लेखक की कलम

पर्यटन के लिए बाधक असावधानियां

हमारे देश में पर्यटन भी एक कमाऊ उद्योग बन गया लेकिन सच यही है सरकारें अनियोजित, असुरक्षित, असुविधा भरे पर्यटन के बूते पर राज्यों में रोजगार और राजस्व के लोभ में पर्यटकों श्रद्धालुओं की सुरक्षा की प्राथमिकता को भुला रही हैं। अब इसे हादसा कहें या बदहाल और गैर जिम्मेदार भ्रष्ट व्यवस्था की हद दर्जे की लापरवाही जिसके चलते मध्य प्रदेश मंे तेरह हंसती खेलती जिंदगी मौत के आगोश में समा गयीं और दर्जन भर परिवारों को कभी न भूलने वाला दुख दे गयीं। वहीं समूचा सिस्टम हादसे में मृत एक मां बच्चे की दर्दनाक फोटो के प्रति घड़ियाली आंसू बहा कर अपनी बदइंतजामी और नाकारापन से बचने की कोशिश में जुट गया। मंत्री से लेकर संतरी तक आंसू बहाकर जवाबदेही से बचने की कसरत करते रहे लेकिन हादसे के लिए जिम्मेदार तंत्र पर कोई सवाल नहीं उठाया।
गत 30 अप्रैल को मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के खास पर्यटन स्थल बरगी डैम में पर्यटकों की खुशियां मातम में बदल गईं। डैम के खमरिया टापू के पास एक क्रूज अचानक आए तेज तूफान के कारण अनियंत्रित होकर पानी में डूब गया। हादसे के वक्त क्रूज पर करीब 40 लोग सवार थे। बताया जा रहा है कि ये सभी लोग यहां घूमने के लिए निकले थे। अचानक हुए इस हादसे से मौके पर चीख-पुकार मच गई।शुरुआती जानकारी के अनुसार, हादसे के समय क्रूज नर्मदा नदी के बैकवाटर में मौजूद था। इस बीच अचानक मौसम बदल गया और तेज हवाओं के साथ तूफान आने लगा। ये तूफान इतना जबरदस्त था कि क्रूज अपना संतुलन खोने लगा और कुछ ही समय में पानी में पलट गया। किसी ने आंखों के सामने पत्नी खो दी तो किसी ने मां और भाई। इस हादसे में इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तक 13 लोगों की मौत हो चुकी थी। ये लोग किसी के मां-बाप, भाई, बहन थे। सोचिए उन लोगों पर क्या बीत रही होगी, पलक झपकते ही जिसके अपने आंखों से ओझल हो गए। उनके अपने डूबते रहे और वे बेबस होकर देखते रहे।
जबलपुर क्रूज हादसे ने दिल्ली के एक परिवार की खुशियां उजाड़ दीं। पति, पत्नी, एक बेटा और एक बेटी पिकनिक मनाने क्रूज पर चढ़े। हादसे के दौरान पिता और बेटी किसी तरह सुरक्षित बच गए, लेकिन मां और बेटा क्रूज के भीतर ही फंस गए थे। मां का अपने बेटे को सीने से चिपकाए हुए शव मिला। मानो आखिरी पल तक उसे बचाने की कोशिश कर रही हो।
जबलपुर के सिविल लाइन इलाके के रहने वाले सैयद रियाज हुसैन की पत्नी, नाती और समधन लापता हैं। वह परिवार के साथ क्रूज की सवारी का आनंद लेने गए थे। वो कहां जानते थे कि डैम में मौत दस्तक दे रही है। सैयद तो बच गए, लेकिन उनके परिजन लापता थे।
एक छोटी सी बच्ची मां-पिता और भाई के साथ कुछ देर पहले जो हंसी के ठहाके लगा रही थी उसकी आंखों में सिबाय दर्द के कुछ दिखाई नहीं दे रहा। बच्ची बुरी तरह डरी, सहमी और घबराई हुई है। पापा तो मिल गए लेकिन मम्मी, भाई और नाना का कुछ अता-पता नहीं है। वहीं नानी की डूबने से मौत हो गई है। पल भर में उसकी खुशियां मातम में बदल गईं। जबलपुर क्रूज हादसे ने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया।
घटना की जानकारी मिलते ही बरगी थाना पुलिस और प्रशासन की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और मौके पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीआरएफ की टीम को रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए रवाना किया था। टीम लगातार लापता लोगों की तलाश में जुटी और पानी के भीतर सर्च ऑपरेशन चलाया गया।
