सम-सामयिक

भारत की तकदीर का नया अध्याय है एआई

तमाम घरेलू विरोध और ओछी राजनीति के कुटिल विरोध को दरकिनार कर राजधानी दिल्ली में आयोजित पांच दिवसीय ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ सम्पन्न हो गया, लेकिन इस सम्मेलन की सफलता ने भारत को ग्लोबल साउथ में अग्रणी नेतृत्वकारी देश के रूप में स्थापित कर दिया है। इस शिखर सम्मेलन में 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया जाना न केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि है, बल्कि यह भारत की उस सोच की वैश्विक स्वीकृति भी है, जो तकनीक को मानव कल्याण से जोड़कर देखती है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रस्तुत ‘मानव-केंद्रित एआई दृष्टिकोण’ और ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखायश्’ के सिद्धांत को जिस तरह व्यापक वैश्विक समर्थन मिला है, वह बताता है कि दुनिया तकनीकी प्रगति को केवल आर्थिक लाभ लाभ के नजरिए से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर के संदर्भ में भी देखना चाहती है।21 फरवरी को 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने नई दिल्ली एआई इम्पैक्ट समिट डिक्लेरेशन का समर्थन किया। इनमें अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपियन यूनियन शामिल हैं।
इस घोषणापत्र में किए गए सारे कमिटमेंट स्वैच्छिक हैं, यानी ये उन देशों की इच्छा पर निर्भर है कि वे इसके मुताबिक कितना काम करते हैं। इन देशों ने इस समिट में सात चक्र में हुई चर्चाओं का संज्ञान लिया और कहा कि वे स्वीकार करते हैं कि दिल्ली में हुए एआई समिट से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास में अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलेगा, साथ ही राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान भी किया जाएगा। दुनिया भारतीय बुद्धिमत्ता के समक्ष नतमस्तक होगी वह दिन दूर नहीं है।
आपको पता हो कि 88 देशों और दो अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है। यह सिद्धांत केवल एक सांस्कृतिक वाक्यांश नहीं, बल्कि तकनीकी विकास के लिए एक नैतिक दिशा है। ऐसे समय में जब एआई को लेकर विश्व में प्रतिस्पर्धा, नियंत्रण और प्रभुत्व की राजनीति हावी है, भारत ने समावेशी और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत कर एक संतुलित विकल्प दिया है। समिट के दौरान एआई क्षेत्र में 250 अरब डॉलर के संभावित निवेश का भरोसा जताया जाना भारत की आर्थिक क्षमता और नीति स्थिरता पर वैश्विक विश्वास को दर्शाता है। यह निवेश केवल पूंजी का प्रवाह नहीं, बल्कि नवाचार, रोजगार और तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तार का अवसर है। साथ ही यह फंडिंग दर्शाती है कि दुनिया भारत को एआई के भविष्य के केंद्र के रूप में देख रही है। भारत पहले से ही आईटी और डिजिटल सेवाओं में वैश्विक केंद्र रहा है। अब एआई में नेतृत्व का अर्थ है कि उच्च्च कौशल वाले रोजगार, स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा और वैश्विक कंपनियों के लिए अनुसंधान एवं विकास का प्रमुख केंद्र बनना। यदि यह निवेश सही दिशा में लागू हुआ, तो भारत न केवल उपभोक्ता बल्कि एआई समाधानों का प्रमुख उत्पादक भी बन सकता है।
एआई की तीव्र प्रगति ने कई नैतिक और सुरक्षा संबंधी प्रश्न भी खड़े किए हैं, जिसमें डेटा गोपनीयता, एल्गोरिदमिक पक्षपात, साइबर सुरक्षा और रोजगार पर प्रभाव जैसी चिंताएं गंभीर हैं। भारत एआई इम्पैक्ट समिट का एक प्रमुख उद्देश्य वैश्विक सहयोग के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान खोजना था। भारत ने जिस प्रकार विकासशील देशों की आवाज को मंच दिया, वह अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया में संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह तथ्य कि पहला वैश्विक एआई शिखर सम्मेलन ग्लोबल साउथ में आयोजित हुआ, अपने आप में ऐतिहासिक है। लंबे समय तक तकनीकी विमर्श विकसित देशों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। भारत ने इस