स्कूली बच्चियों के खून का गुनाहगार है अमेरिका

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक तरफ नोवेल का शांति पुरस्कार लेना चाहते हैं, वहीं ईरान में एक स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अब पेंटागन की शुरुआती जांच रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि 28 फरवरी को ईरान के मिनाब शहर में स्थित शजराह तैय्यबेह स्कूल पर हुआ हमला दरअसल अमेरिकी सेना की एक गंभीर गलती का नतीजा था। जांच के मुताबिक अमेरिकी सेना उस इलाके में एक ईरानी नौसैनिक ठिकाने को निशाना बना रही थी लेकिन टार्गेट तय करते समय पुराने और गलत टार्गेटिंग डेटा का इस्तेमाल किया गया। इसी वजह से दागी गई टॉमहॉक क्रूज मिसाइल अपने असली लक्ष्य से भटक गई और सीधे स्कूल की इमारत से जा टकराई।
ईरान युद्ध के दौरान अमरीका द्वारा किए गए ए. आई. के इस्तेमाल और इस निशाने में हुई चूक के कारण स्कूली बच्चियों की मौत ने दुनिया में नई बहस छेड़ दी है।
शुरुआती जांच में माना गया है कि यह हमला जानबूझकर नहीं किया गया था, बल्कि खुफिया जानकारी और टार्गेटिंग सिस्टम में हुई चूक के कारण यह हादसा हुआ। इस घटना के बाद अमेरिकी सैन्य तंत्र के अंदर भी टार्गेटिंग प्रक्रिया और डेटा की सटीकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। वहीं इस हमले को लेकर जो खुलासा सामने आ रहा है उसमे गंभीर चूक का अनुमान है पुरानी इंटेलिजेंस की वजह से शायद अमेरिका ने ईरान के एक एलिमेंट्री स्कूल पर जानलेवा मिसाइल हमला किया, जिसमें लड़ाई के शुरुआती घंटों में 165 से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें से ज्यादातर बच्चे थे। स्कूल पर बमबारी और उसमें बच्चों की मौत युद्ध का मुख्य मुद्दा बन गई है।
अग्रणी ए.आई. कंपनी एंथ्रोपिक ने इस साल जनवरी ही में पेंटागन के उस अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया, जिसके तहत अमरीकी सेना को सभी वैध उद्देश्यों के लिए उसकी तकनीक तक असीमित पहुंच मिल जाती। अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए, एंथ्रोपिक के सी.ई.ओ. डारियो अमोदेई ने 2 स्पष्ट शर्तें रखीं-अमरीकियों की बड़े पैमाने पर जासूसी नहीं की जाएगी और मानवीय निगरानी के बिना पूरी तरह से स्वायत्त हथियारों का इस्तेमाल युद्ध में नहीं किया जाएगा!
इस निर्णय से एंथ्रोपिक को भारी नुकसान हुआ, परन्तु प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने तुरंत पेंटागन के साथ मानव नियंत्रण के बिना पूर्ण ए.आई. नियंत्रण के लिए समझौता कर लिया। इस समझौते के बाद अमरीका और इसराईल ने ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान शुरू कर दिया। युद्ध के पहले ही दिन 28 फरवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके 10 टॉप कमांडरों की हत्या उनके परिसर में कर दी गई, जिसे दोनों देशों ने ए.आई. पर्शियन हमले की एक बड़ी जीत माना लेकिन उसी दिन, 28 फरवरी को, एक और घातक हमला मीनाब में स्थित शजराह तैयबा गर्ल्स स्कूल पर भी किया गया। 2 मिसाइलों ने 45 सैकेंड में स्कूल को नष्ट कर दिया था। मीनाब में जो हुआ, वह ए.आई. के अंधाधुंध उपयोग का सबसे भयावह उदाहरण है।
शजराह तैयबा गल्र्स प्राइमरी स्कूल, जिसमें 165 से अधिक मासूम बच्चियां मौत से लड़ती, चीखती- चिल्लाती रहीं, तकनीकी भाषा में इसे सटीक हमला कहा गया। ट्रम्प यह दावा कर रहे हैं कि लड़कियों के स्कूल पर ईरान ने टोमहॉक मिसाइल से हमला किया था, जबकि सभी जानते हैं कि ईरान के पास यह मिसाइल नहीं है, यहां तक कि इसराईल के पास भी नहीं है, इसलिए उनके द्वारा सोशल मीडिया पर फैलाए गए झूठ से सच को छिपाने का काम किया जा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू में हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया, बाद में कहा कि उन्हें पक्का नहीं पता कि कौन दोषी है, और फिर कहा कि वह पेंटागन की जांच के नतीजों को मान लेंगे। हाल ही में यह मामला और ज्यादा पेचीदा हो गयी जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहली बार रिपोर्ट किया कि शुरुआती जांच में पाया गया कि यूएस जिम्मेदार है। शुरुआती नतीजों के बाद पेंटागन से तुरंत और जानकारी मांगी गई। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने कहा कि जांच अभी भी चल रही है।
