राजनीतिक स्वार्थ का शिकार महिला आरक्षण बिल

हमारे देश में महिलाओं को लेकर दोहरी सोच बहुत पहले से रही है। एक तरफ उनकी विद्वता, वीरता और त्याग की कहानियां हैं तो दूसरी तरफ उनकी उपेक्षा, दोयम दर्जे का नागरिक मानना और भोग-विलास की वस्तु मानने की मानसिकता भी कायम है। त्रेतायुग में जब राम राज्य था तब भी अयोध्या का समाज महारानी सीता को इस योग्य नहीं मानता था कि उन्हें अयोध्या के सिंहासन पर राजा राम बैठाएं। हो सकता है कुछ लोग इससे सहमत न हों लेकिन आज भी जब केन्द्र से लेकर राज्य सरकारें तक महिलाओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रही हैं तब भी बालिकाओं को बोझ समझा जाता है और भू्रण हत्याएं भी हो रही हैं। पुरुष और महिला जनसंख्या के अनुपात में अंतर बढ़ता जा रहा है। इसलिए दो दशक से ज्यादा समय से लटके महिला आरक्षण बिल को लागू नहीं किया जा रहा है। मौजूदा समय में यदि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में पारित भी कर दिया जाता, तब भी संसद में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव में ही मिल पाता। इस बीच कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो जाएंगे। कई बातें जनता की समझ में भी नहीं आ रही हैं जैसे जहां की आवादी ज्यादा हो, वहां ज्यादा डाक्टर, ज्यादा इंजीनियर, ज्यादा स्कूल तो होने चाहिए लेकिन ज्यादा सांसद और विधायकों की क्या जरूरत है। क्या यह सच नहीं है कि सांसद और विधायक इस देश की जनता पर अनावश्यक बोझ हैं। दूसरी बात यह कि पूर्व में जब महिला आरक्षण विधेयक बना था तो उसी नाम से पारित करने में क्या दिक्कत है? बहरहाल लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। विपक्ष इसे अपनी जीत मान रहा है लेकिन सरकार और उसके समर्थक दल महिलाओं की सहानुभूति अर्जित करने के लिए विपक्ष को रोड़ा बता रहे हैं। महिलाएं स्वयं दलगत राजनीति से ऊपर उठें तो उनमें इतनी क्षमता है कि वे 33 क्या 40 फीसद से ऊपर जनप्रतिनिधि बन सकती है।
महिला आरक्षण बिल फिलहाल तो ठंडे बस्ते में चला गया है। ये कह पाना मुश्किल है कि बिल अब कब लागू हो पाएगा। मान लीजिए कि सरकार और विपक्ष के बीच आने वाले समय में बिल पर कोई सहमति बन जाती है फिर भी महिला आरक्षण 2034 के लोकसभा चुनाव के पहले लागू होना मुश्किल लगता है। पहले ही बहुत देर हो चुकी थी अब और कितना इंतजार। 31वां संशोधन बिल लोकसभा से पास नहीं हो सका। घंटों लंबी बहस और मतभेदों के बीच यह बिल लोकसभा में गिर गया। सरकार को बिल को पास करवाने के लिए दो-तिहाई वोटों की जरूरत थी लेकिन पक्ष में सिर्फ 298 वोट पड़े। विरोध में 230 वोट पड़े, जो दो तिहाई से बहुत कम हैं। पीएम मोदी की अंतरआत्मा की आवााज सुनने वाली अपील भी कुछ खास असर नहीं दिखा पाई।
2023 के मूल कानून के हिसाब से संसद के दोनों सदनों में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण तभी लागू होना था, जब अगली जनगणना पूरी हो जाए। मतलब यह कि यह 2034 से पहले लागू होना मुश्किल लगता है। वजह ये है कि अभी जनगणना चल रही है। इसे पूरा होने में वक्त लगेगा। इसके बाद सीटों का डिलिमिटेशन यानी कि नया बंटवारा भी होगा जबकि नए बिलों के हिसाब से महिला आरक्षण को 2029 तक लागू होना था। इसके लिए सीटों का बंटवारा 2011 की जनगणना के आधार किया जाना था लेकिन ये हो नहीं सका। केंद्र सरकार संशोधन बिल में दक्षिणी राज्यों की सीटें बढ़ाने जैसे कुछ बदलाव कर सकती है। मतलब यह कि 2011 के बजाय 2027 की जनगणना को आधार बनाया जाए। इसके बाद बिल को नए सिरे से पेश किया जाए। सहमति बनाने के लिए विपक्ष के सुझाव लिये जाएं। कई विश्लेषकों का कहना है कि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा देने से पहले पूरे ओबीसी समुदाय के लिए ही राजनीतिक आरक्षण को संविधान में शामिल करना होगा। फिलहाल ओबीसी आरक्षण शिक्षा और नौकरी तक सीमित है, विधायिकाओं में नहीं। महिलाओं के बिल के पिछले प्रयास (1996, 1997, 1998, 2008-2010) ओबीसी उप-कोटा की मांगों की वजह से ही अटकते रहे। यही पुरानी खाई 2023-26 की बहस में भी दिखाई दी। बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक में बड़ा विस्तार किया है। विश्लेषकों का तर्क है कि अगर वह अभी ओबीसी राजनीतिक आरक्षण का दरवाजा खोलती है तो सीट-शेयर, 50 फीसद कैप और आंतरिक उप-वर्गीकरण पर बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं, जिसे वह टालना चाहती है।
विपक्ष लगातार ओबीसी महिलाओं के अलग कोटे की मांग कर रहा है। वह आरोप लगा रहा है कि बीजेपी महिला आरक्षण का क्रेडिट तो लेना चाहती है लेकिन ओबीसी महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी देने से बच रही है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण पर फैसलों में कहा है कि कुल आरक्षण 50 फीसद से ज्यादा नहीं दिया जा सकता और ओबीसी कोटा के लिए “समकालीन, भरोसेमंद तथ्यात्मक डेटा” जरूरी है। यही तर्क राष्ट्रीय स्तर पर भी उठेगा। महिलाओं के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार संसद में संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई। हालांकि महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। बावजूद इसके राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बहुमत नहीं होने के बाद भी विधेयक लाकर भाजपा ने बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। इसने सत्ता पक्ष और खासतौर पर भाजपा के हाथ में एक ऐसा मुद्दा थमा दिया है, जिससे पार पाना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल होगा। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना अभी बाकी है और ऐसे में भाजपा इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में 298 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया। मतदान करने वाले 528 सांसदों में से इस संविधान संशोधक विधेयक को दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 मतों की आवश्यकता थी। हालांकि यह पारित नहीं हो सका। पार्टी अब इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर यह संदेश देने की रणनीति पर काम कर रही है कि महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक कदम को विपक्ष ने रोक दिया है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महिला आरक्षण में मुस्लिम आरक्षण की समाजवादी पार्टी की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि संविधान के तहत धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। वहीं ओबीसी महिलाओं के आरक्षण की मांग के संबंध में कहा कि जाति जनगणना के बाद रिपोर्ट आएगी और उस पर इस सदन में विचार करने के बाद जो भी सामूहिक मत बनेगा, उस बारे में आगे बढ़ा जा सकता है। भाजपा के इन तर्कों के आगे विपक्ष की रणनीति की धार फिलहाल कुंद होती नजर आ रही है। कुल मिलाकर महिला आरक्षण विधेयक भले ही संसद में पारित न हो सका हो, लेकिन सियासी मैदान में यह बीजेपी के एजेंडे का अहम हिस्सा बन चुका है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