परंपरा को बदलते हुए यह दर्शाया कि नवाचार और नीति-निर्माण में विकासशील देशों की भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। ग्लोबल साउथ के कई देश डिजिटल अवसंरचना के विस्तार और डेटा आधारित शासन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल, आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर आदि पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा चुका है। अब एआई के क्षेत्र में भी इसी प्रकार का साझा मॉडल विकसित किया जा सकता है, जिससे छोटे और मध्यम आय वाले देशों को लाभ हो। भारत की युवा आबादी और तकनीकी प्रतिभा उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। विश्व की अग्रणी टेक कंपनियों में भारतीय मूल के विशेषज्ञों की मजबूत उपस्थिति यह दर्शाती है कि देश में गणित और इंजीनियरिंग की ठोस परंपरा है। चुनौती यह है कि यह प्रतिभा देश के भीतर शोध और उत्पाद विकास में रूपांतरित हो।
जनरेटिव एआई स्टार्टअप्स में बढ़ती फंडिंग एक सकारात्मक संकेत है। निवेशकों का बढ़ता भरोसा बताता है कि भारतीय उद्यमी केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि उत्पाद-निर्माता बनने की ओर अग्रसर हैं। हालांकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के स्तर तक पहुंचने के लिए दीर्घकालिक और धैर्यपूर्ण निवेश आवश्यक होगा। अनुसंधान-आधारित नवाचार को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों, उद्योग और सरकार के बीच मजबूत सहयोग की जरूरत है। एआई अब प्रयोगशाला की अवधारणा नहीं, बल्कि व्यावसायिक वास्तविकता बन चुका है। वित्त, बीमा, दूरसंचार, ई-कॉमर्स और विनिर्माण क्षेत्रों में एआई आधारित विश्लेषण और स्वचालन से उत्पादकता में वृद्धि देखी जा रही है। यदि यह प्रवृत्ति स्थायी बनती है, तो एआई भारत की आर्थिक वृद्धि दर में प्रत्यक्ष योगदान दे सकता है। विशेष रूप से कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में एआई के प्रयोग से सामाजिक प्रभाव की व्यापक संभावनाए हैं। कृषि में सटीक खेती, स्वास्थ्य में रोग-पूर्वानुमान, शिक्षा में अनुकूलित शिक्षण और पर्यावरण में जलवायु विश्लेषण ये सभी क्षेत्र भारत के विकास एजेंडा से सीधे जुड़े हैं। यदि एआई समाधान ग्रामीण भारत तक पहुंचते हैं, तो समावेशी विकास की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति संभव है।
भारत की बहुभाषी सांस्कृतिक संरचना एआई के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। यदि भारत भारतीय भाषाओं के लिए उच्च गुणवत्ता वाले डेटासेट और बहुभाषी मॉडल विकसित करता है, तो वह न केवल घरेलू बाजार को सशक्त करेगा, बल्कि वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए समाधान भी निर्यात कर सकेगा। मीडिया और रचनात्मक उद्योगों में एआई आधारित सामग्री निर्माण, अनुवाद और वॉयस इंटरफेस से नए आर्थिक अवसर उत्पन हो सकते हैं। एआई अवसंरचना के विस्तार के साथ ऊर्जा और जल-उपयोग जैसे प्रश्न भी जुड़े हैं। डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या पर्यावरणीय दबाव उत्पन कर सकती है। अतः एआई विकास को अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता नीतियों के साथ संतुलित करना आवश्यक है।
तकनीकी नेतृत्व तभी टिकाऊ होगा जब वह पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़े। साथ ही, एआई के कारण पारंपरिक नौकरियों पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए कौशल उन्नयन को नई पीढ़ी को उभरती तकनीकों के अनुरूप तैयार करना अनिवार्य है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत केवल डिजिटल उपभोक्ता रष्ट्र नहीं, बल्कि वैश्विक तकनीकी विमर्श का नेतृत्व करने में सक्षम है। समिट में शामिल देशों के द्वारा निवेश का भरोसा भारत के लिए अवसर के साथ-साथ उत्तरदायित्व भी लेकर आया है। एआई का युग मानव इतिहास के सबसे परिवर्तनकारी चरणों में से एक हो सकता है। यह तकनीक अवसर भी है और चुनौती भी।
(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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