नक्सली मुक्ति का सुखद अध्याय

हमारे देश में निश्चित रूप से 30 मार्च 2026 का दिन स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा जब केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में ऐलान किया कि तय समय सीमा के एक दिन पहले ही भारत नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है। गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 की समय सीमा तय की थी। नक्सली हमारे ही देश के भटके हुए युवा थे जो हिंसा के रास्ते पर चल चुके थे। इन्होंने बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल को भी अपना ठिकाना बनाया था। पश्चिम बंगाल की नक्सलवाड़ी से शुरू हुआ यह प्रतिशोधात्मक आंदोलन उनके नेताओं के हाथ से भी निकल गया था। इसीलिए नक्सलवाद के जन्मदाताओं मंे एक कानू सान्याल ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पश्चिम बंगाल में तत्कालीन सरकार की सख्ती के चलते देश के दूसरे राज्यों तक यह आंदोलन फैला और सबसे ज्यादा प्रभावित छत्तीसगढ़ रहा। नक्सलियों को देश की मुख्यधारा में लाने के प्रयास प्रारम्भ से ही किये गये लेकिन भाजपा सरकार के गृहमंत्री अमित शाह ने इसके लिए ठोस रणनीति बनायी। पुनर्वास के साथ ही गोली का जवाब गोली से दिया गया। वर्ष 2024 से 26 के दौरान 463 नक्सली मारे गये और 1600 को गिरफ्तार किया गया। सुखद आंकड़ा यह कि 2500 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। माना जा रहा था कि साढ़े 6 हजार सक्रिय नक्सली थे, जिनकी संख्या अब शून्य के लगभग है। हो सकता है इक्का-दुक्का बचे होें लेकिन एक दुखद अध्याय का अंत हो चुका है। अब सरकार का मुख्य फोकस इस बात पर है कि नक्सलियों की बंदूक से डरे स्थानीय आदिवासियों और गांव वालों का भरोसा जीता जाए। उन क्षेत्रों मंे विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ाई जाए।
देश के कई हिस्सों में जहां कभी बारूदी सुरंगों की गूंज और माओवादियों के डर से जिंदगी सहमी रहती थी, वहां आज शांति और विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। दशकों तक जिन जंगलों में घुसना असंभव सा लगता था, वहां सुरक्षा बलों ने ऐसा चक्रव्यूह रच दिया कि आज नक्सलवाद का खात्मा हो गया है। गृहमंत्री अमित शाह के अनुसार भारत से नक्सली आतंकवाद का पूरी तरह सफाया हो गया। आखिर सुरक्षा बलों ने इस नामुमकिन से लगने वाले टारगेट को कैसे हासिल किया? हथियारों के जोर पर जबरदस्ती भर्तियां करने वाले नक्सलियों से आम पब्लिक को कैसे आजाद कराया? डीआरजी और बस्तर फाइटर्स ने कैसे इस पूरे ऑपरेशन्स की दिशा बदली? इस बारे मंे आईजी सुंदरराज पट्टिलिंगम कहते हैं कि नक्सली समस्या का समाधान करना शासन का एक मजबूत संकल्प था। उसी संकल्प के तहत हमने अपने सभी प्रयासों को दिशा दी है। अगर हम ऑपरेशनल मोर्चे पर बात करें, तो हमारी जितनी भी स्पेशल फोर्सेज हैं-डीआरजी, एसटीएफ, बस्तर फाइटर्स, कोबरा और सेंट्रल पैरामिलिट्री फोर्सेज जैसे सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और छत्तीसगढ़ आर्म्ड पुलिस- इन सभी ने एक साथ बेहतर तालमेल के साथ काम किया। इसके ऑपरेशनल नतीजे काफी निर्णायक रहे हैं। इसके साथ ही, हमारा सभी वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों के बीच बेहतर अंतर-राज्यीय तालमेल रहा है। गृह मंत्रालय लगातार इसे कोऑर्डिनेट करता रहता है। उन्होंने बताया, पूर्व में नक्सली इस चीज का फायदा उठाते थे कि यदि एक राज्य में ऑपरेशन चल रहा है और दूसरे में नहीं, तो वे दूसरे राज्य में जाकर कुछ समय के लिए शरण ले लेते थे और बाद में फिर से रीग्रुप हो जाते थे।
