हैं। इसलिए भारत सरकार को पूरी सतर्कता के साथ कदम उठानेकी आवश्यकता है, क्योंकि इन दिनों बांग्लादेश का पाकिस्तान के प्रति झुकाव बढ़ गया है।
भारत के पड़ोस में धधकती यह अराजकता की आग लगातर चुनौती बढ़ा रही है। देशभर में हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। यहां इस समय एक अलग ही किस्म का पागलपन चल रहा है। इस पागलपन के तहत बांग्लादेश में एक वीडियो वायरल है, जिसमें सिराजुद्दौला साम्राज्य की फिर से स्थापना का ख्वाब दिखाया जा रहा है, जिसमें भारत के कई हिस्से शामिल हैं। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बांग्लादेश वास्तव में सांप्रदायिक संक्रमण की ओर बढ़ रहा है या फिर सुनियोजित अस्थिरता के जाल में फंसता जा रहा है। दरअसल, मोहम्मद यूनुस मोहम्मद अली जिन्ना की विचारधारा पर चल रहे हैं और उन्होंने बांग्लादेश में पाकिस्तान मॉडल लागू कर दिया। यह भारत के लिए भी चिंतनीय है।
बांग्लादेश में पिछले कुछ दिनों में जो भी हुआ, उससे साफ है कि अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस के हाथ से चीजें निकलती जा रही हैं। जिन कट्टरपंथियों को उन्होंने शुरू में बढ़ावा दिया था, अब वे ही उनके काबू में नहीं हैं। उनकी भारत विरोधी नीतियों ने दोनों देशों के रिश्तों को सबसे खराब दौर में पहुंचा दिया है। यूनुस सरकार का अपनी नाकामियों का ठीकरा
भारत पर फोड़ना हकीकत की अनदेखी है और इससे स्थिति और बिगड़ेगी।
सच यही है कि हसीना विरोधी आंदोलन अब कट्टरपंथी तत्वों के नियंत्रण में आ गया।
इसका सबूत अगस्त 2024 के बाद से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुई हजारों हिंसक घटनाएं हैं। अगले साल फरवरी में चुनाव की घोषणा होने के बाद से अपराध और बढ़ा है। बांग्लादेश की अस्थिरता भारत पर सीधा असर डालती है और इस नाते उसकी चिंता स्वाभाविक है। बल्कि यूरोपीय यूनियन और अमेरिका भी बांग्लादेश में मानवाधिकार उल्लंघनों का मामला उठा चुके हैं। अंतरिम सरकार पर अपने ही देश के भीतर निष्पक्ष चुनाव कराने का जबरदस्त दबाव है। पिछले महीने शेख हसीना को जिस तरह सुनवाई का मौका दिए बिना सजा सुनाई गई, उसकी आलोचना हो रही है। यूनुस सरकार के जुलाई चार्टर को लेकर भी मतभेद हैं। इस चार्टर के जरिये 2024 के आंदोलन को संवैधानिक मान्यता देनी है और संविधान में कई बदलाव किए जाने हैं। भारत ने बांग्लादेश में स्वतंत्र, समावेशी और विश्वसनीय चुनाव की जरूरत बताई है जिसमें सबका हित है।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अगुवाई वाली समिति की रिपोर्ट से निकली बातों के विश्लेषण से पता चलता है कि बांग्लादेश में जारी हिंसा की वजह से भारत के सामने कई बड़े और गंभीर संकट खड़े हुए हैं, जिनसे निपटना बहुत बड़ी चुनौती होगी। भारत की चिंता यह भी है कि बांग्लादेश चीन की रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) में शामिल हो सकता है। चीन ने 370 मिलियन डॉलर का इस्तेमाल करके इसके मोंगला बंदरगाह का विस्तार किया है। इसके चलते भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए खुलना-मोंगला रेलवे लाइन में निवेश किया है। भारत को सिर्फ कूटनीतिक संकट का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है, इसकी वजह से भारत की आतंरिक सुरक्षा का संकट भी गहरा गया है।
(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)



