गुलाल से गुझिया तक होली की मिठास

भारत में प्यार और उत्साह से भरपूर रंगों का त्योहार होली हमारे हिन्दू धर्म में मनाया जाता है। बहुत ही धूमधाम से यह त्योहार फाल्गुन के मार्च महीने में आता है। यह मुख्य रूप से पर्व वसंत ऋतु में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह दो दिनों का उत्सव है जिसमें पहले दिन होलिका दहन जिसे छोटी होली कहते हैं और दूसरा दिन जिसे बड़ी होली कहते हैं। इस दिन एक-दूसरे को रंग, गुलाल लगाकर मिठाईयां खिलाकर और गले मिलकर लोग एक दूसरे से खुशियां बांटते हैं। होली का समय खेती की कटाई का समय भी कहा गया है क्योंकि इस सीजन में फसलें बहुत अच्छे से की जा सकती हैं। जैसे गेहूं, सरसों, जौं, मटर इत्यादि और यह खेत में सुनहरे रंग बिखेरतीं हैं। खेती से जुड़ी हुयी चीजें इस समय किसान को बहुत मुनाफा देती हैं और खेत में सोना, चांदी जैसी उपज देखकर किसानों को बहुत संतुष्टि मिलती है और काफी मुनाफा होता है। त्योहार का यह भी एक कारण है।
इस समय आलू की मांग काफी तेजी से ब़ढ़ जाती है क्योंकि इस समय आलू के चिप्स और पापड़ बनते हैं। होली का संबंध सतयुग से बताया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार भक्त प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे। उन्होंने प्रहलाद को विष्णु जी की भक्ति करने से रोका था और जब वे नहीं माने तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने का प्रयास किया। जब वह बहुत प्रसास के बाद भी नहीं मर रहे थे तब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका की आग में न जलने का वरदान था। होलिका अपने भाई की मदद करने को तैयार हो गयी। होलिका प्रहलाद को लेकर चिता में बैठ गयी परन्तु विष्णु जी की कृपा से प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ पर होलिका उस आग में जलकर भस्म हो गयी। होलिका दहन की परंपरा यहीं से प्रारंभ हुई होगी यह कथा यह संदेश देती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।
होली का यह पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है पर उत्तर भारत में यह काफी उत्साह से मनाया जाता है। ब्रज, वृन्दावन, गोकुल में यह त्योहार बहुत उत्साह से मनाया जाता है। लोग अलग-अलग शहरों से इस त्योहार को खेलने यहां आते हैं। बहुत दिन पहले से ही यह त्योहार व्रज में मनाना शुरू हो जाता है। व्रज के बरसाने में जहां राधा रानी रहती थीं ऐसी प्रथा है कि पुरुष महिलाओं पर गुलाल, रंग डालते हैं और महिलायें उन्हें डन्डों से मारती हैं। यह एक बहुत पुरानी और प्रसिद्ध प्रथा है जिसे लोग दूर-दूर के शहर से देखने आते हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों में होली के गीतों के साथ मनाया जाता है। उत्तराखण्ड के कुमाऊं में गीतो की होली में संगोष्ठियों का आयोजन होता है जिसे बैठकी होली कहते हैं इससे मिलती जुलती परंपरा झारखंड में भी देखने को मिलती है। हरियाणा के धुलेंडी क्षेत्र में भाभी द्वारा देवर को उठाने की प्रथा है। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु की जयंती धूमधाम से मनायी जाती है। महाराष्ट्र में होली का पर्व रंग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। पंजाब में होली का पर्व होला मोहल्ला के रूप में मनाया जाता है। तमिलनाडु में यह पर्व कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोत्सव है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ की होरी में लोकगीतों की अदभुत परम्परा है। मालवा के अंचलों में यह पर्व भगोरिया नाम से बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
