संवैधानिक पदों की गरिमा

लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाएं अति महत्वपूर्ण होती हैं। राष्ट्रपति, राज्यपाल, लोकसभा और विधानसभाओं के अध्यक्ष भले ही सीधे-सीधे जनता के द्वारा नहीं चुने जाते लेकिन इनका दायित्व सदन मंे जनता का पक्ष निष्पक्ष रूप से रखने से ही जुड़ा है। इसीलिए राष्ट्रपति चुनी हुई सरकार का फैसला रोक सकता है, राज्यपाल भी सरकार को टोकता है और सदन के नेता पक्ष-विपक्ष के सदस्यों को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं। इन संवैधानिक पदों की गरिमा बनी रहनी चाहिए। इसके लिए सिफ्र विपक्षी दलों को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि दलगत राजनीति ने उच्च संवैधानिक पदों को भी संदेह के घेरे मंे खड़ा कर दिया है। अभी हाल ही मंे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पश्चिम बंगाल दौरे को लेकर इसी प्रकार का विवाद हुआ था। लोकसभा मंे स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ तो अविश्वास प्रस्ताव ही रखा गया। सत्तापक्ष का संख्या बल ज्यादा है, इसलिए अविश्वास प्रस्ताव का गिरना स्वाभाविक है लेकिन यह सवाल उठता है कि ऐसी नौबत क्यों आयी। गत 12 मार्च को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संवैधानिक पदों की गरिमा के उल्लेख के साथ अपना पक्ष भी रखा। लोकसभा में अब तक तीन बार ऐसी नौबत आयी है लेकिन हर बार तो नहीं आती। आजादी के बाद लोकसभा के चुनाव तो दो दर्जन बार हो चुके हैं। इसलिए उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को भी इस पर मंथन करना चाहिए। एक उदाहरण सोमनाथ चटर्जी का भी है जिन्होंने पद की गरिमा को कायम रखकर पार्टी का निर्देश ठुकरा दिया था।
लोकसभा में स्पीकर के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव ध्वनिमत से गिरने के बाद स्पीकर ओम बिरला 12 मार्च को सदन में वापस आ गए। वह अविश्वास प्रस्ताव के चलते सदन से दूर थे। वापसी के बाद स्पीकर ओम बिरला ने लोकसभा को संबोधित किया और अपना पक्ष रखा।
ओम बिरला ने सदन को संबोधित करते हुए कहा- स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में तीसरी बार लोकसभा ने अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की। मैंने हमेशा यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि सदन में प्रत्येक सदस्य नियमों और प्रक्रियाओं के भीतर मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करे। ओम बिरला ने कहा- लोकसभा ने मुझे हटाने के प्रस्ताव पर 12 घंटे तक चर्चा की, जहां विपक्ष ने निष्पक्षता पर चिंता जताई। विपक्ष ने ये भी कहा कि सदन में उसकी आवाज दबाई गई। ये सदन 140 करोड़ भारतीय लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। मैंने हमेशा यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि सदन में हर सदस्य को नियमों और प्रक्रियाओं के तहत अपनी बात व्यक्त करने का मौका मिले। मैंने हमेशा उन लोगों को भी प्रोत्साहित किया है जो सदन की कार्यवाही में भाग लेने से झिझकते हैं।
ओम बिरला ने कहा जिस दिन विपक्ष ने मुझे अध्यक्ष पद से हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया, उस दिन मैं सदन की कार्यवाही से दूर रहा। उन सभी को धन्यवाद जिन्होंने मेरे खिलाफ प्रस्ताव पर बहस के दौरान मेरा समर्थन किया या आलोचनात्मक विचार दिये। कुर्सी किसी एक व्यक्ति की नहीं होती बल्कि सदन की प्रतिष्ठा का प्रतीक होती है। सदन द्वारा मुझ पर जताए गए विश्वास के लिए आभारी हूं। ओम बिरला ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने से रोकने के आरोप पर भी जवाब दिया। उन्होने कहा- सदन में हर सदस्य को नियम के अनुसार बोलने का अधिकार है। लोकसभा में नियमों से ऊपर कोई नहीं है। वे सभी पर लागू होते हैं। यहां तक कि पीएम, मंत्रियों को भी बयान देने के लिए सदन के नियमों के तहत नोटिस देना पड़ता है। कुछ सदस्यों का मानना था कि नेता प्रतिपक्ष सदन से ऊपर हैं और किसी भी विषय पर बोल सकते हैं, लेकिन ऐसा विशेषाधिकार किसी को नहीं है और सभी को नियम के अनुसार ही बोलने का अधिकार है। ये नियम सदन ने ही बनाए हैं और मुझे विरासत में मिले हैं।
