लेखक की कलम

आतंकी मसूद अजहर के भाई की मौत

पाकिस्तान से आई एक खबर ने एक बार फिर दक्षिण एशिया में सक्रिय आतंकी नेटवर्क और उससे जुड़े चेहरों को चर्चा में ला दिया है। मोहम्मद ताहिर अनवर, जो मसूद अजहर के भाई और आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े एक सक्रिय सदस्य माने जाते थे, उनकी पाकिस्तान में मौत हो गई है। हालांकि, उनकी मौत के कारणों को लेकर अब तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, जिससे कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।
उधर, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच टकराव एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है। डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और सैन्य कार्रवाई ने इस संघर्ष को और तीखा बना दिया है। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान के इस्फहान शहर पर किए गए हमले ने यह संकेत दिया है कि यह केवल सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक संदेश भी है।
ताहिर अनवर लंबे समय से जैश-ए-मोहम्मद की गतिविधियों से जुड़े हुए थे और संगठन के भीतर उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता था। संगठन की ओर से जारी सूचना के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार बहावलपुर स्थित जामिया मस्जिद उस्मान वली में किया गया लेकिन उनकी मौत अचानक कैसे हुई, इस पर चुप्पी बनी हुई है। न तो किसी बीमारी का जिक्र किया गया है और न ही किसी हमले या घटना की पुष्टि की गई है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को लेकर संदेह और अटकलों का दौर जारी है। जैश-ए-मोहम्मद कोई छोटा या सीमित प्रभाव वाला संगठन नहीं है। यह वही आतंकी संगठन है, जिसका नाम भारत में हुए कई बड़े हमलों से जुड़ा रहा है। वर्ष 2001 में भारतीय संसद पर हमला, 2016 का पठानकोट एयरबेस हमला, उरी में सेना के जवानों पर हमला और 2019 का पुलवामा हमला-इन सभी घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। पुलवामा हमले में तो 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे, जिसने पूरे देश में गहरा आक्रोश पैदा किया था।
इन हमलों के जवाब में भारत ने भी कड़ा रुख अपनाया। भारतीय सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान के भीतर स्थित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए कड़ी कार्रवाई की। बहावलपुर, जो जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख गढ़ माना जाता है, वहां भी भारतीय सेना ने संगठन को भारी नुकसान पहुंचाया। विशेष रूप से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत किए गए हमले में मसूद अजहर के कई करीबी रिश्तेदार मारे गए थे। इस हमले में संगठन के मुख्यालय जामिया मस्जिद सुभान अल्लाह को भी भारी क्षति पहुंची थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस कार्रवाई में मसूद अजहर के परिवार के लगभग दस सदस्य मारे गए थे, जिनमें उसकी बहन, बहनोई, भतीजे-भतीजी और अन्य रिश्तेदार शामिल थे। इसके अलावा, संगठन के कई प्रमुख सहयोगी भी इस हमले में ढेर हो गए थे। यह पहली बार था जब जैश-ए-मोहम्मद ने अप्रत्यक्ष रूप से इन नुकसानों को स्वीकार किया था।
ऐसे में ताहिर अनवर की मौत को केवल एक सामान्य घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है, जब पहले से ही संगठन दबाव में है और उसके कई ठिकानों को नुकसान पहुंच चुका है। उनकी मौत के पीछे की वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इसका असर संगठन की आंतरिक संरचना और मनोबल पर पड़ना तय माना जा रहा है।
अंततः, यह घटना एक बार फिर इस बात को रेखांकित करती है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जटिल और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। ताहिर अनवर की मौत के पीछे की सच्चाई भले ही अभी सामने न आई हो, लेकिन इसके निहितार्थ आने वाले समय में जरूर स्पष्ट होंगे।
पश्चिम एशिया में इस्फहान, जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है, इस हमले का प्रमुख निशाना बना। अमेरिकी सूत्रों के अनुसार, इस ऑपरेशन में 2000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों का इस्तेमाल किया गया। ये ऐसे अत्याधुनिक हथियार होते हैं जो जमीन के भीतर गहराई तक छिपे ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम होते हैं। इस तरह के हमले से यह साफ होता है कि अमेरिका का लक्ष्य केवल सतही ढांचे नहीं, बल्कि ईरान की गहराई में मौजूद रणनीतिक क्षमताओं को कमजोर करना है।
इस अभियान में बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर का इस्तेमाल किया गया, जिसे दुनिया के सबसे उन्नत सैन्य विमानों में गिना जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह रडार से लगभग अदृश्य रहता है और भारी-भरकम बमों को सटीकता के साथ अपने लक्ष्य तक पहुंचा सकता है। यही कारण है कि इसे विशेष रूप से ऐसे मिशनों के लिए तैयार किया गया है, जहां दुश्मन की सुरक्षा व्यवस्था बेहद मजबूत हो। इससे पहले भी अमेरिका ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों-फोर्डो, नतांज और इस्फहान- पर हमला कर चुका है। मौजूदा कार्रवाई उसी रणनीति का विस्तार मानी जा रही है, जिसमें ईरान की परमाणु क्षमताओं को सीमित करने की कोशिश की जा रही है। ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि कोई समझौता नहीं होता, तो ईरान के ऊर्जा ढांचे को पूरी तरह नष्ट किया जा सकता है।
हालांकि, इस तरह की सैन्य कार्रवाई केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव भी हो सकते हैं। पश्चिम एशिया पहले से ही अस्थिर क्षेत्र रहा है, और इस तरह के हमलों से क्षेत्रीय युद्ध का खतरा और बढ़ सकता है। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। इसके साथ ही, इस संघर्ष का मानवीय पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी भी सैन्य कार्रवाई का सबसे बड़ा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है, जो हिंसा और अस्थिरता के बीच जीवन जीने को मजबूर होते हैं। इस तरह के हमले केवल सैन्य ठिकानों को नहीं, बल्कि समाज की संरचना को भी प्रभावित करते हैं।
अंततः, ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ यह दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि रणनीति, तकनीक और कूटनीति का जटिल मिश्रण है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा
कि यह टकराव आगे किस दिशा में जाता है। क्या यह और गहराता है
या फिर कूटनीतिक प्रयासों के
जरिए कोई समाधान निकलता है। दुनिया की नजरें फिलहाल इसी पर टिकी हैं। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)

 

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