सियासत से परे मणिपुर की समस्या

मणिपुर के उखरुल जिले के लिटन गांव में गत दिनों ताजा हिंसा भड़क गई। अंधाधुंध फायरिंग और आगजनी की घटनाओं में 30 से ज्यादा घर जल गए। हालात बिगड़ने के बाद लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे थे। इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए और प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए था। हालात को देखते हुए 5 दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएं सस्पेंड कर दी गयीं। मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद ने दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है। कूकी और तांगखुल दोनों समुदायों के प्रति निधियों की आपात बैठक भी बुलाई गयी। इस बार विरोध प्रदर्शन के केंद्र में डिप्टी सीएम नेमचा किपगेन हैं। कूकी संगठन चाहते हैं कि किसी भी हालत में कोई कूकी नेता सरकार का हिस्सा बने। दूसरी ओर, थाडू जनजाति उनके समर्थन में हैं। बैठक में उपमुख्यमंत्री लोसीदिखो और विधायक राम मुइवाह भी मौजूद थे लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।
अभी 4 फरवरी को एक साल बाद युमनाम खेमचंद के नेतृत्व में मणिपुर में नई सरकार बनने के बाद शांति की उम्मीद जगी थी क्योंकि दो डिप्टी सीएम भी बनाए गये हैं । जनजातीय समूहों के समीकरण को साधने का प्रयास किया गया मगर राज्य में फिर भी तनाव का माहौल बन ही गया। इस बार विरोध प्रदर्शन के केंद्र में डिप्टी सीएम नेमचा किपगेन हैं। कूकी संगठन चाहते हैं कि किसी भी हालत में कोई कुकी नेता सरकार का हिस्सा बने। दूसरी ओर, थाडू जनजाति उनके समर्थन में हैं। इसप्रकार मणिपुर फिर उबल गया है। नगा, कूकी-जो और मैतेई इलाकों में तनाव है। जनजातियों ने एक-दूसरे को अपने-अपने इलाके में आने पर प्रतिबंध लगा रखा है। सरकार ने ऐहतियातन इंटरनेट बंद कर रखा है। बीते 4 फरवरी को मणिपुर में नई सरकार के गठन में बीजेपी ने जो प्रयोग किए थे, उससे पहाड़ों और घाटी के बीच बनी खाई पाटने की उम्मीद जगी थी। मगर दांव उल्टा पड़ा गया। नेमचा किपगेन को डिप्टी सीएम बनाने से कूकी-जो जनजाति का गुस्सा विरोध में बदल गया। शांति की उम्मीद प्रदर्शन और सुरक्षा बलों की झड़प में कमजोर हो गई। देश के अन्य इलाकों के लोग यह समझ नहीं सके कि शांत हो रहे माहौल में आखिर चिंगारी क्यों भड़की?
मणिपुर में फरवरी में भड़के गुस्से की जड़ राज्य की जनजाति और उसके बीच जातीय झगड़े में है। 4 फरवरी को युमनाम खेमचंद सिंह ने सीएम पद की शपथ ली। वाई. खेमचंद सिंह मैतेई समुदाय से हैं। राज्य में मैतेई जनजाति कुल आबादी का 50 फीसदी से ज्यादा है। जातीय संतुलन साधने के लिए खेमचंद सिंह के साथ मंत्रिमंडल में बतौर डिप्टी सीएम लोसी दिखो को शामिल किया गया, जो नगा जनजाति के हैं। साथ ही कूकी जनजाति की ओर से नेमचा किपगेन को डिप्टी सीएम बनाया गया। नेमचा किपगेन की एंट्री से कूकी-जो समुदाय नाराज हो गया। उग्रवादी ग्रुप कूकी लिबरेशन आर्मी ने खेमचंद सरकार को समर्थन देने वाले कूकी विधायकों को देशद्रोही बताते हुए चेतावनी भी जारी कर दी।
सवाल यह है कि अगर नेमचा किपगेन कूकी समुदाय से हैं तो जनजाति के लोग गुस्से में क्यों आए? इसके पीछे जातीय पहचान का घालमेल है। नेमचा किपगेन की खुद की पहचान कूकी जनजाति की नेता की है। उनके पति एस.टी.थांगबोई किपगेन कूकी नेशनल फ्रंट के चेयरमैन हैं। वह कूकी-जो बाहुल्य वाली कांगपोगपी विधानसभा से चुनाव जीतती रही हैं। इसके बावजूद कूकी-जो कम्यूनिटी में वह जाति की सर्वमान्य नेता नहीं हैं। इसकी वजह उनका थाडू जनजाति से भी कनेक्शन है।
