क्या चंपत राय ही सवालों के घेरे में हैं या कोई और?

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री प्रभु राम की जन्मभूमि अयोध्या यानी हिन्दुओं की आस्था का एक प्रमुख स्थल। यह हिन्दू समाज की आस्था और विश्वास ही था जिसके बल पर 6 दिसम्बर 1992 को विवादित ढाँचे को गिराकर वहां एक भव्य राम मंदिर की स्थापना 22 जनवरी 2024 को हो सकी। देशवासी इस उत्सव में बड़े उत्साह से शामिल हुए और प्रभु श्रीराम के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित करने लगे। यहाँ तक तो सब कुछ ठीक था किन्तु किसी भी धर्म पर जब राजनीति हावी होती है तो उसके भयानक दुष्परिणाम सामने आते हैं जैसा कि विगत एक माह से हम देख ही रहे हैं। राम मंदिर फिर चर्चा में है लेकिन इस बार दूसरे कारणों से। मामला है मंदिर से चंदा चोरी का।
एक वरिष्ठ अधिकारी का यह स्वीकारना कि ‘‘चोरी नहीं लूट हुई है।’’ लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि घोटाला तो हुआ है मगर इस घोटाले का सारा ठीकरा ट्रस्ट के महासचिव चम्पत राय पर क्यों फोड़ा गया जबकि वे एक बेहद ईमानदार और कर्मनिष्ठ व्यक्ति हैं।
चम्पत राय विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष भी हैं। फरवरी 2020 में
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट से आए फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय के कहे अनुसार केन्द्र सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था और 15 सदस्यीय इस ट्रस्ट में मंदिर निर्माण परियोजना की निगरानी, दान और चढ़ावे से जुड़े प्रकरणों, ट्रस्ट की ओर से आधिकारिक संवाद, बैठकों के समन्वय और विभिन्न एजेंसियों के साथ तालमेल की जिम्मेदारी प्रमुख रूप से चंपत राय को ही दी थी। उन्होंने एक कुशल शिल्पकार की तरह अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया भी। मंदिर की स्थापना से लेकर निर्माण तक एक-एक पत्थर के चयन में वे बड़े मनोयोग से लगे रहे एक सच्चे राम भक्त की भाँति। दशकों तक रामजन्म भूमि आंदोलन के रणनीतिकार रहे चंपत राय एक सादा जीवन जीने वाले उन गिने-चुने संघ के कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं जो निस्वार्थ भाव से परिश्रम करते हुए समर्पण के भाव से जीवन जीते हैं और संघ के कार्यों में लगे रहते हैं। अकेले जीवन जीने वाले चंपत जी को धन से कोई लोभ नहीं है वे तो अपने को रामसेवक के रूप में ही देखते हैं और मंदिर की व्यवस्थाओं में भी जिम्मेदारी सौंपने के बाद अपने
अधीनस्थों पर अगाध विश्वास करते हैं और मानते हैं कि हर व्यक्ति उनकी ही तरह अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करेगा।
हमारे मंदिरों में चोरियाँ होती रही हैं यह कोई अनोखी बात नहीं है। ट्रस्ट के द्वारा चोरियां रोकने के लिये पुख्ता सिस्टम बनाये गये थे। पैसा गिनने तथा उसे बैंकों तक पहुंचाने की पूरी जिम्मेदारी डा. अनिल मिश्रा की थी। इतने विशाल ट्रस्ट में सम्पूर्ण कार्यों की देख रेख चम्पत राय के अधीन थी और चढ़ावा कैश को ट्रस्टी अनिल मिश्र के सुपुर्द किया हुआ था। किसी भी संस्था में वही व्यक्ति जवाबदेह होता है, जो उस विभाग का हेड हो। फिर चम्पत राय को क्यों कठघरे में खड़ा किया गया। जबकि गबन की जानकारी मिलने पर वे एफआईआर कराने पहुंचे तो उन्हें किसी ने फोन द्वारा रोक दिया गया।
चम्पत जी ने पूरा जीवन सादगी से गुजारा है। उन्होंने एक तपस्वी की तरह मंदिर की एक-एक ईंट को चुन-चुन कर सजाया है। वहाँ की व्यवस्थाओं को लगातार देखते रहे। चंपत राय जी ने प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका को अलग-अलग समझते हुए उसे काम की जिम्मेदारी सौंपी और अपने वर्षों के कठिन परिश्रम से बिना किसी बाधा के राम मंदिर को बनवा कर ही दम लिया।
