लेखक की कलम

बस्तर में अबस्तर में अब विकास की जरूरतब विकास की जरूरत

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे क्षेत्र बस्तर में अब विकास की जरूरत है। इसके साथ ही वहां जल्दबाजी में फोर्स को भी हटाना ठीक नहीं होगा। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने समयोचित टिप्पणी की। विजय शर्मा उप मुख्यमंत्री के साथ राज्य के गृह मंत्री का भी दायित्व संभाले हुए हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद मिटाने का वादा किया था। उन्होंने निर्धारित अवधि के एक दिन पहले ही अर्थात 30 मार्च को राज्यसभा में नक्सल मुक्त भारत की घोषणा कर दी। नक्सल मुक्त अभियान में बड़ी संख्या में पुलिस बल लगाया गया था और गोली का जवाब गोली से देने की रणनीति बनायी गयी। विभिन्न राज्यों में जिस तरह से समन्वय स्थापित किया गया, उससे नक्सलियों के सामने दो ही रास्ते बचे थे। पहला यह कि आत्म समर्पण कर देश की मुख्यधारा में शामिल हो जाएं और दूसरा यह कि सुरक्षा बलों की गोलियों का सामना करें। इस अभियान में हजारों की संख्या में नक्सली मारे गये और गिरफ्तार हुए लेकिन इससे बड़ी संख्या में उन्होंने आत्म समर्पण किया। इस प्रकार जिन नक्सलियों ने समर्पण नहीं किया था उन्होंने जगह-जगह विस्फोटक आईईडी बिछा दी है। अब नक्सल मुक्त बस्तर की जगह आईईडी मुक्त बस्तर भी बनाना होगा। इसके साथ ही जिन नक्सलियों ने आत्म समर्पण किया है उनको पुनर्वासित करने का दायित्व भी सरकार को ही निभाना है।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री विजय शर्मा ने बस्तर से फोर्स वापसी पर कहा कि यदि आपका ऑपरेशन हुआ हो और कल बोलेंगे डॉक्टर हटा लो, मैं निपटा लूंगा, तो क्या यह ठीक होगा? इसके बाद उन्होंने कहा कि अभी आईईडी बस्तर की जमीन के नीचे दबे हुए हैं। उसे हम निकालेंगे या फोर्स निकालेगी? उन्होंने कहा कि आईईडी हटाने की एक विशेष टेक्नोलॉजी है, उस पर फोर्स काम करती है। अभी यही काम चल रहा है। हम लोग कोशिश करेंगे नक्सल मुक्त बस्तर की तरह की तरह आईईडी मुक्त बस्तर बना दें।
उपमुख्यमंत्री ने नक्सल मुक्त गांवों को दी जाने वाली एक करोड़ रुपये की सहायता राशि के बारे में बताया कि अब तक दो गांवों को यह राशि प्रदान की जा चुकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह योजना पंचायतों के प्रस्ताव के आधार पर ही लागू की जाती है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने नक्सलवाद के नाम पर कभी कोई काम नहीं किया, उनका यह आरोप मन का शिगूफा है, क्योंकि उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों या झीरम में शहीद हुए जवानों के लिए भी कुछ नहीं किया। उन्होंने बताया कि ‘बुआन पंचायत’ योजना के तहत केवल उन्हीं गांवों को यह सहायता दी गई है, जिन्होंने नक्सल मुक्त होने के लिए प्रस्ताव दिया और वास्तविक कार्य भी किया।
शर्मा कहते हैं कि बस्तर के कई गांवों में पहले स्कूल, अस्पताल, बिजली, आंगनबाड़ी, सड़क और मोबाइल टावर जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव था, लेकिन अब सरकार इन क्षेत्रों में तेजी से विकास कार्य कर रही है। वहीं, अर्बन नक्सल के मुद्दे पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरकार की नीति साफ है, हथियार छोड़कर संविधान के दायरे में आना ही एकमात्र रास्ता है।
गौरतलब है कि 24 अगस्त 2024 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक माओवाद खत्म करने का लक्ष्य घोषित किया था, जिसे 584 दिनों के अभियान के जरिए पूरा करने का दावा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं हो जाता है। माओवाद के खिलाफ चलाया गया यह अभियान उसी का उदाहरण बनकर सामने आया है। सुरक्षा बलों, सरकार की योजनाओं, सामाजिक संगठनों और संवाद की रणनीति ने मिलकर इस अभियान को सफल बनाया। शर्मा ने बताया कि 21 जनवरी 2024 को रायपुर में माओवाद प्रभावित राज्यों के डीजीपी और केंद्रीय एजेंसियों