आस्था से टकरा गये स्टालिन

आप आस्था न रखें, यह अलग बात है लेकिन उससे टकरा जाएं तो इसका नतीजा अच्छा नहीं होगा। आस्था का तात्पर्य यहां दैवी शक्ति के प्रति विश्वास से है। बहुत लोग हैं जिनको विश्वास नहीं होता लेकिन जिनका यकीन होता है वे गलत कैसे हो गये? इसीलिए नास्तिकों से किसी का विरोध नहीं होता लेकिन आस्था पर चोट करने वालों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम. स्टालिन को इसीलिए अदालत की फटकार सुनने को मिली। मुख्यमंत्री स्टालिन किसी देवी-देवता में विश्वास रखते हैं, यह तो नहीं मालूम लेकिन कार्तिगई दीपक जलाने का विरोध करने पर उन्हें मद्रास हाईकोर्ट की लताड़ पड़ी है। राज्य की थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ियों के ऊपर पत्थर के खंभे पर दीपक जलाने वालों की आस्था मुरुगन पर है लेकिन वहीं पर मुस्लिम सम्प्रदाय के इबादतगाह की आपत्ति को मुख्यमंत्री स्टालिन ने महत्व दिया। निश्चित रूप से यह महत्य वोट की राजनीति के चलते दिया गया। राज्य में इसी साल विधान सभा के चुनाव भी होने हैं। माना जा रहा कि स्टालिन ने इसीलिए विरोध किया लेकिन अदालत की इस दलील का उनके पास कोई जवाब नहीं है। अदालत ने पूछा कि इबादतगाह के बगल में दीप जलाने से मुसलमानों की इबादत में बाधा कैसे पड़ने लगी? यह मुद्दा राज्य में विधान सभा चुनाव के समय भी उठ सकता है। दरगाह बनाम मंदिर का विवाद सिसायी मुद्दा बन गया है। यह भगवान मुरुगन का पवित्र स्थल है। दक्षिण भारत का यह प्रकाश पर्व है।
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ियों के ऊपर पत्थर के खंभे (दीपथून) पर कार्तिगई दीपम जलाने के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही, राज्य की इस आशंका को पूरी तरह से खारिज कर दिया कि इस रस्म से लोगों की शांति और सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ सकता है। जस्टिस जी जयचंद्रन और केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने थिरुपरनकुंद्रम मुरुगन मंदिर के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, मदुरै डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और मदुरै सिटी पुलिस कमिश्नर की अपीलों का निपटारा करते हुए यह फैसला सुनाया। बेंच ने सभी पार्टियों की डिटेल में दलीलें सुनने के बाद 18 दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। ये अपीलें 1 दिसंबर को सिंगल जज जस्टिस जीआर स्वामीनाथन के पास किए गए ऑर्डर से उठी थीं, जिन्होंने कार्तिगई दीपम के मौके पर पहाड़ी की चोटी पर बने पत्थर के खंभे पर दीया जलाने के लिए निर्देश मांगने वाली एक पिटीशन को मंजूरी दी थी। हालांकि, सरकार के कानून-व्यवस्था की संभावित चिंताओं का हवाला देने के बाद ऑर्डर लागू नहीं किया गया। डिवीजन बेंच के सामने 2 मुख्य सवाल उठे थे। पहला कि क्या पत्थर के खंभे को हिंदुओं के लिए दीपदान माना जा सकता है, जिससे उन्हें कार्तिगाई दीपम रस्म के हिस्से के तौर पर दीया जलाने का हक मिल जाएगा? दूसरा कि क्या दीया जलाने की इजाजत देने से पास की मुस्लिम दरगाह के अधिकारों का उल्लंघन होगा या उन पर असर पड़ेगा? बेंच ने अपने फैसले में राज्य और दूसरे अपील करने वालों की कड़ी आलोचना की। बेंच ने कहा कि इस मजाक पर यकीन करना मुश्किल हो रहा है। कोर्ट ने कटाक्ष करते हुए कहा, ‘पावरफुल राज्य यह दावा कर सकता है कि मंदिर की जमीन पर मंदिर द्वारा दीया जलाने से पब्लिक पीस में गड़बड़ी होगी? कोर्ट ने कहा
कि ऐसी बात को माना नहीं जा
सकता। जजों ने इस बात की भी आलोचना की। बहस के दौरान सरकार की दलील को शरारत वाला बताया गया है। उन्होंने कहा कि पत्थर के खंभे दरगाह का बताना मजाक है। कोर्ट ने इस बात को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
