लेखक की कलम

सबसे बूढ़ा है बिहार का बरगद

भारत में बरगद का वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास, आस्था और प्रकृति का जीवंत प्रतीक माना जाता है। सदियों से गांवों की चैपाल, धार्मिक अनुष्ठानों, सामाजिक बैठकों और लोकजीवन का केंद्र रहे बरगद के पेड़ों की वास्तविक आयु अब तक लोककथाओं, ऐतिहासिक अभिलेखों और जनश्रुतियों के आधार पर ही अनुमानित की जाती रही थी लेकिन अब भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार वैज्ञानिक तकनीक की सहायता से एक बरगद के वृक्ष की सटीक आयु निर्धारित कर इतिहास रच दिया है। बिहार के मुंगेर में स्थित एक विशाल बरगद के पेड़ को रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से लगभग 700 वर्ष पुराना प्रमाणित किया गया है। यह भारत का पहला बरगद है जिसकी आयु पूरी तरह वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर निर्धारित की गई है।
यह उपलब्धि केवल वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि इतिहास, पुरातत्व, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन में भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है। इस शोध से यह सिद्ध हुआ है कि भारत की प्राकृतिक धरोहरों को समझने के लिए आधुनिक विज्ञान कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
बरगद का वृक्ष भारतीय समाज में विशेष स्थान रखता है। इसकी विशाल शाखाएं, दूर-दूर तक फैली जड़ें और घनी छाया अनेक प्रकार के पक्षियों, कीटों, छोटे जीवों और अन्य वन्य प्राणियों के लिए प्राकृतिक आवास का निर्माण करती हैं। इसके कारण इसे जैव विविधता का संरक्षक भी कहा जाता है। धार्मिक दृष्टि से भी बरगद को अमरत्व, स्थायित्व और जीवन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। वट सावित्री व्रत जैसे अनेक पर्व इस वृक्ष से जुड़े हुए हैं।
अब तक किसी बरगद की आयु निर्धारित करना वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत कठिन कार्य था। इसका प्रमुख कारण यह है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के चैड़ी पत्ती वाले वृक्षों, जैसे बरगद, में समशीतोष्ण क्षेत्रों के वृक्षों की तरह स्पष्ट वार्षिक वृद्धि-वृत्त नहीं बनते। इसलिए सामान्यतः प्रयुक्त डेंड्रोक्रोनोलॉजी पद्धति यहां प्रभावी नहीं होती। यही कारण था कि बरगद की आयु का अनुमान केवल स्थानीय मान्यताओं या ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर लगाया जाता था।
इस चुनौती को स्वीकार करते हुए लखनऊ स्थित ’’वीरबल साहनी पुराजीव विज्ञान संस्थान ’’की वैज्ञानिक डॉ. त्रिना बोस ने बिहार वन विभाग के अनुरोध पर इस ऐतिहासिक बरगद की आयु निर्धारित करने का कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने अपने सहयोगी वैज्ञानिकों डॉ. मयंक शेखर और डॉ. अखिलेश के. यादव के साथ मिलकर एक नई वैज्ञानिक पद्धति विकसित की, जिसने इस क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए।
वैज्ञानिकों ने वृक्ष के द्वितीयक तने के केंद्र के निकट तथा उसकी सबसे प्राचीन शाखा से लकड़ी के नमूने एकत्र किए। इन नमूनों से अल्फा-सेलुलोज निकाला गया, जो पौधों की कोशिका भित्ति का सबसे स्थिर घटक माना जाता है। इसके बाद इन नमूनों की उच्च-परिशुद्धता वाली ’’एक्सेलरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री ’’तकनीक द्वारा रेडियोकार्बन डेटिंग की गई। प्राप्त परिणामों का विश्लेषण आधुनिक इंट कल 20 कैलिब्रेशन कर्व और ऑक्स कल सॉफ्टवेयर की सहायता से किया गया। इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया ने यह प्रमाणित किया कि यह बरगद लगभग 700 वर्ष पुराना है।
इस शोध ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धारणा को भी बदल दिया। अब तक माना जाता था कि यह बरगद मुंगेर के ऐतिहासिक बुर्रा बंगला के निर्माण के समय लगाया गया था, जिसकी आयु लगभग 300 से 350 वर्ष मानी जाती थी लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि यह बरगद उस भवन से भी कई शताब्दियों पुराना है। अर्थात यह वृक्ष उस समय भी मौजूद था जब बुर्रा बंगला अस्तित्व में नहीं आया था। इससे संकेत मिलता है कि यह बरगद उस प्राचीन प्राकृतिक वन का अवशेष है जो कभी पूरे क्षेत्र में फैला हुआ था।
यह खोज केवल एक पेड़ की आयु जानने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास को भी नए सिरे से समझने का अवसर प्रदान करती है। यदि कोई वृक्ष किसी ऐतिहासिक इमारत से कई शताब्दियों पुराना सिद्ध होता है, तो वह उस क्षेत्र के सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विकास का मौन साक्षी भी माना जा सकता है।
यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका क्वाटरनरी रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह नई तकनीक भविष्य में भारत सहित दुनिया के अन्य उष्णकटिबंधीय देशों में स्थित प्राचीन वृक्षों की आयु निर्धारित करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इससे सरकारों, वन विभागों और संरक्षण एजेंसियों को सांस्कृतिक तथा पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों की पहचान कर उन्हें संरक्षित करने में सहायता मिलेगी।
आज जब तेजी से शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब ऐसे शोध और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। प्राचीन वृक्ष केवल जैव विविधता के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने, कार्बन अवशोषण, भूजल संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे वृक्षों का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के समान है।
यह नई वैज्ञानिक पद्धति केवल वनस्पति विज्ञान तक सीमित नहीं रहेगी। इसका उपयोग जैव विविधता संरक्षण, विरासत प्रबंधन, पर्यावरण शिक्षा, जलवायु परिवर्तन के अध्ययन और ऐतिहासिक भू-दृश्यों के पुनर्निर्माण जैसे अनेक क्षेत्रों में किया जा सकेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में भी सहायता मिलेगी कि सदियों पहले किसी क्षेत्र का प्राकृतिक स्वरूप कैसा था और समय के साथ उसमें क्या परिवर्तन हुए।
अंततः, बिहार के मुंगेर का यह 700 वर्ष पुराना बरगद केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत इतिहास है। आधुनिक विज्ञान ने पहली बार उसकी वास्तविक आयु को प्रमाणित कर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी परंपराओं और लोकविश्वासों के पीछे छिपे अनेक रहस्यों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है। यह उपलब्धि भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमता, अनुसंधान की गुणवत्ता और प्रकृति संरक्षण के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है। आने वाले समय में यह तकनीक विश्वभर के प्राचीन उष्णकटिबंधीय वृक्षों के संरक्षण और उनके इतिहास को समझने में नई क्रांति ला सकती है।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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