कूकी-जो ट्राइब्स में आधिकारिक रूप से दो जनजातियां हैं। थाडूस और पाइड्स। थाडू जनजाति अपने कुकी पहचान से असहज है। ट्राइबल जनजाति की लिस्ट में थाडू कूकी-जो का हिस्सा है मगर इस समुदाय के लोग मानते हैं कि उन पर कूकी ट्राइब का लेबल चिपकाया गया है। इस समूह का थाडू इनपी मणिपुर (टीआईएम) के नाम से एक ट्राइबल बॉडी भी है। गुवाहाटी में हुए थाडू कन्वेंशन 2024 के डिक्लेरेशन में खुले तौर पर संगठन ने ऐलान किया कि थाडू कूकी से अलग एक एथनिक ग्रुप है, जिसकी अपनी अलग भाषा, कल्चर, परंपराएं और शानदार इतिहास है। थाडू कूकी का हिस्सा नहीं है और न ही कूकी समुदाय के नीचे है।
जब नेमचा किपगेन डिप्टी चीफ मिनिस्टर बनीं तो उनकी जातीय पहचान का सवाल उठा। थाडू इनपी मणिपुर (टीआईएम ) ने उनकी नियुक्ति पर खुशी जाहिर की और संवैधानिक पद संभालने वाली पहली थाडू लीडर के तौर पर बधाई दी। थाडू पहचान को तवज्जो देने के कारण कूकी-जो काउंसिल और कूकी-जो ट्राइबल लीडर्स ने उनका विरोध किया। कूकी-जो जनजाति सरकार में
शामिल होने के खिलाफ रही है। अभी मणिपुर विधानसभा में 10 कूकी-जो जनजाति के विधायक हैं, जिनमें से सात बीजेपी के सदस्य हैं, जबकि तीन अन्य पार्टियों से हैं। नई सरकार के गठन के बाद उग्रवादी समूह कूकी लिबरेशन आर्मी ने कूकी विधायकों को सरकार को समर्थन देने पर चेतावनी दी। कूकी संगठन नहीं चाहते कि कोई जनजाति का नेता मैतेई सीएम के नेतृत्व में काम करे। एन.वीरेन सिंह के कार्यकाल के दौरान उन्होंने आरोप लगाया था कि सीएम की शह पर कूकी निशाने पर आए। दूसरी ओर, थाडू इसे अपनी पहचान का मौका मानते हैं।
मणिपुर के जनजातीय कम्यूनिटी को भौगोलिक आधार पर भी समझ सकते हैं। राज्य में कूकी-जो और नगा समुदाय की 30 से ज्यादा जनजातियां रहती हैं। ये सभी पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, इन दोनों समुदायों की मणिपुर की 28.55 लाख आबादी में लगभग 42 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि 50 प्रतिशत से अधिक आबादी वाले मैतेई समुदाय के लोग घाटी में रहते हैं। परंपरागत तौर पर इन सभी जनजातियों का इलाका भी परिभाषित है। युद्ध में पारंगत कूकी समुदाय के लोग उग्र माने जाते हैं। उन्हें पुराने शासकों ने मैतेई के घाटी वाले इलाके के आसपास बसाया था। इसके बाद उन्होंने पहाड़ों में अपना इलाका चिह्नित कर लिया। ध्यान रहे 90 के दशक में उनका नगा के अलावा मैतेई जनजाति से पहले भी जातीय झगड़े हुए हैं। 1997 में कूकी जनजाति की दोनों जातियों पाइट्स और थाडू के बीच ही संघर्ष हुआ, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।
अब विवाद में नगा जनजाति भी शामिल हो गयी है। गत 4 फरवरी को जब दोबारा मणिपुर में कूकी-जो समुदाय उग्र हुआ तो नगा जनजाति ने भी उनकी अपनी इलाके में एंट्री रोक दी। मैतेई के साथ उनका विवाद पहले से ही कायम है। गत 9 फरवरी को मणिपुर के उखरुल जिले में तांगखुल नगा समुदाय पर हमले का आरोप भी नगा उग्रवादियों पर लगा। इसके बाद उन्होंने पहाड़ों में अपना इलाका चिह्नित कर लिया। इसके पहले 90 के दशक में उनका नगा के अलावा मैतेई जनजाति से पहले भी जातीय झगड़े हुए हैं। सन् 1997 में कुकी जनजाति की दोनों जातियों पाइट्स और थाडू के बीच ही संघर्ष हुआ, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। समाधान सियासत से किया जाता है। इसलिए संघर्ष जारी है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