के प्रमुखों की अहम बैठक हुई थी। इसी बैठक में पहली बार माओवाद के पूर्ण खात्मे पर गंभीर चर्चा कर रणनीति तैयार की गई थी। इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री ने सीआरपीएफ, बीएसएफ समेत सभी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे माओवाद के खिलाफ एक ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करें। यही वह बिंदु था, जहां से निर्णायक रणनीति की शुरुआत हुई। उन्होंने कहा कि सरकार ने सिर्फ सशस्त्र कार्रवाई पर ही निर्भर नहीं किया, बल्कि “गोली और बोली” की रणनीति अपनाई। जहां जरूरत पड़ी, वहां कड़ी कार्रवाई की गई, वहीं दूसरी ओर संवाद और समझाइश के जरिए लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया गया। उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बस्तर क्षेत्र के आदिवासी समाज प्रमुखों, सरपंचों और पंचों से लगातार संवाद किया। उनकी समस्याओं को समझा गया और त्वरित समाधान देकर विश्वास कायम किया गया। सरकार और प्रशासन ने स्थानीय समाज का भरोसा जीतने पर खास ध्यान दिया। जब लोगों में विश्वास का माहौल बना, तो माओवादियों ने भी आत्मसमर्पण और पुनर्वास की राह अपनानी शुरू की। पुनर्वास नीति को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, जिससे कई बड़े कैडर के नक्सली भी हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हुए। इस प्रक्रिया में मीडिया और सामाजिक संगठनों की भूमिका अहम रही।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के बाद अब विकास को लेकर राजनीति गरमाने लगी है। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में नक्सल मुक्त गांव के विकास के लिए एक करोड़ की राशि के प्रावधान करने की बात कही थी। ऐसे में 31 मार्च को छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त घोषित करने के बाद अब कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। पूर्व पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम ने सरकार से कहा है बस्तर नक्सल मुक्त हो गया है, तो हर गांव को एक करोड़ कब मिलेंगे। इसके साथ ही उन्होंने सरकार से पूछा है कि बस्तर के विकास के लिए स्पेशल पैकेज कब मिलेगा? साथ ही मोहन मरकाम ने याद दिलाया कि यूपीए सरकार के समय नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लिए 3030 करोड़ की राशि दी गई थी। हालांकि, भाजपा
ने भी इस पर पलटवार किया है। बीजेपी ने अपने जवाब में कहा है कि बस्तर का 100 फीसद विकास होगा। इसके लिए जल्द कार्य योजना भी तैयार की जाएगी।
वर्षों तक हिंसा और असुरक्षा के साए में रहे इस क्षेत्र के लिए अब नई योजनाओं और ठोस कार्यनीति की जरूरत महसूस की जा रही है। कांग्रेस के आरोपों पर बीजेपी ने तीखा जवाब दिया है। पार्टी के प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास ने कहा कि कांग्रेस अपने कार्यकाल में बस्तर के विकास के लिए कोई ठोस काम नहीं कर पाई और अब सवाल उठा रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार ने जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा किया जाएगा और बस्तर के विकास के लिए जल्द ही विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जाएगी। नक्सलवाद के खात्मे के बाद बस्तर में विकास की संभावनाएं जरूर बढ़ी हैं, लेकिन यह काम आसान नहीं होगा। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निवेश और योजनाओं की जरूरत होगी। ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से संसद में नक्सल मुक्त घोषित किए गए प्रत्येक गांव के विकास के लिए एक करोड़ रुपये की राशि देने के वादे को बस्तर के लिए बड़ी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है, जहां लंबे समय से मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहा है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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