लेखक की कलम

इराक की कूटनीतिक परीक्षा

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने इराक को एक बार फिर जटिल कूटनीतिक स्थिति में ला खड़ा किया है। एक ओर इराक अपने सबसे बड़े सुरक्षा और आर्थिक साझेदार अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह पड़ोसी देश ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी कमजोर नहीं कर सकता। ऐसे समय में इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की अमेरिका यात्रा और व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनकी मुलाकात ने इस नाजुक संतुलन को वैश्विक चर्चा का विषय बना दिया।
व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इराक के 40 वर्षीय प्रधानमंत्री अली अल-जैदी का गर्मजोशी से स्वागत किया। ट्रंप ने उन्हें युवा, ऊर्जावान और शानदार नेता बताते हुए कहा कि वह इराक के साथ नए आर्थिक संबंध स्थापित करना चाहते हैं। दोनों नेताओं ने व्यापार, ऊर्जा और निवेश के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। ट्रंप ने कहा कि इराक के पास अपार तेल संसाधन हैं और अमेरिका वहां बड़े पैमाने पर निवेश तथा व्यावसायिक समझौते करना चाहता है।
हालांकि, इस सकारात्मक माहौल के कुछ ही घंटे बाद अमेरिका का कड़ा संदेश भी सामने आया। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इराक से स्पष्ट रूप से कहा कि उसे अपने देश में सक्रिय ईरान समर्थित सशस्त्र संगठनों को निरस्त्र करना होगा। उन्होंने कहा कि ये संगठन क्षेत्रीय स्थिरता और अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। अमेरिका का मानना है कि यदि इराक अपनी संप्रभुता को मजबूत करना चाहता है, तो उसे इन हथियारबंद गुटों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना होगा।
विश्लेषकों के अनुसार यही वह बिंदु है, जहां इराक की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है। अमेरिका चाहता है कि इराक ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे, जबकि इराक के भीतर इन संगठनों का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव काफी मजबूत है। ऐसे में किसी भी कठोर कदम से देश के भीतर अस्थिरता बढ़ सकती है।
प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की अमेरिका यात्रा का मुख्य उद्देश्य आर्थिक सहयोग को नई दिशा देना था। दोनों देशों ने तेल उत्पादन बढ़ाने, ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने पर चर्चा की। रिपोर्टों के अनुसार इराक के अधिकारियों की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रतिनिधियों के साथ भी बैठकें प्रस्तावित थीं, जिनमें इराक के लिए लगभग 8 अरब डॉलर के संभावित ऋण पर चर्चा की गई। यदि यह ऋण स्वीकृत होता है, तो इससे इराक की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिल सकती है।
अमेरिका और इराक के बीच सैन्य सहयोग भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण विषय रहा। दोनों नेताओं ने घोषणा की कि इराक में तैनात शेष अमेरिकी सैनिक, जिनकी संख्या दो हजार से कम बताई जाती है, 30 सितंबर तक वापस बुला लिए जाएंगे। प्रधानमंत्री जैदी ने भी इसी समय सीमा तक देश में सक्रिय हथियारबंद गुटों को निरस्त्र करने का लक्ष्य घोषित किया लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद ईरान समर्थित संगठन कताइब हिज्बुल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि यदि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ा, तो वह तुरंत संघर्ष में शामिल होगा। संगठन के एक वरिष्ठ अधिकारी अबू मुजाहिद अल-अस्साफ ने कहा कि ईरान की रक्षा करना उनके वैचारिक सिद्धांत का हिस्सा है और इस विषय पर किसी प्रकार का समझौता संभव नहीं है।
कताइब हिज्बुल्लाह तथाकथित एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस का हिस्सा है, जिसमें लेबनान का हिज्बुल्लाह, फिलिस्तीन का हमास और यमन के हूती विद्रोही जैसे संगठन भी शामिल माने जाते हैं। यह संगठन इराक की लोकप्रिय मोबिलाइजेशन फोर्स का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी स्थापना वर्ष 2014 में इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के खिलाफ लड़ाई के दौरान की गई थी।
इराक की स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि उसकी लगभग 60 प्रतिशत आबादी शिया मुस्लिम है। ईरान के धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक संबंध इराक के अनेक शिया दलों, धार्मिक संस्थाओं और सुरक्षा संगठनों के साथ दशकों पुराने हैं। व्यापार, ऊर्जा, तीर्थ यात्रा और सांस्कृतिक संपर्कों ने दोनों देशों को गहराई से जोड़ रखा है। यही कारण है कि इराक किसी भी परिस्थिति में ईरान के साथ अपने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता।
किंग्स कॉलेज लंदन की विशेषज्ञ इन्ना रुडोल्फ के अनुसार इराक अमेरिका के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है, लेकिन वह अपनी भूमि का उपयोग ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं होने देगा। उनका कहना है कि इराक की आधिकारिक विदेश नीति संतुलित संबंध बनाए रखने पर आधारित है, जबकि देश के भीतर कई राजनीतिक और सुरक्षा समूह स्वतंत्र रूप से ईरान के साथ जुड़े हुए हैं। यही दोहरी व्यवस्था इराक की सबसे बड़ी चुनौती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है, तो उसका सबसे पहला प्रभाव इराक पर पड़ेगा। ईरान समर्थित संगठन इराक की भूमि से अमेरिकी या अन्य क्षेत्रीय ठिकानों पर हमला कर सकते हैं, जिसके जवाब में अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इससे इराक की संप्रभुता प्रभावित होगी और आम नागरिकों की सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।
इसके अतिरिक्त, राजनीतिक संकट भी गहरा सकता है। पहले से ही विभिन्न गुटों में विभाजित इराकी राजनीति और अधिक अस्थिर हो सकती है। सरकार के भीतर मतभेद बढ़ सकते हैं, सुधार कार्यक्रम बाधित हो सकते हैं और निवेश प्रभावित हो सकता है। आर्थिक दृष्टि से व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और पुनर्निर्माण परियोजनाओं पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
मानवीय दृष्टिकोण से भी स्थिति चिंताजनक हो सकती है। यदि संघर्ष बढ़ता है, तो बड़े पैमाने पर विस्थापन, बेरोजगारी और मानवीय संकट की आशंका बढ़ जाएगी। इराक, जो पिछले दो दशकों से लगातार युद्ध, आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करता रहा है, उसके लिए यह स्थिति और अधिक कठिन हो सकती है।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की अमेरिका यात्रा केवल आर्थिक सहयोग का कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह इराक की जटिल विदेश नीति की वास्तविक परीक्षा भी थी। एक ओर अमेरिका सुरक्षा सुधार और ईरान समर्थित संगठनों के निरस्त्रीकरण का दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान और उससे जुड़े समूह इराक पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं। ऐसे में इराक के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपनी संप्रभुता, आंतरिक स्थिरता और आर्थिक विकास को सुरक्षित रखना है। आने वाले महीनों में अमेरिका-ईरान संबंधों की दिशा काफी हद तक यह तय करेगी कि इराक
मध्यस्थ की भूमिका निभा पाएगा या स्वयं इस क्षेत्रीय संघर्ष का केंद्र बन जाएगा।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button