लेखक की कलम

ओडीए से मजबूत होंगे भारत-जापान संबंध

भारत और जापान के संबंध केवल कूटनीतिक या व्यापारिक साझेदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच विकास, विश्वास और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित एक दीर्घकालिक सहयोग का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची की तीन दिवसीय भारत यात्रा ने इस साझेदारी को नई गति प्रदान की। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा, धातु, रक्षा तथा आपूर्ति श्रृंखला जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भारत के साथ व्यापक चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत और जापान अपनी-अपनी क्षमताओं का उपयोग करते हुए एक-दूसरे को सशक्त बनाएंगे और साझा समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ेंगे। इस यात्रा के दौरान सबसे अधिक चर्चा जापान की आधिकारिक विकास सहायता (ओडीए) को लेकर हुई।
मार्च 2026 में जापान ने भारत को लगभग 16,420 करोड़ रुपये की रियायती विकास सहायता प्रदान करने की घोषणा की। यह राशि पंजाब, कर्नाटक और महाराष्ट्र में शहरी परिवहन, स्वास्थ्य सेवाओं और कृषि विकास से जुड़ी चार प्रमुख परियोजनाओं पर खर्च की जाएगी। इस निर्णय ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत और जापान के संबंध केवल रक्षा या व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच विकास आधारित साझेदारी भी अत्यंत मजबूत है।
जापान का आधिकारिक विकास सहायता कार्यक्रम वर्ष 1954 में कोलंबो योजना से जुड़ने के बाद विकसित हुआ। इस योजना का उद्देश्य एशियाई देशों के आर्थिक और तकनीकी विकास में सहयोग करना था। भारत इस कार्यक्रम का पहला लाभार्थी देश बना, जिसे वर्ष 1958 में पहली बार जापान से ओडीए ऋण प्राप्त हुआ। तब से लेकर आज तक जापान भारत का सबसे बड़ा द्विपक्षीय विकास सहयोगी बना हुआ है।
ओडीए का अर्थ है किसी विकसित देश द्वारा विकासशील देशों को कम ब्याज दर, लंबी पुनर्भुगतान अवधि और रियायती शर्तों पर सरकारी वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना। इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, सामाजिक कल्याण और बुनियादी ढांचे का निर्माण करना होता है। जापान यह सहायता मुख्य रूप से तीन माध्यमों से प्रदान करता है- रियायती ऋण, अनुदान तथा तकनीकी सहयोग। इन कार्यक्रमों का संचालन मुख्य रूप से जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जाइका) द्वारा किया जाता है, जो भारत में भी इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन की प्रमुख संस्था है।
ओडीए और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के बीच मूलभूत अंतर भी समझना आवश्यक है। ओडीए सरकार से सरकार के बीच विकास परियोजनाओं के लिए दी जाने वाली सहायता होती है, जबकि एफडीआई निजी कंपनियों द्वारा व्यापार विस्तार और लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से किया जाने वाला निवेश है। वर्ष 2000 से 2025 के बीच जापान ने भारत में लगभग 44 से 45 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किया है, जो भारत में कुल विदेशी निवेश का लगभग छह प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल सहायता प्राप्त करने वाला देश नहीं, बल्कि जापान का एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार भी बन चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ओडीए और एफडीआई एक-दूसरे के पूरक हैं। पहले ओडीए के माध्यम से सड़कें, रेल, मेट्रो, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण किया जाता है। जब विकास का आधार मजबूत हो जाता है, तब निजी कंपनियां निवेश के लिए आगे आती हैं। इस प्रकार ओडीए भविष्य के विदेशी निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है।
भारत में जापानी ओडीए की सबसे बड़ी सफलता दिल्ली मेट्रो परियोजना मानी जाती है। वर्ष 1997 से अब तक जापान इस परियोजना के लिए लगभग 5.7 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता प्रदान कर चुका है। इसी प्रकार मुंबई-अहमदाबाद उच्च गति रेल परियोजना, जिसे आमतौर पर बुलेट ट्रेन परियोजना कहा जाता है, जापानी सहयोग का एक और
बड़ा उदाहरण है। वर्ष 2023 में
इस परियोजना के लिए अतिरिक्त 2.4 अरब अमेरिकी डॉलर के
ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।
वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी ने भारत में सात प्रमुख परियोजनाओं के लिए लगभग 1.7 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता उपलब्ध कराई। इनमें बेंगलुरु मेट्रो का तीसरा चरण, मुंबई मेट्रो लाइन-11, महाराष्ट्र में चिकित्सा महाविद्यालयों और अस्पतालों का निर्माण तथा पंजाब में टिकाऊ बागवानी को बढ़ावा देने जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं। यह राशि जापान द्वारा विश्वभर में वितरित कुल ओडीए का लगभग 10.4 प्रतिशत थी, जिससे भारत जापान का सबसे बड़ा विकास सहायता प्राप्तकर्ता बना।
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी जापानी सहायता का महत्व लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2014 के बाद से जापान ने इस क्षेत्र में लगभग 1.6 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है। यह निवेश भारत की एक्ट ईस्ट नीति और जापान की मुक्त एवं खुला हिंद-प्रशांत (फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक) रणनीति के बीच बढ़ते सहयोग का प्रतीक माना जाता है। बेहतर सड़क, पुल, बिजली और संपर्क परियोजनाओं के माध्यम से उत्तर-पूर्व भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने का प्रयास दोनों देशों की साझा रणनीति का हिस्सा है।
भारत और जापान के संबंधों में वर्ष 1998 के पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षण के बाद कुछ समय के लिए ठहराव आया था। जापान ने अपनी परमाणु अप्रसार नीति के कारण नई विकास सहायता परियोजनाओं पर अस्थायी रोक लगा दी थी। हालांकि वर्ष 2000 के बाद दोनों देशों के संबंध सामान्य हुए और 2006 में रणनीतिक वैश्विक साझेदारी स्थापित होने के बाद जापानी सहायता में तेजी से वृद्धि हुई। इसके बाद रक्षा, समुद्री सुरक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी
और आर्थिक सहयोग के नए आयाम विकसित हुए।
जापान की विकास सहायता नीति को अक्सर चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि दोनों की कार्यप्रणाली अलग-अलग है। जापान गुणवत्ता, पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण और दीर्घकालिक टिकाऊ विकास पर जोर देता है, जबकि चीन बड़े पैमाने पर आधारभूत ढांचे के निर्माण और तेज निवेश मॉडल को प्राथमिकता देता है। भारत ने चीन की बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल न होकर जापान के साथ विकास आधारित सहयोग को अधिक महत्व दिया है। हाल के वर्षों में जापान ने आधिकारिक सुरक्षा सहायता नामक नई पहल भी शुरू की है, जिसके माध्यम से मित्र देशों की सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत किया जा रहा है। यद्यपि भारत अभी इस योजना का औपचारिक लाभार्थी नहीं है, लेकिन दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा और क्वाड जैसे बहुपक्षीय मंचों पर समन्वय लगातार मजबूत हो रहा है।
भारत के लिए जापानी ओडीए केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण में एक महत्वपूर्ण साझेदारी है। इससे देश को विश्वस्तरीय आधारभूत ढांचा, आधुनिक तकनीक, बेहतर परिवहन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं और सतत विकास के लिए आवश्यक संसाधन प्राप्त होते हैं। वहीं जापान के लिए भारत एक विशाल बाजार, विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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