यह समूचे विपक्ष के लिए सबक

(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)
ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में पराजय सिर्फ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) के लिए सबक नहीं बल्कि समूचे विपक्ष को इससे सतर्क हो जाना चाहिए। भाजपा का यह अभियान सिर्फ पश्चिम बंगाल तक नहीं है बल्कि इसके बाद पंजाब और उत्तर प्रदेश में भी चलेगा। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भले ही योगी आदित्यनाथ हैट्रिक लगाने में 2027 में सफल हो जाएं लेकिन समाजवादी पार्टी का कांटा अब तक चुभ रहा है। लोकसभा में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ही तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है जबकि अखिलेश यादव की सपा दूसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर कांग्रेस है। भाजपा का मिशन विपक्ष को शून्य करने का है। इसलिए वामपंथी दलों और कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी और बीजू जनता दल (बीजद) को भी पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे पर चिंतन-मनन करना चाहिए।
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में केंद्र की मोदी सरकार और बीजेपी के खिलाफ बने इंडिया ब्लॉक के बड़े चेहरे के तौर पर भी ममता बनर्जी को देखा जा रहा था। उन्होंने ही लालू प्रसाद यादव और उस समय विपक्षी गुट में रहे नीतीश कुमार को विपक्षी गठबंधन की पहली बैठक पटना में करने की सलाह दी थी। यह ऐसी सलाह थी, जो मानी भी गई और इंडिया ब्लॉक की पहली बैठक पटना में हुई थी। तृणमूल कांग्रेस केंद्र में तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों में उससे ज्यादा सीटें केवल कांग्रेस (99) और एसपी (37) ने जीती थीं। टीएमसी को उन चुनावों में पश्चिम बंगाल की 42 में से 29 सीटों पर जीत मिली थी। विधानसभा चुनाव मंे बम्पर जीत के साथ ही बीजेपी अब पश्चिम बंगाल की सभी 42 सीटों पर सेंधमारी की कोशिश करेगी. ममता बनर्जी एक बड़ी नेता हैं और उनकी पार्टी की हार विपक्ष को कमजोर करेगी।
विपक्षी दलों में एकता नहीं है, यह स्पष्ट तौर पर दिखा। एसआईआर को विपक्षी दलों ने ममता बनर्जी का सिरदर्द समझ लिया। ये सारे दल वैचारिक तौर पर अलग-अलग हैं, जबकि बीजेपी जो दक्षिणपंथी राजनीति करती है, उसका अब कोई विकल्प नहीं बचा है। कुल मिलाकर विपक्ष कमजोर हुआ है. विपक्ष के सारे बड़े नेता हार गए हैं। इसका एक असर यह होगा कि विपक्षी नेताओं ने बीजेपी का ज्यादा विरोध किया और दबाव बनाने की कोशिश की, तो उनकी फाइलें खोली जाएँगी। इनमें ममता बनर्जी और एमके स्टालिन दोनों ही शामिल हैं।
बीजेपी नेताओं ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी और उनकी पार्टी पर कथित तौर पर बांग्लादेशी नागरिकों को शरण देने और भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए थे। पश्चिम बंगाल में जीत ने बीजेपी के लिए नया दरवाजा खोल दिया है। अब बीजेपी उन राज्यों में भी अपनी सरकार बनाने के लिए पूरे मनोबल के साथ आगे बढ़ सकती है, जहाँ उसे कमजोर माना जाता है. बीजेपी को बिना विपक्ष की राजनीति चाहिए. इस जीत से उसका मनोबल बढ़ा है। इसलिए बंगाल में हार के बाद विपक्ष को खुद पर फिर से विचार करना होगा। संसदीय राजनीति में अवसरवाद इतना हावी है कि सब अपने बारे में सोचते हैं। पश्चिम बंगाल में जिस तरह से बीजेपी की जीत हुई है, उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही होगा। अब राजनीति बीजेपी बनाम छोटे-छोटे दलों की बची हुई है. यह लोकतंत्र के लिए बहुत ही दुखद है। पश्चिम बंगाल में वाम दल, एआईएमआईएम, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस थे, जिनमें कथित धर्मनिरपेक्ष वोट बँट जाता है, जबकि बीजेपी बहुसंख्यकों की राजनीति करती है और उसका वोट किसी पार्टी में नहीं बँटता है।
विपक्ष के आगे बढ़ने में एक समस्या यह भी है कि उसकी एकता या रणनीति केवल कागजों पर बनती है। पश्चिम बंगाल की हार से विपक्ष का मनोबल टूटेगा। लेकिन विपक्ष अगर सकारात्मक हो जाए और बिहार में हार के बाद जिस तरह निष्क्रिय होकर बैठ गया, वैसा न करे तो उसके लिए बेहतर होगा। ममता बनर्जी की इस हार के बाद विपक्ष के सामने रास्ता यही है कि वो कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करें और कांग्रेस भी बड़ा दिल दिखाए। अगर ऐसा हो जाता है तो विपक्ष आगे बढ़ पाएगा। यह समय न केवल विपक्षी दलों के लिए अहम है, बल्कि बीजेपी के लिए भी अहम है कि अब विपक्ष की क्या रणनीति रहती है।
बीजेपी के पास अब उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, असम, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में सरकार है. पश्चिम बंगाल में जीत ने बीजेपी के लिए नया दरवाजा खोल दिया है. अब बीजेपी उन राज्यों में भी अपनी सरकार बनाने के लिए पूरे मनोबल के साथ आगे बढ़ सकती है, जहाँ उसे कमजोर माना जाता है। बीजेपी ने करीब तीन दशक बाद दिल्ली में सत्ता में वापसी की है. जबकि कुछ ही दिन पहले बिहार में पहली बार सम्राट चैधरी के तौर पर बीजेपी को अपना पहला मुख्यमंत्री मिला है।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी को प्रचंड जनादेश मिला है और तृणमूल कांग्रेस की हार हुई है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने 207 सीटें हासिल की हैं और तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर ही सिमट गई है। कांग्रेस को 2 और एजेयूपी को 2 सीटें मिली हैं। सीपीआई (एम) को केवल एक सीट मिली है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, असम और बंगाल में भाजपा द्वारा चुनाव आयोग के समर्थन से चुनाव धांधली के स्पष्ट उदाहरण देखने को मिलते हैं। हम ममता जी से सहमत हैं। बंगाल में 100 से अधिक सीटें धांधली से प्रभावित हुईं। हमने पहले भी इस तरह की रणनीति देखी है। मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, लोकसभा 2024 आदि। चुनाव चोरी, संस्था चोरी – अब और चारा ही क्या है! सपा नेता अखिलेश यादव ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, हर धोखे भरी जीत की एक समय सीमा होती है। यही तथ्य सत्य का आधार है। सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा, क्या सत्ताधारी राजनीति अब इसे पाताल से भी नीचे ले जाने पर आमादा है? यह देश के राजनीतिक इतिहास के सबसे अंधेरे दिनों में से एक है। दिल्ली के पूर्व सीएम और आप नेता अरविंद केजरीवाल ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, दिल्ली और बंगाल, जहां भाजपा मोदी लहर के चरम पर भी जीत हासिल नहीं कर पाई, 2015 में दिल्ली में और 2016 में बंगाल में, उन्हें सिर्फ 3-3 सीटें मिलीं। वहीं दिल्ली और बंगाल में भाजपा ने तब जीत हासिल की जब पूरे देश में मोदी जी की लोकप्रियता चरमरा रही थी, कैसे? (हिफी)



