मायावती का आत्मविश्वास

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सर्वेसर्वा और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती आत्म विश्वास से भरी दिख रही हंै। उन्होंने 18 फरवरी को लखनऊ में पत्रकारों से बात करते हुए जिस तरह साफ शब्दों में कहा कि 2027 के विधानसभा चुनाव बसपा अपने दम पर लड़ेगी और सरकार भी बनाएगी, उससे लगता है कि उन्हें अपने काॅडर पर भरोसा है। गठबंधन की राजनीति पर मायावती ने लम्बा मंथन किया है। वह कहती हैं कि गठबंधन बसपा को लाभ नहीं बल्कि नुकसान पहुंचाते हैं। अकेल दम पर चुनाव लड़ने और सरकार बनाने का दावा करते समय वह अपने संगठन को भी चुस्त-दुरुस्त कर रही हैं। उनका परिवार पहले बिखरा नजर आया था लेकिन अब मायावती ने एक-एक करके सभी को जोड़ लिया है। अपने भतीजे अशोक आनंद के ससुर डा0 अशोक सिद्धार्थ को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। मायावती चाहती हैं कि बसपा सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि दूसरे प्रदेशों में भी मजबूत होकर सत्तारूढ़ दलों से मोर्चा ले।
यूपी में होने वाले विधान सभा चुनावों से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने साफ कर दिया है कि पार्टी इस बार किसी भी गठबंधन में नहीं जाएगी और प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि गठबंधन बसपा को फायदा नहीं, बल्कि नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए पार्टी पूर्ण बहुमत के लक्ष्य के साथ अकेले मैदान में उतरेगी। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती लगातार एक्शन मोड में हैं। बसपा सुप्रीमो ने आगामी चुनाव को लेकर प्रदेश स्तर पर पार्टी संगठन में बड़े बदलाव भी किए हैं। खास बात ये है कि मायावती ने भतीजे आकाश आनंद के ससुर डॉ0 अशोक सिद्धार्थ पर एक बार फिर भरोसा जताते हुए अहम जिम्मेदारी दी है। नए बदलावों के तहत पूर्व एमएलसी नौशाद अली का कद अब और बढ़ गया हैं। बसपा ने उन्हें लखनऊ, कानपुर, आगरा और मेरठ मंडल की जिम्मेदारी दी है। इसके साथ ही उन्हें मुरादाबाद और बरेली मंडल के साथ उत्तराखंड का भी प्रभार दिया गया है।
मायावती ने डॉ लालजी मेधंकर को ओडिशा और बंगाल, सुमित सिंह को राजस्थान, गिरीश चंद्र को उत्तराखंड, राजाराम को बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड का प्रभारी बनाया है। रणधीर सिंह बेनीवाल को पंजाब, हरियाणा, नितिन सिंह को जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है। पार्टी में किए गए इन बदलावों के बाद सबसे ज्यादा डॉ अशोक सिद्धार्थ के नाम की चर्चा की जा रही हैं। जिन्हें मायावती ने सबसे अहम राज्यों की जिम्मेदारी दी है। दिलचस्प बात ये हैं कि ये वहीं डॉ अशोक सिद्धार्थ हैं, जिन्हें बीते साल मायावती ने अनुशासनहीनता और गुटबाजी के आरोप में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, लेकिन, कुछ महीनों बाद ही उनकी वापसी हो गई।
मायावती ने कहा कि पिछले कुछ समय से उनके और बसपा को लेकर सोशल मीडिया पर भ्रामक और फर्जी दावे फैलाए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे मैसेज या पोस्ट पूरी तरह गलत हैं और कार्यकर्ताओं को इन अफवाहों से सावधान रहने की अपील की है उन्होंने यह भी कहा कि एआई के जरिए बनाई गई फर्जी बयानबाजी को पार्टी गंभीरता से ले रही है। बसपा अध्यक्ष ने याद दिलाया कि 2007 में बसपा ने अकेले दम पर सरकार बनाई थी और यह मॉडल फिर दोहराया जाएगा। उनके अनुसार, गठबंधन की राजनीति हमेशा बसपा के जनाधार को नुकसान पहुंचाती है और पार्टी का वोट दूसरी पार्टियों के खाते में ट्रांसफर हो जाता है। उन्होंने कहा कि गठबंधन से ज्यादा फायदा अन्य पार्टियों को हुआ है, बसपा को नहीं। मायावती ने भाजपा, कांग्रेस और सपा पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि सभी पार्टियां दलित, पिछड़े और मुस्लिम वोटरों को लेकर केवल बयानबाजी करती हैं, लेकिन बसपा ही इन वर्गों को वास्तविक प्रतिनिधित्व देती है। उन्होंने कहा कि बसपा अपने उम्मीदवार पहले ही घोषित कर चुकी है और संगठन चुनाव की पूरी तैयारी में जुटा है। उन्होंने यह भी दोहराया कि पार्टी किसी भी भ्रम में नहीं है और न ही किसी दूसरे मोर्चे या गठबंधन में शामिल होने वाली है।
