लेखक की कलम

तमिलनाडु में विजय ने बदला सियासी खेल

तमिलनाडु की राजनीति ने 4 मई 2026 को एक ऐसा मोड़ लिया है, जिसे आने वाले वर्षों में राजनीतिक विज्ञान के पाठ्यक्रमों में एक केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जाएगा। एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सशक्त और सात दशकों की संगठनात्मक विरासत वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम को एक ऐसी पार्टी ने पराजित कर दिया, जो तीन वर्ष पहले अस्तित्व में ही नहीं थी। तमिलगा वेट्री कषगम नाम है इस पार्टी का। इस जीत की सबसे चैंकाने वाली बात यह रही कि खुद स्टालिन अपने पारंपरिक गढ़ कोलाथुर से चुनाव हार गए। इस राजनीतिक उलटफेर को समझने के लिए पहली नजर में जो कारण सामने आता है, वह है स्टार पावर। विजय, जिन्हें उनके प्रशंसक “थलपति” कहते हैं, तमिल सिनेमा के सबसे बड़े नामों में से एक हैं।
तमिलनाडु का इतिहास भी बताता है कि सिनेमा और राजनीति का रिश्ता यहां नया नहीं है एम.जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता इसके सबसे बड़े उदाहरण रहे हैं लेकिन इस बार जो हुआ है, वह केवल उस परंपरा का विस्तार नहीं, बल्कि एक नए तरह का राजनीतिक प्रयोग प्रतीत होता है।पहले के अभिनेता-राजनेताओं ने अपने करिश्मे को राजनीतिक क्षमता में बदला था। उन्होंने संगठन खड़े किए, कैडर विकसित किए और शासन की समझ विकसित की। स्टारडम उनके लिए प्रवेश द्वार था, न कि पूरा ढांचा। लेकिन विजय के मामले में सवाल यह उठता है कि क्या यह मॉडल उस पूरी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए भी सफल हो सकता है?तमिलगा वेट्री कषगम की जीत किसी जटिल नीतिगत दृष्टि या वैचारिक स्पष्टता पर आधारित नहीं दिखती। उनके घोषणापत्र में वे ही वादे थे, जो द्रविड़ मुनेत्र कषगम और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम जैसी पारंपरिक पार्टियां वर्षों से करती आई हैं। असली अंतर था भावनात्मक जुड़ाव में- वह छवि जो विजय ने फिल्मों में गढ़ी है- एक ईमानदार, न्याय दिलाने वाला, आम आदमी का नायक। यही सिनेमाई छवि मतपत्र पर एक राजनीतिक प्रस्ताव बन गई।यहीं पर यह परिवर्तन दिलचस्प और चिंताजनक दोनों हो जाता है। क्या राजनीति अब वैचारिक विमर्श से हटकर भावनात्मक निवेश का खेल बनती जा रही है? क्या संगठनात्मक गहराई की जगह अब “इमोशनल इक्विटी” ले रही है?जब फिल्म निर्देशक सुंदर सी. ने सुझाव दिया कि अजीत कुमार को भी राजनीति में आना चाहिए, तो यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि एक संभावित “फॉर्मूला” की पहचान थी। इस फॉर्मूले के तहत फैन नेटवर्क को संगठित किया जाता है, भावनात्मक वफादारी को राजनीतिक समर्थन में बदला जाता है और व्यापक लेकिन सामान्य घोषणापत्र के साथ चुनावी सफलता हासिल की जाती है।
सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है-क्या यह मॉडल शासन कर सकता है? शासन केवल लोकप्रियता का विस्तार नहीं होता। यह जटिल, प्रक्रियात्मक और कई बार अलोकप्रिय फैसलों की मांग करता है। यहां करिश्मा नहीं, संस्थागत क्षमता काम आती है। तमिलगा वेट्री कषगम के सामने अब असली परीक्षा शुरू होती है। यदि उसे एक स्थायी राजनीतिक शक्ति बनना है, तो उसे तुरंत कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।सबसे पहले, उसे अपने फैन बेस को राजनीतिक कैडर में बदलना होगा। प्रशंसक वफादार हो सकते हैं, लेकिन शासन के लिए समझ और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। पार्टी को जिला स्तर पर प्रशिक्षण शिविर, नीति कार्यशालाएं और सामाजिक मुद्दों पर संवाद शुरू करना होगा। दूसरा, आंतरिक लोकतंत्र और नेतृत्व की दूसरी पंक्ति तैयार करनी होगी। जे. जयललिता के बाद अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम जिस तरह नेतृत्व संकट से जूझ रही है, वह एक चेतावनी है। विजय को यह सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी केवल एक चेहरे पर निर्भर न रहे, बल्कि संस्थागत ढांचे के जरिए निर्णय ले। तीसरा, उसे नरेटिव से निकलकर गवर्नेंस पर ध्यान केंद्रित करना होगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में विस्तृत नीतिगत दस्तावेज तैयार करने होंगे। सिर्फ वादों से आगे बढ़कर समयसीमा, बजट और जवाबदेही तय करनी होगी।चैथा, जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी मजबूत करनी होगी। द्रविड़ मुनेत्र कषगम और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम की असली ताकत उनके बूथ स्तर के नेटवर्क में रही है। तमिलगा वेट्री कषगम को भी चुनावी रैलियों से आगे बढ़कर रोजमर्रा की राजनीतिक उपस्थिति बनानी होगी।पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण, विजय को अपने अभिनेता और नेता के व्यक्तित्व को अलग करना होगा। फिल्मों में नायक के पास हर समस्या का त्वरित समाधान होता है, लेकिन राजनीति में फैसले जटिल होते हैं, समझौते करने पड़ते हैं और परिणाम धीरे-धीरे सामने आते हैं।
तमिलनाडु एक ऐसा राज्य रहा है जिसने पेरियार और एम. करुणानिधि जैसे विचारशील नेताओं को जन्म दिया, जिन्होंने राजनीति को एक बौद्धिक और सामाजिक परियोजना के रूप में देखा लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती गई। विचारधारा धीरे-धीरे प्रतीकात्मक बन गई, संगठन ढीले पड़े और नेतृत्व सीमित होता गया। इस संदर्भ में विजय कोई अचानक आई हुई क्रांति नहीं हैं, बल्कि उस प्रक्रिया का परिणाम हैं, जिसमें पारंपरिक दलों ने खुद को समय के साथ नहीं बदला। आज यह स्पष्ट है कि विजय ने तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ मुनेत्र कषगम और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के दशकों पुराने द्वंद्व को तोड़ दिया है। उन्होंने यह मिथक भी तोड़ा कि हर अभिनेता राजनीति में सफल नहीं हो सकता जहां कमल हासन और विजयकांत सीमित प्रभाव छोड़ पाए, वहीं रजनीकांत ने राजनीति में कदम रखने का विचार तो किया, लेकिन उसे साकार नहीं किया। विजय की यह जीत अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है।घ्यदि तमिलगा वेट्री कषगम अपने करिश्मे को संस्थागत ताकत में बदलने में सफल होती है, तो यह भारतीय राजनीति के लिए एक नया मॉडल बन सकता है। लेकिन यदि वह ऐसा नहीं कर पाती, तो यह उदाहरण एक चेतावनी के रूप में भी याद किया जाएगा कि लोकप्रियता और शासन क्षमता दो अलग-अलग चीजें हैं। तमिलनाडु ने एक नया अध्याय
खोल दिया है। अब यह देखना बाकी है कि यह कहानी एक स्थायी परिवर्तन बनती है या एक क्षणिक राजनीतिक प्रयोग।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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