होली रंगोत्सव है अर्थात रंगों से एक दूसरे को सरावोर करने का त्योहार है। रंग खेलने का त्योहार है। रंग खेलने का इतिहास भी बहुत प्राचीन है। पहले ऐसे रंगों से होली खेली जाती थी जो हमारी त्वचा को बिना नुकसान पहुंचाए खुशबू देती थी, अभी भी कई शहरों में टेसू के फूलो से होली खेली जाती है जो काफी अच्छा माना जाता है। यह फूल से नारंगी रंग निकलता है। जो बिना किसी कैमिकल के होता है और लाभदायक होता है। गाने-बजाने के साथ-साथ लोग एक दूसरे के गले मिलते हैं। तरह-तरह के पकवान बनते हैं। गुझिया इस त्योहार की प्रमुख मिठाई में से एक है जो हर घर मे ंबनती है और इसे बनाना शुभ होता है। यह मिठाई खोवेे मेवे की बनती है और बहुत स्वादिष्ट होती है। इसे काफी अलग अंदाज में मनाया जाता है। नाचते-गाते त्योहार का आनंद लिया जाता है। 15 दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
संस्कृत साहित्य में होली के विभिन्न रूपों का वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुरण में भी इसका वर्णन किया गया है। नारद और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का वर्णन लिखा हुआ है। हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नालीला तथा कालिदास की कुमार संभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् में होली का वर्णन मिलता है।
रंगों के बिना होली फीकी है। प्राकृतिक रंग और गुलाल वसंत ऋतु के स्वागत में रौनक बढ़ाते हैं। यह प्यार, भाईचारा और खुशियों का प्रतीक है। कहा जाता है कि राधा और कृष्ण जी की कहानी इन्हीं रंगों से जुड़ी हुयी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृष्ण जी अपने सांवले रंग के लिये बहुत चिंतित रहते थे। राधा गोरी थीं। कृष्ण जी को लगता था कि वे सांवले हैं और राधा गोरी इसलिये वह उनको पसंद नहीं करेंगी। एक दिन मन की बात उन्होंने अपनी मां यशोदा को बतायी। यशोदा जी ने कहा कि तुम राधा के मुख पर कोई भी पसंदीदा रंग लगा दो। कृष्ण जी अपनी गोपियों के साथ राधा जी के पास गये और उनसे रंगों की होली खेली। उन्होंने राधा जी के चेहरे पर और राधा को कृष्ण के चेहरे पर एक जैसा रंग लगाया और उन दोनों का रंग एक हो गया। कहा जाता है कि वृंदावन और बरसाने की होली राधा-कृष्ण की उसी लीला का हिस्सा है। यह त्योहार प्रेम का प्रतीक है। रंग लगाने के बाद सभी लोग एक जैसे हो जाते हैं और जात-पात को कुछ समय के लिये भूल जाते हैं। यह कथा एक कथा प्रहलाद होलिका आदि हिरण्कश्यप से जुड़ी हुयी है। जहां होलिका (बुराई) जल जाती है। कहा जाता है कि जब होलिका जली थीं तब उसकी राख से सबने होली खेली थी। होली मनाने का सबसे सुरक्षित तरीका हर्बल, आर्गेनिक का घर पर बने रंगों का है।
घर पर रंग हम बड़े आसानी से बना सकते हैं। गुलाल बनाने के लिये मकई के आटे या आरारोट में हल्दी, चुकंदर, पालक या फूलों का रस मिलाकर लगायें। पीले रंग हल्दी, काॅर्नफ्लार लाल रंग आप चकन्दर से बना सकते हैं हरा रंग पालक के रस में बन सकता है। इन सबको धूप में रखकर छान लें। यह सब रंग त्वचा व बालों के लिये सुरक्षित हंै। टेसू के फूलों से भी लोग होली खेलते थे। आजकल के चलते बहुत से रंग आ गये हैं जो कैमिकल युक्त होते हैं और बहुत नुकसान दायक होते हैं। स्किन पर इंफेक्शन देते हैं और पिंपलस और टैनिंग का कारण बन जाते हैं। (चक्षु स्वामी-हिफी फीचर)