सवाल यह है कि यह हादसा अनगिनत लापरवाही और अव्यवस्था की तरफ इशारा करता है। जब मौसम विभाग की पचास किमी प्रति घंटा की रफ्तार से आंधी तूफान आने की चेतावनी जारी थी तब क्रूज का नदी में संचालन क्यों किया गया? जानकारी के अनुसार क्रूज का संचालन मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग करता है। बताया गया है कि इस बीस साल पुरानी क्रूज में वैध तौर पर तीस पर्यटक लिस्टेड थे लेकिन कुछ लोग स्टाफ की कृपा पर भी सवार थे जो लिस्टेड नहीं थे। बचाव दल 28 लोगों को बचाने का दावा कर रहा है जबकि 13 शव निकाले जा चुके थे इस तरह 41 सवारियों की पुष्टि हो जाती है। इसके अलावा नियमानुसार सबको लाइफ जेकेट पहनना अनिवार्य था लेकिन तूफान आने पर अफरा-तफरी मचने पर लाइफ जेकेट दी गयी। लोगों को जैकेट पहनने का सही तरीका भी नहीं पता था। एकाएक तूफान आने पर जैकेट का बंडल दिया गया। पहनने के लिए अफरा-तफरी मच गयी और सभी सवार पर्यटकों के क्रूज पर एक तरफ आने से संतुलन बिगड़ गया और क्रूज एक ओर झुकते ही नदी में समा गया। ऐसा प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है।
यह भी जानकारी आ रही है कि यह क्रूज नियमों की घोर अनदेखी कर मनमानी ढंग से अल्पप्रशिक्षित परिचालन टीम के भरोसे नर्मदा की छाती पर संचालित किए जा रहे थे। इस सबके लिए खुद सरकार अपनी जिम्मेदारी से नही बच सकती है। सरकार चाहे उत्तराखंड की हो, यूपी की या मध्यप्रदेश की सब जगह ग्रीष्म शीत अवकाश अथवा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटकों श्रद्धालुओं की सुरक्षा को दरकिनार किया गया है। सरकार का रवैया सिर्फ पर्यटकों को प्रचार के बूते पर आकर्षित कर राजस्व और स्थानीय रोजगार बढाने का है लेकिन श्रद्धालुओं पर्यटकों के जीवन की सुरक्षा कौन करेगा? इसकी चिंता सरकार या सरकारी अमले को कतई नहीं है। व्यवस्था में जुड़े सरकारी अधिकारी कर्मचारी अपनी कमीशन खोरी और किसी न किसी तरह जेब भरने में जुट जाते हैं। मौसम की चेतावनी को दरकिनार कर पर्यटकों को जान की कीमत पर धार्मिक या मौज मस्ती का पर्यटन कराना कौन सी नैतिकता है?
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील प्राकृतिक वातावरण वाले प्रदेश में चारधाम यात्रा के लिए क्षमता से अधिक पर्यटकों को विभिन्न माध्यमों से पहुंचने की संभावना है। उत्तराखंड सरकार भलीभांति जानती है कि 2013 की केदारनाथ या 2024 की चमोली रैणी गाँव ग्लेशियर फटने और धराली में बादल फटने से जनहानि जैसी आपदा में बचाव की पर्याप्त व्यवस्था उसके पास मौजूद नहीं है। यह भी सच है कि पर्यटन ही स्थानीय लोगों की अर्थव्यवस्था का आधार है। ऐसे हालात में सुधार की बड़ी जरूरत है। कम से कम नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए ताकि मानवीय भूल से होने वाली दुर्घटनाओं को तो रोका जा सके।
सरकार अनुग्रह राशि देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। हादसों के मूल में छिपी अक्षम्य लापरवाही और अव्यवस्था के जिम्मेदार लोग सामने आने चाहिए और उनको उनके अपराध के लिए दंडित किया जाए।(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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