28 फरवरी को शजारेह तैयबा एलिमेंट्री स्कूल पर हुआ हमला, जो ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के पास के बेस के पास है। हमले के लिए अमेरिका की जिम्मेदारी की ओर इशारा करते हुए सबूत बढ़ रहे हैं। ऐसे कई संकेत हैं जिससे पता चलता है कि स्कूल पर हमला टाला जा सकता था। ये हमले 28 फरवरी की सुबह हुए थे। तब स्कूल की बिल्डिंग छोटे बच्चों से भरी हुई थी। न्यूज रिपोर्ट से पता चलता है कि उसी दिन हमले वाले दूसरे टारगेट, हवा से दिखने वाली ऐसी खासियतें थीं जिनसे हमले से पहले उन्हें सिविलियन साइट के तौर पर पहचाना जा सकता था। इस हमले के वीडियो में एक्सपर्ट्स ने अमेरिका में बनी टॉमहॉक क्रूज मिसाइल को मिलिट्री कंपाउंड में टकराते हुए देखा है जबकि उस इलाके से पहले से ही धुआं उठ रहा था जहां स्कूल था।
पब्लिक में मौजूद सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि स्कूल बिल्डिंग लगभग 2017 तक मिलिट्री कंपाउंड का हिस्सा थी, जब दोनों को अलग करने के लिए एक नई दीवार बनाई गई। प्रॉपर्टी पर एक वॉचटावर भी हटा दिया गया था। उसी समय की तस्वीरों से पता चलता है कि बिल्डिंग के चारों ओर की दीवारों पर चमकीले रंगों, खासकर नीले और गुलाबी रंग के म्यूरल बनाए गए थे। ये इतने चमकीले थे कि वे स्पेस से भी दिखाई देते हैं। स्कूल को ऑनलाइन मैप पर साफ तौर पर लेबल किया गया था और इसकी एक आसानी से मिलने वाली वेबसाइट है जिसमें स्टूडेंट्स, टीचर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स के बारे में जानकारी भरी हुई है।
युद्ध को कंट्रोल करने वाला इंटरनेशनल कानून उन स्ट्रक्चर्स, गाड़ियों और लोगों पर हमले करने से रोकता है जो मिलिट्री के निशाने और लड़ाके नहीं हैं। आम लोगों के घर, स्कूल, मेडिकल फैसिलिटी और कल्चरल जगहें आम तौर पर मिलिट्री हमलों के लिए बंद रहती हैं। बताया जा रहा है कि यह सारा मामला एआइ की चूक से हुआ है।
दरअसल 10 साल पहले इस क्षेत्र पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आई।आर।जी।सी।) ईरानी सशस्त्र बलों का एक सैन्य परिसर था। डाटाबेस अपडेट न होने के कारण ए.आई. को यह मालूम नहीं पड़ा कि अब उसी स्थान पर बाईं ओर एक अस्पताल और दाईं तरफ एक अलग प्रवेश द्वार वाला स्कूल मौजूद है।ए.आई. एल्गोरिद्म यह भी समझने में नाकाम रहा कि 7 से 12 साल की बच्चियां दुश्मन नहीं होतीं। एक मशीन के लिए वे केवल कोलेटरल डैमेज थीं। यह घटना साबित करती है कि जब हम युद्ध का पूर्ण नियंत्रण ए. आई. को देते हैं, तो हम युद्ध के मैदान से दया और विवेक को पूरी तरह से खत्म कर देते हैं। ए.आई. आधारित व्यापक निगरानी हमारी मौलिक स्वतंत्रताओं के लिए गंभीर और नए प्रकार के खतरे पैदा कर सकती है।किंग्स कॉलेज लंदन की रिसर्च ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि उन्नत ए. आई. मॉडल्स युद्ध की स्थिति में 95 प्रतिशत बार परमाणु विकल्प या अत्यधिक आक्रामकता को चुनते हैं। मशीनों के लिए जीत ही एकमात्र लक्ष्य है, चाहे उसकी कीमत पूरी दुनिया का विनाश ही क्यों न हो। अगर हम आज ए।आई। को रक्षा क्षेत्र और समाज में खुली छूट देते हैं, तो हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जहां युद्ध का फैसला जनरल नहीं, बल्कि एक कोडिंग प्रोग्राम करेगा।
(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)