चढ़ावा चोरी के आरोपों से जहां संघ के आभा मण्डल में दरार आई है वहीं चंपत राय भी बुरी तरह आहत हैं तभी तो उन्होंने कहा है ‘‘मेरी सेवा पूरी हो गई’’ किन्तु यह कलंक लेकर यहां से नहीं जाऊँगा। उन्होंने गहरे दुःख के साथ कहा कि ‘मुझे किस बात की चिन्ता’? यदि ये आरोप प्रभु की इच्छा से लगे हैं तो उन्हीं की कृपा से सत्य भी सामने आयेगा और वही इन्हें दूर करेंगे। यह कथन वास्तव में उनके विचारों को दर्शाता है।
बात चोरी की नहीं है उसके पीछे षड़यंत्र को समझने की है। कुछ लोग जो चंपत जी को नहीं पसंद कर रहे थे उन्होंने संघ की उच्च नैतिक आदर्शों पर चलने वाली परम्परा को खण्डित किया है। सुनते हैं कि एक विशेष लाॅबी महासचिव पद के लिये नया चेहरा तलाश रही है। चंपत जी अकेले पड़ गये हैं। उन्हें विश्वास है कि राम जी उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा करेंगे तथा उन्हें इस अयोध्या में अपमानित और कलंकित नहीं होने देंगे। उनके बारे में तरह-तरह की बातें कही जा रही हैं जो उनके व्यक्तित्व से जरा भी मेल नहीं खातीं। लोग यह भूल जाते हैं कि चंपत राय एक बेहद धीर गंभीर सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं उन्होंने अपने जीवन का एक बहुत लम्बा समय समाज, विहिप, संघ और मंदिर को दिया है।
इस प्रकरण को यदि गौर से देखा जाय तो संघ में एक विशेष लाॅबी हमेशा से हावी रही है। लेकिन विहिप उत्तर भारतीय संगठन माना जाता रहा है। कुछ लोग इस लाॅबी के सहारे राममंदिर ट्रस्ट के महामंत्री बनना चाह रहे थे लेकिन वे सफल नहीं हुए और ईमानदार चंपत राय को ही इस पद के योग्य समझा गया। यह बात एक विशेष लाॅबी के महत्वाकांक्षी लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं आई और वे लगातार चंपत राय जी का विरोध करते रहे हैं।
अफसोस की बात है कि चंद लोगों के कारण संघ की सौ वर्षों की
प्रतिष्ठा कलंकित हो गयी है। चंपत जी अकेले और खामोश हो गए हैं क्योंकि वे आहत हैं। उनके विश्वास को तोड़ा
गया है।
1984 की धर्म संसद के बाद विश्व हिन्दू परिषद ने जब रामजन्म भूमि आंदोलन श्ुारू किया तब संघ से अशोक सिंघल के साथ अन्य प्रचारकों को विहिप में भेजा गया था जिसमें चंपत राय भी थे। चंपत राय जी इस आंदोलन की वो मुख्य कड़ी थे जो नेपथ्य में रहकर रणनीति तैयार करते थे और फिर उसे अमल में लाने के लिए तैयारी करते थे। वे अशोक सिंघल के सबसे अधिक भरोसेमंद सहयोगी थे। उन्होंने कभी किसी का भरोसा नहीं तोड़ा। अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए भी सबके प्रति अपना विश्वास बनाए रखा। यह प्रतिष्ठा जो उन्हंे हासिल हुई थी वह उन्हांेने अपने व्यवहार और कर्मों से अर्जित की थी। उन्होंने संघ के भीतरी टकरावों मतभेदों का सामना
करते हुए संगठन को संभालने और संतुलन बनाए रखने का काम किया। कालान्तर मंे वे विहिप के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा बने और सर्वाधिक प्रभावशाली रणनीतिकार कहलाए। यही वजह रही कि उन्हंे श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने अपने अधीनस्थों पर अति विश्वास किया और अपनी तरह ही आस्थावान समझा। यही संभवतः उनकी सबसे बड़ी चूक थी।
समाज मंे भ्रष्टाचार यदि नीचे है तो उसे शिखर पर बैठे हुए लोग ठीक कर सकते हैं। लेकिन यदि भ्रष्टाचार शिखर से नीचे तक आ रहा हो तो उसे कौन ठीक करे और उससे कैसे बचें और अंत में- काजल की कोठरी मंे कैसो हू सयानों जाय।
एक लीक काजल की लागि है पे लागि है। (हिफी डेस्क-हिफी फीचर)



