बीआर चोपड़ा के साहस की फिल्म थी साधना

फिल्म निर्माता-निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा यानी बीआर चोपड़ा ने मनोरंजन के साथ गंभीर सामाजिक मुद्दों को जोड़ा। उनका पूरा सिने करियर सामाजिक सरोकारों, सार्थक कहानियों और साहसिक विषयों से भरा रहा। भले ही वे इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी फिल्में और टीवी सीरियल महाभारत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। बीआर चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल 1914 को लाहौर (अविभाजित भारत) में हुआ था। उन्होंने लाहौर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। वह फिल्म समीक्षा लिखते थे और कहानियां भी लिखा करते थे। साधना फिल्म की मूल कहानी में अंत अलग था- वेश्या मंदिर में उपदेश सुनकर बदल जाती थी लेकिन चोपड़ा साहब को ये सामाजिक एंगल खत्म करने वाला लगा। उन्होंने लेखक पंडित मुखराम शर्मा से कहा कि अंत ऐसा होना चाहिए जिसमें मां अपनी बेटी का हाथ पकड़कर कहे-“तुम इस घर में बहू बनकर आई थी, वेश्या बनकर बाहर नहीं जा सकती।” यही अंत रखा गया।
साल 1958 में आई बीआर चोपड़ा की फिल्म साधना उनके साहस और साधना की सबसे बड़ी मिसाल है। फिल्म की कहानी वेश्या की जिंदगी और उसके पुनर्वास पर आधारित थी। मुख्य किरदार चंपा (वैजयंतीमाला) एक वेश्या थी, जो एक कॉलेज लेक्चरर मोहन (सुनील दत्त) से प्यार करती है। फिल्म में समाज की वेश्याओं के प्रति सोच और उन्हें मुख्यधारा में लाने का मुद्दा उठाया गया था। फिल्म की घोषणा होते ही इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया। डिस्ट्रीब्यूटर चोपड़ा साहब को चिट्ठी लिखकर कह रहे थे, “आप क्या कर रहे हैं? हम सब मर जाएंगे।” इस बात का जिक्र उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में किया था। वेश्या की कहानी पर फिल्म पहले भी बनी हैं और सब फ्लॉप हो गई हैं। न्यू थिएटर्स की नर्तकी, वाडिया की राज नर्तकी, विजय भट्ट की पूर्णिमा और मुंशी प्रेमचंद की सेवा सदन पर बनी फिल्में असफल रहीं। एक डिस्ट्रीब्यूटर ने सीधे पूछा “चार फिल्में फ्लॉप हो चुकी हैं, आपको क्या लगता है ये चलेगी?” चोपड़ा साहब ने शांत भाव से जवाब दिया, “जब मैंने अपनी पहली फिल्म बनाई थी, तब भी मुझे नहीं पता था कि वो चलेगी या नहीं। मुझे कहानी अच्छी लगी, इसलिए बनाई। ये भी अच्छी लगी, इसलिए बना रहा हूं।” (हिफी)