स्पीकर ओम बिरला ने अपना पक्ष बेहतर तरीके से रखा लेकिन यहां लगभग 20 साल पहले का एक उदाहरण देना समीचीन है। उस समय लोकसभा
अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी थ्ेा। 20 अप्रैल से 10 मई 2004 तक चार चरणों में हुए भारतीय आम चुनाव के बाद 14 वीं लोकसभा (2 जून 2004 से 18 मई 2009) का गठन हुआ , जिसके परिणामस्वरूप मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पहली सरकार बनी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने 13वीं लोकसभा की तुलना में 62 अधिक सीटें जीतीं। लोकसभा में माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी स्पीकर बने। पार्टी के निर्देशों की अवहेलना करते हुए, उन्होंने सदन के अध्यक्ष के पद पर बने रहने का फैसला किया था और विश्वास मत के दौरान भी इसी भूमिका में कार्य किया। 23 जुलाई 2008 को हुए मतदान में सरकार को बहुमत प्राप्त हुआ, जिसके बाद सीपीआई (एम) ने उन्हें पार्टी अनुशासन के उल्लंघन के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया। वह कहते थे स्पीकर किसी पार्टी का नहीं होता।
सोमनाथ चटर्जी (25 जुलाई 1929- 13 अगस्त 2018) एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जो अपने जीवन के अधिकांश समय तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े रहे, हालांकि अपने अंतिम दशक में वे किसी भी पार्टी से संबद्ध नहीं थे। वे 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे। सोमनाथ चटर्जी (25 जुलाई 1929 – 13 अगस्त 2018) एक भारतीय राजनीतिक थे, जो अपने जीवन के अधिकांश समय तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े रहे, हालांकि अपने अंतिम दशक में वे किसी भी पार्टी से संबद्ध नहीं थे। वे 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे। चटर्जी का जन्म पूर्वोत्तर भारत के असम राज्य में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ। उनके पिता निर्मल चंद्र चटर्जी एक वकील, न्यायविद और सांसद थे, जो हिंदू महासभा के एक प्रमुख सदस्य थे। हिंदू महासभा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्ववर्ती, हिंदू समर्थक विचारधारा वाली संस्था थी। चटर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की , जिसके बाद उन्होंने इंग्लैंड में अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और लंदन के मिडिल टेम्पल (जो कि एक प्रतिष्ठित न्यायालय है ) से कानून की उपाधि प्राप्त की। भारत लौटने पर, उन्होंने वकालत का पेशा अपनाया, जिसमें कलकत्ता उच्च न्यायालय और भारत के सर्वोच्च न्यायालय में बैरिस्टर के रूप में कार्य करना शामिल था। चटर्जी 1968 में सीपीआई (एम) में शामिल हुए। उन्होंने पहली बार 1971 में चुनाव लड़ा और पश्चिम बंगाल राज्य के उस लोकसभा क्षेत्र से जीत हासिल की, जिस पर उनके पिता का कब्जा था। वे राज्य के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों से लगातार निर्वाचित होते रहे। हालांकि 1984 के चुनाव में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस पार्टी) की ममता बनर्जी से हार गए , लेकिन अगले ही वर्ष उन्होंने एक अन्य सीट से उपचुनाव जीता। वे अपने प्रभावशाली भाषणों के लिए जाने जाने वाले एक सम्मानित सांसद बने और उन्हें 1996 में उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जून 2004 में लोकसभा अध्यक्ष के रूप में सर्वसम्मति से चुने जाने के बाद, चटर्जी ने सदन के कामकाज को सुव्यवस्थित करने और सदस्यों के आचरण में सुधार लाने का प्रयास किया। उन्होंने जल्द ही सदन की कार्यवाही का सीमित सीधा प्रसारण शुरू किया, जिसे जुलाई 2006 में 24 घंटे के टेलीविजन कवरेज में बदल दिया गया। लोकसभा मंे इस तरह के स्पीकर आज भी याद किये जाते हैं।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



