लेखक की कलम

ईरान-अमेरिका संघर्ष का नया मोर्चा

पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान संघर्ष लगातार नए और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। हालिया घटनाक्रम में ईरान ने कुवैत, बहरीन और जॉर्डन की ओर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए हैं। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई जब अमेरिका ने लगातार आठवीं रात ईरान के विभिन्न शहरों और सैन्य प्रतिष्ठानों पर हवाई हमले किए। इन हमलों में दक्षिण-पश्चिमी ईरान स्थित निर्माणाधीन डारखोविन परमाणु ऊर्जा परियोजना भी निशाना बनी, जिससे क्षेत्रीय तनाव और गहरा गया है।
ईरान की इस जवाबी कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गया है। खाड़ी क्षेत्र के वे देश, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, अब प्रत्यक्ष रूप से इस संघर्ष की चपेट में आ रहे हैं। इससे पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने दावा किया कि उसने जॉर्डन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भारी प्रहार किए हैं। ईरानी सेना के अनुसार कुवैत के कैंप अल-अदीरी स्थित अमेरिकी गोला-बारूद डिपो तथा अली अल सलेम एयरबेस के एयर डिफेंस रडार को निशाना बनाया गया। अली अल सलेम एयरबेस लंबे समय से अमेरिकी वायुसेना की महत्वपूर्ण परिचालन इकाई माना जाता है।
कुवैत ने पुष्टि की कि ईरानी हमलों के कारण एक बिजली एवं जल संयंत्र में आग लग गई। इसके अतिरिक्त दूसरे ऊर्जा संयंत्र को भी नुकसान पहुंचा। बहरीन ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को सफलतापूर्वक रोक दिया, जबकि जॉर्डन ने चार में से तीन मिसाइलों को मार गिराने की बात कही।
ये घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि संघर्ष अब व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। अमेरिका के सैन्य अड्डों की मौजूदगी के कारण खाड़ी
देश स्वयं को सीधे युद्ध के बीच खड़ा पा रहे हैं।
इससे पहले अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए थे। अमेरिकी सेना का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान की उस क्षमता को कमजोर करना था जिसके जरिए वह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को निशाना बना रहा था। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार हालिया कार्रवाई सजा देने और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई।
इन हमलों में होर्मोजगान और खुजेस्तान प्रांतों के अलावा केश्म द्वीप के आसपास स्थित सैन्य प्रतिष्ठान भी निशाना बने। हालांकि ईरानी मीडिया का कहना है कि अमेरिकी हमले पहले की तुलना में कम तीव्र थे, लेकिन उनका प्रतीकात्मक और रणनीतिक महत्व काफी बड़ा है।
सबसे अधिक चिंता निर्माणाधीन डारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हुए हमले को लेकर व्यक्त की जा रही है। ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि नागरिक परमाणु ढांचे पर हमला अस्वीकार्य है और ईरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए आवश्यक जवाब देगा।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने कहा है कि वह इस घटना की जानकारी जुटा रही है। एजेंसी के अनुसार पिछली निरीक्षण रिपोर्ट तक इस संयंत्र में कोई परमाणु सामग्री मौजूद नहीं थी क्योंकि परियोजना अभी प्रारंभिक निर्माण चरण में है। इसके बावजूद किसी भी परमाणु प्रतिष्ठान पर सैन्य कार्रवाई वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय मानी जाती है।
ईरान के हमलों के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुवैत ने नागरिक एवं आवश्यक बुनियादी ढांचे पर हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे जघन्य आक्रमण बताया। बहरीन और जॉर्डन ने भी इसे अपनी संप्रभुता पर हमला करार दिया।
कतर ने अमेरिका और ईरान दोनों से कूटनीतिक प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने की अपील की। संयुक्त अरब अमीरात ने भी हमलों की कड़ी निंदा करते हुए प्रभावित देशों की सुरक्षा के प्रति अपना समर्थन दोहराया। जॉर्डन ने ईरानी राजदूत को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और भविष्य में ऐसे हमले रोकने की मांग की।
लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने भी कुवैत और जॉर्डन के नेताओं से बातचीत कर ईरानी हमलों की निंदा की और इसे पूरे अरब क्षेत्र की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया।
इस पूरे संकट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य बना हुआ है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है। ईरान पहले ही इस जलमार्ग पर नियंत्रण को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका है और उसका कहना है कि यहां से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही उसकी सुरक्षा व्यवस्था के अनुरूप होनी चाहिए।
आईआरजीसी ने गत दिनों दावा किया कि उसने दो जहाजों को रोक दिया जो कथित रूप से असुरक्षित मार्ग का उपयोग कर रहे थे। हालांकि इस घटना का पूरा विवरण सामने नहीं आया है, लेकिन इससे यह स्पष्ट है कि जलमार्ग को लेकर तनाव अभी समाप्त नहीं हुआ है।
दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है और किसी भी देश को उस पर एकाधिकार का अधिकार नहीं है। इसी मुद्दे को लेकर दोनों देशों के बीच लगातार टकराव बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी परीक्षा है। कतर स्थित जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पॉल मस्क्रेव के अनुसार ईरान इस युद्ध को अपने अस्तित्व से जुड़ा संघर्ष मानता है, जबकि अमेरिका और इजरायल इसे अपनी रणनीतिक नीतियों के विस्तार के रूप में देख रहे हैं। यही कारण है कि दोनों पक्षों की प्राथमिकताएं और युद्ध को लेकर उनकी प्रतिबद्धता अलग-अलग दिखाई देती हैं।
यदि यह संघर्ष इसी तरह जारी रहा तो इसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार, बीमा उद्योग और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय है क्योंकि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा होता है।
फिलहाल स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक संवाद लगभग ठप पड़ चुका है, जबकि सैन्य कार्रवाई
लगातार जारी है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि इस संघर्ष को पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध में बदलने से रोका जाए। यदि शीघ्र ही कूटनीतिक समाधान नहीं निकला तो पश्चिम एशिया एक लंबे और विनाशकारी संघर्ष की ओर बढ़ सकता है, जिसका प्रभाव पूरी दुनिया को भुगतना पड़
सकता है।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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