लेखक की कलम

विकसित भारत के पक्ष में सभी राज्य

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के संबंध हमेशा राजनीतिक चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। पिछले एक दशक में केंद्र और विपक्ष शासित राज्यों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद देखने को मिले हैं। ऐसे माहौल में नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक में सभी 28 राज्यों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक घटना के रूप में सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक ने न केवल एक नया रिकॉर्ड बनाया, बल्कि सहकारी संघवाद की अवधारणा को भी नई ऊर्जा प्रदान की।
नीति आयोग की स्थापना वर्ष 2015 में योजना आयोग के स्थान पर की गई थी। इसका उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा विकास संबंधी नीतियों को अधिक सहभागी बनाना था। इसकी गवर्निंग काउंसिल में प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक और अन्य प्रमुख नीति निर्माता शामिल होते हैं। यह मंच राष्ट्रीय विकास एजेंडा पर सामूहिक चर्चा और निर्णय का अवसर प्रदान करता है।
इस वर्ष की बैठक का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि पहली बार सभी 28 राज्यों के मुख्यमंत्री इसमें शामिल हुए। इससे पहले कई बैठकों में विपक्ष शासित राज्यों के मुख्यमंत्री राजनीतिक कारणों से अनुपस्थित रहते थे। वर्ष 2023 में नौ मुख्यमंत्री बैठक में शामिल नहीं हुए थे, जबकि अन्य वर्षों में भी कई राज्यों ने बहिष्कार का रास्ता अपनाया था। ऐसे में 2026 की बैठक का पूर्ण उपस्थिति के साथ संपन्न होना एक असाधारण उपलब्धि माना जा रहा है।
बैठक में तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, तेलंगाना, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे विपक्ष शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी उपस्थित रहे। विशेष रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अतीत में इन राज्यों ने केंद्र सरकार के साथ मतभेदों के चलते कई बार नीति आयोग बैठकों का बहिष्कार किया था। इस बार उनकी उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद विकास संबंधी संवाद के लिए मंच खुला रखा जा सकता है।
बैठक का विषय था-विकसित भारत 2047 के लिए समावेशी मानव विकासष्। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए केंद्र और राज्यों के साझा रोडमैप पर चर्चा करना था। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की विकास यात्रा दुनिया के लिए प्रेरणा बनी हुई है और इस गति को बनाए रखने के लिए राज्यों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
बैठक में मानव विकास के चार प्रमुख स्तंभों पर चर्चा हुईकृभविष्य के लिए तैयार मानव संसाधन, रोजगार और उद्यमिता, स्वास्थ्य और पोषण, तथा समानता और गरिमा। इसके अतिरिक्त शिक्षा, कौशल विकास,
खेल, डिजिटल अवसंरचना और रोजगार सृजन जैसे मुद्दे भी एजेंडे में शामिल रहे।
दिलचस्प बात यह रही कि विभिन्न राज्यों ने अपनी-अपनी प्राथमिकताओं को भी सामने रखा। हरियाणा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्कृष्टता केंद्र की मांग
की और सेमीकंडक्टर तथा इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रोत्साहन पैकेज का प्रस्ताव रखा। महाराष्ट्र ने गढ़चिरौली को नक्सलवाद से विकास की ओर ले जाने के लिए एक व्यापक विकास योजना प्रस्तुत की। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने राज्य के लिए लंबित केंद्रीय धनराशि जारी करने, नीट से छूट और तिरुक्कुरल को राष्ट्रीय साहित्य घोषित करने की मांग रखी।
इन मांगों से यह स्पष्ट होता है कि नीति आयोग केवल एक औपचारिक मंच नहीं है, बल्कि राज्यों के लिए अपनी विकास आवश्यकताओं और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को सीधे केंद्र सरकार के सामने रखने का अवसर भी है। यही कारण है कि इस मंच की उपयोगिता समय के साथ बढ़ी है।
हालांकि, पूर्ण उपस्थिति का राजनीतिक अर्थ भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और विपक्षी राज्यों के बीच वित्तीय अधिकारों, राज्यपालों की भूमिका, जीएसटी मुआवजा, शिक्षा नीति और केंद्रीय एजेंसियों के उपयोग जैसे मुद्दों पर टकराव देखने को मिला है। ऐसे वातावरण में सभी मुख्यमंत्रियों का एक मंच पर आना यह दर्शाता है कि संवाद की आवश्यकता को सभी पक्ष स्वीकार कर रहे हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सहकारी संघवाद केवल बैठकों से मजबूत नहीं होता। इसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है जब राज्यों की चिंताओं को नीतियों और संसाधनों के वितरण में उचित महत्व दिया जाए। यदि बैठक में उठाए गए मुद्दों पर प्रभावी कार्रवाई होती है, तभी इस ऐतिहासिक उपस्थिति का वास्तविक महत्व सामने आएगा।
कुछ आलोचकों का तर्क है कि नीति आयोग के पास योजना आयोग जैसी वित्तीय शक्तियां नहीं हैं और इसलिए इसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं। लेकिन समर्थकों का मानना है कि आधुनिक शासन में संवाद, नीति समन्वय और सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान का महत्व वित्तीय नियंत्रण से कम नहीं है। इस दृष्टि से देखा जाए तो सभी राज्यों की भागीदारी स्वयं में एक सकारात्मक संकेत है।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विकास का कोई भी राष्ट्रीय एजेंडा तभी सफल हो सकता है जब राज्यों को उसकी योजना और क्रियान्वयन में साझेदार बनाया जाए। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य भी तभी संभव है जब केंद्र और राज्य राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर साझा प्राथमिकताओं पर काम करें।
निष्कर्षतः, नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल बैठक केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि भारतीय संघवाद की परिपक्वता का प्रतीक भी थी। सभी 28 मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि लोकतांत्रिक असहमति और विकासात्मक सहयोग एक साथ चल सकते हैं। अब चुनौती यह है कि इस संवाद को ठोस नीतिगत परिणामों में बदला जाए। यदि ऐसा होता है, तो 2026 की यह बैठक भारतीय संघीय ढांचे में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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