इस परिस्थिति को देखते हुए गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के बीच ऐसा समन्वय बनाया है कि नक्सलियों के पास भागने और छुपने के लिए कोई जगह नहीं बची है। हर जगह उन पर काफी दबाव बना हुआ था, जिसके कारण उनकी टॉप लेवल लीडरशिप को भी भारी नुकसान हुआ। माओवादियों की सेंट्रल कमिटी के टॉप कैडर, बसवराजू, का शव मई, 2025 में अबूझमाड़ के जंगलों से बरामद किया गया था। उसके बाद से लगातार बस्तर और बाकी राज्यों में भी शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हुई है।
बस्तर रेंज के आईजी बताते हैं कि इसके परिणामस्वरूप माओवादियों की लीडरशिप लगभग समाप्त हो चुकी थी और जो कुछ बचे, वे पुनर्वास के लिए सामने आ रहे थे। अब केवल मुट्ठी भर कैडर ही बचे होंगे।
यह पूरा नक्सल संगठन आतंक के बल पर ही चलने वाला संगठन रहा है। 1967 में जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब वे जरूर जल, जंगल और जमीन के विषय को लेकर लोगों के बीच गए थे लेकिन बाद में उनकी दिशा और दशा बदल गई। वे धीरे-धीरे हिंसात्मक गतिविधियों पर ज्यादा विश्वास करने लगे। जो भी उनकी बातों में नहीं आता था, उसे डराने-धमकाने के लिए मारना-पीटना और हत्या करना जैसी गतिविधियों में वे काफी संलिप्त हो गए थे। सुरक्षा बलों पर हमला करना, हथियार लूटना और काफी क्रूरता दिखाना ही उनका मोडस ऑपरेंडी बन गया था।
उन्होंने बताया, इससे जनता के मन में भी इनके प्रति एक प्रकार का भय और आतंक बैठ गया था। इसी का फायदा उठाकर उन्होंने जबरन भर्तियां कीं। कम उम्र के बालक-बालिकाओं, बच्चों और युवा-युवतियों को अपने संगठन में भर्ती किया और धीरे-धीरे अपने आधार क्षेत्र को बढ़ा लिया।
ऐसे मंे जनता को यह लगने लगा कि ये हमारे हितैषी नहीं हैं, तो इनके खिलाफ माहौल बनने लगा। इसके विरोध में दो-तीन बार जन आंदोलन भी शुरू हुए। 1991-92 में भी हुआ और बाद में 2004-05 में भी, लेकिन दोनों ही बार माओवादियों ने जन आंदोलनों को काफी हिंसक तरीके से कुचल दिया। बाद में शासन ने अंदरूनी इलाकों तक काफी पुलिस कैंप खोले और सड़कों का पुनर्निर्माण किया। इस प्रकार जब शासन, प्रशासन और पुलिस की पहुंच जनता तक होने लगी, तब जनता में यह विश्वास आया कि अब हमें नक्सलियों से डरने की कोई जरूरत नहीं है।
भौगोलिक क्षेत्रफल के हिसाब से देखा जाए तो बस्तर लगभग 42 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ एक बहुत विशाल क्षेत्र है। लगभग 60 प्रतिशत इलाका वन क्षेत्र है। यहां की आबादी अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग भाषाएं और बोलियां बोलती है। शुरुआत में इन सभी चीजों को समझना सुरक्षा बलों के लिए काफी कठिन था। तब खुफिया जानकारी भी नहीं मिलती थी और सुरक्षा बल भी कम था।
बाद मंे डीआरजी और बस्तर फाइटर्स का गठन हुआ, पैरामिलिट्री फोर्सेज को तैनात किया गया और नए कैंप तथा थाने खोले गए। वायुसेना से हेलिकाप्टर भी उपलब्ध कराए गये। ग्रेहाउंड्स या कोबरा जैसी स्पेशल फोर्सेज के गठन ने इस पूरी लड़ाई की दिशा बदल दी। इसका नतीजा यह रहा कि भारत नक्सलवाद से मुक्त हो गया है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