तमिलनाडु में मंदिर की पहाड़ी के एक स्तंभ पर दीप जलाने की इजाजत देने वाले जज के खिलाफ महाभियोग के लिए विपक्षी सांसदों ने प्रस्ताव दिया। दरअसल, थिरुपरनकुंदरम पहाड़ी भगवान मुरुगन के छह पवित्र आश्रयों अरुपदई वीडु में से एक है। इस पहाड़ी पर एक प्राचीन चट्टान काटकर बनाया गया गुफानुमा मंदिर बना है। यह तमिलनाडु भर के श्रद्धालुओं के लिए लंबे समय से एक तीर्थस्थल रहा है। इसके समीप दरगाह भी है। मंदिर और दरगाह की मात्र 3 किलोमीटर की दूरी को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच पहाड़ी पर अधिकार को लेकर तनाव होता रहा है। मंदिर और दरगाह ने 1920 में पहली बार पहाड़ी पर कानूनी अधिकार को लेकर चुनौती दी थी। एक सिविल कोर्ट ने पहले फैसला दिया था कि दरगाह से जुड़े कुछ क्षेत्रों को छोड़कर यह पहाड़ी सुब्रमण्यस्वामी मंदिर (देवस्थानम) की है। इस फैसले ने पहाड़ी के स्वामित्व का निपटारा तो कर दिया, लेकिन इसमें रीति-रिवाजों, परंपराओं या दीपम की परंपरा का उल्लेख नहीं किया गया था।इसके बाद मंदिर के पवित्र स्तंभ में दीप (कार्थीगाई दीपम लैंप) जलाने की इजाजत देने वाला जस्टिस जीआर स्वामीनाथन का फैसला आया।
बीजेपी सांसद मनन कुमार मिश्रा ने मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग नोटिस की आलोचना की। उन्होंने जस्टिस स्वामीनाथन के फैसले को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में चुनाव हैं, इसलिए डीएमके के लोग वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, मंदिर में दीप जलाने में क्या गलत है? कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा होनी चाहिए, अनुमति होनी चाहिए। हर मामले को आप महाभियोग तक ले आएंगे तो यह मजाक बन जाएगा।
बता दें कि थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी को भगवान मुरुगन के छह पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। यहां एक बड़ा प्राचीन पत्थर और मंदिर है। इस मंदिर का दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। इस पहाड़ी के पास एक दरगाह भी है। दरगाह और मंदिर के बीच विवाद भी काफी पुराना है। पहाड़ी किसकी है इसका विवाद 1920 से चला आ रहा है। इस पहाड़ी के मालिकाना हक को लेकर 1920 में पहला केस दर्ज हुआ। इस मामले की सुनवाई करते हुए सिविल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दरगाह के आस-पास के क्षेत्र को छोड़कर इस पहाड़ी पर अधिकार सुब्रमण्यास्वामी मंदिर का है। पहाड़ी पर दीप उत्सव या धार्मिक अनुष्ठान होना है कि नहीं, कोर्ट ने इस बार में कोई फैसला नहीं सुनाया।
बीते कई दशकों तक यह मामला शांत रहा लेकिन 1994 में एक श्रद्धालु ने दीप प्रज्वलन अनुष्ठान को पारंपरिक स्थान से स्थानांतरित कर दरगाह के समीप पहाड़ी के ऊपर करने का आदेश देने की मांग की। आगे साल 1996 में हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में दीपम को मंडपम के समीप पारंपरिक स्थान पर प्रज्वलित करने की इजाजत दी। 2014 में, मद्रास हाईकोर्ट की दो जजों की पीठ ने दीपाथुन पर दीपक जलाने के खिलाफ निर्णय दिया था। इस बार, मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में कार्तिगाई दीपम जलाने की अनुमति मांगने के लिए एक नई याचिका दायर की गई थी।
कार्तिगई दीपम तमिलनाडु में मनाया जाने वाला एक दक्षिण भारतीय प्रकाश पर्व है, जो भगवान मुरुगन को समर्पित है। मुरुगन को कार्तिकेय और सुब्रमण्यम स्वामी भी कहा जाता है, जो भगवान शिव और पार्वती के पुत्र हैं। तमिल माह कार्तिगई की पूर्णिमा के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय, समृद्धि के आह्वान और बुरी आत्माओं को दूर भगाने के प्रतीक के रूप में दीप जलाकर मनाया जाता है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