दरअसल, सपा और बसपा के गठबंधन की अटकलों को तब बल मिला जब अखिलेश यादव ने कहा कि बसपा के साथ रिश्ते मजबूत हो रहे हैं और भविष्य में और भी गहरे होंगे। अखिलेश यादव ने कहा कि गठबंधन से पीडीए की संभावनाएं मजबूत होंगी। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब और राम मनोहर लोहिया ने भी राजनीति को नई दिशा देने के लिए मिलकर काम किया था। इतना ही नहीं मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने भी गठबंधन किया था। होली के गुलाल से पहले लखनऊ के सियासी गलियारों में ‘दोस्ती’ के नए रंग देखने को मिल सकते हैं। दरअसल, समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव ने गत दिनों एक ऐसा बयान दिया जिसने प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ‘सपा-बसपा गठबंधन’ की अटकलों को हवा दे दी है। अखिलेश यादव ने न केवल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ रिश्तों में गहराई आने की बात कही, बल्कि मायावती के कभी सबसे खास रहे नसीरुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी में शामिल कराकर अपने इरादे भी साफ कर दिए हैं। पीडीए प्रेम प्रसार समारोह’ के दौरान अखिलेश यादव काफी आत्मविश्वास में नजर आए। इस कार्यक्रम में लगभग 15,000 से अधिक लोगों ने विभिन्न दलों को छोड़कर सपा का दामन थामा। जनसभा को संबोधित करते हुए अखिलेश ने कहा, ‘समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं और आने वाले समय में ये और भी गहरे होंगे।’ अखिलेश ने अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को राज्य की प्रगति की नींव बताया। उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता ही सकारात्मक राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि है। दिलचस्प बात यह है कि अखिलेश अब इस जुड़ाव को केवल एक चुनावी समझौते के तौर पर नहीं, बल्कि एक स्थायी सामाजिक आंदोलन के रूप में पेश कर रहे थे। उनका सपा में आना एक बड़े रद्द-ओ-बदल (परिवर्तन या बदलाव) का संकेत है। उनके साथ अपना दल (सोनेलाल) के पूर्व विधायक राजकुमार पाल ने भी साइकिल की सवारी शुरू की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्दीकी जैसे अनुभवी नेता को साथ लेकर अखिलेश सीधे तौर पर बसपा के कैडर वोट बैंक में सेंध लगाने और मायावती को एक ‘सॉफ्ट सिग्नल’ देने की कोशिश कर रहे हैं।
याद दिला दें कि 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने हाथ मिलाकर भाजपा के विजय रथ को रोका था, लेकिन 1995 के कुख्यात ‘गेस्ट हाउस कांड’ ने ऐसी कड़वाहट पैदा की कि दोनों दल दो दशक तक एक-दूसरे के दुश्मन बने रहे। 2019 के लोकसभा चुनाव में ‘बुआ-बबुआ’ की जोड़ी फिर साथ आई, लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक न होने पर मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया था। अब सवाल यही है कि क्या 2027 की बिसात पर ये पुरानी दूरियां मिट पाएंगी? अतीत में सपा सरकार के दौरान यादव वर्चस्व की शिकायतों के कारण दलित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अखिलेश से छिटक गया था, लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में फैजाबाद (अयोध्या) जैसी सामान्य सीट से दलित नेता अवधेश प्रसाद की जीत ने सपा का हौसला बढ़ाया है। अखिलेश अब खुद पर लगे ‘दलित विरोधी’ टैग को हटाने के लिए प्रयासरत हैं। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



