मोहन के एमपी में भी यूसीसी

संविधान निर्माता बाबा साहेब डाॅ भीमराव आम्बेडकर ने कहा था- मैं व्यक्तिगत रूप से समझ नहीं पा रहा हूं कि किसी धर्म (मजहब) को यह विशाल, व्यापक क्षेत्राधिकार क्यों दिया जाना चाहिए ? ऐसे में तो धर्म, जीवन के प्रत्येक पक्ष पर हस्तक्षेप करेगा और विधायिका को उस क्षेत्र पर अतिक्रमण से रोकेगा। यह स्वतंत्रता हमें क्या करने के लिए मिली है? हमारी सामाजिक व्यवस्था असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरी है। यह स्वतंत्रता हमंे इसलिये मिली है कि हम इस सामाजिक व्यवस्था में जहाँ हमारे मौलिक अधिकारों के साथ विरोध है, वहाँ- वहाँ सुधार कर सकें। बाबा साहेब आम्बेडकर की इसी भावना को ध्यान में रखते हुए मोहन यादव की सरकार ने मध्य प्रदेश में भी समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की प्रक्रिया अपनी तरफ से पूरी करदी है । समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 में है। इसमें नीति-निर्देश दिया गया है कि समान नागरिक कानून लागू करना हमारा लक्ष्य होगा। सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में केन्द्र सरकार के विचार जानने की पहल कर चुका है।
मोहन यादव की कैबिनेट ने 19 जुलाई 2026 को यूसीसी ड्राफ्ट बिल को मंजूरी दे दी है। विधानसभा के मानसून सत्र (20 जुलाई 2026 से शुरू) के दौरान इसे पेश कर दिया गया है। नए ड्राफ्ट के अनुसार, राज्य के आदिवासी समुदाय (एसटी) को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। इसके कारण भी बताए गये हैं।यूसीसी के मुख्य प्रावधान हैं बहु-विवाह और हलाला पर रोक अर्थात एक से अधिक शादियों (पॉलीगेमी) पर पूर्णतः प्रतिबंध रहेगा। लिव-इन रिलेशनशिप पर भी इस प्रकार से प्रतिबंध लगाए गए हैं ताकि भविष्य में किसी पक्ष को पछतावा न हो। लिव-इन में रहने के लिए पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) अनिवार्य होगा, ऐसा न करने पर 3 महीने तक की सजा का प्रावधान है। शादी और तलाक के लिए भी कानूनी प्रक्रिया और पंजीकरण अनिवार्य होगा। संपत्ति के बंटवारे और बच्चों के संरक्षण में पुरुषों और महिलाओं को समान कानूनी अधिकार मिलेंगे। संशोधित नए ड्राफ्ट के अनुसार, राज्य के आदिवासी समुदाय (एसटी) को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। किसी भी धर्म और सम्प्रदाय में विवाह के लिए उम्रसीमा तय कर दी गयी है। लड़कियों की शादी की कानूनी उम्र सभी धर्मों के लिए एक समान (न्यूनतम 18 या 21 वर्ष, केंद्रीय कानून के तहत) होगी। लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को माता-पिता की संपत्ति में कानूनी रूप से वैध माना जाएगा और उन्हें पूरा अधिकार मिलेगा।पिता की पैतृक संपत्ति में बेटों और बेटियों को बराबर का हक मिलेगा, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। यूसीसी के प्रावधान के तहत कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति की वसीयत (विल) किसी को भी दे सकता है, इसमें धार्मिक पाबंदियां लागू नहीं होंगी। सभी धर्मों के नागरिकों के लिए बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया एक जैसी होगी।
यूसीसी ड्राफ्ट बिल में आदिवासी समाज को यूसीसी से बाहर रखा गया है। मध्य प्रदेश की बड़ी जनजातीय आबादी है। उनको इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है, ताकि उनकी पारंपरिक प्रथाएं और संस्कृति सुरक्षित रहें। उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता की रक्षा हो और संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान बना रहे। आदिवासियों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और परंपराएं हैं। भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया जैसी जनजातियों की शादी, तलाक और संपत्ति के बंटवारे की अपनी सदियों पुरानी अनूठी परंपराएं हैं।यूसीसी लागू होने से उनकी पारंपरिक जीवनशैली और पहचान पर असर पड़ने का खतरा था, जिसे बचाने के लिए मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे आवश्यक बताया। यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 और 366 (क्लॉज 25) के तहत आदिवासियों को विशेष संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है। संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा एक्ट के तहत आदिवासी बहुल क्षेत्रों में उनकी ग्राम सभाओं और पारंपरिक कानूनों को पहले से ही कानूनी स्वायत्तता प्राप्त है, जिसमें सामान्य नागरिक कानून सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकते। मध्य प्रदेश में आदिवासियों की आबादी कुल जनसंख्या का 21फीसद से अधिक (लगभग पांचवां हिस्सा) है और राज्य में 47 विधानसभा सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। आदिवासी संगठनों और विपक्षी दलों ने शुरू से ही मांग की थी कि जनजातीय समाज के पारंपरिक अधिकारों के साथ छेड़छाड़ न की जाए। किसी भी बड़े विरोध या असंतोष को रोकने के लिए मोहन यादव की सरकार ने यह कदम उठाया है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि देश में कहीं भी यूसीसी लाने पर आदिवासियों के अधिकारों और उनकी जमीन-जंगलों के स्वामित्व पर कोई आंच नहीं आने दी जाएगी। मध्य प्रदेश से पहले उत्तराखंड ने जब देश में पहली बार यूसीसी कानून लागू किया था, तब उसने भी इसी नीति के तहत आदिवासियों को पूरी तरह से इसके दायरे से बाहर रखा था। मप्र सरकार ने भी इसी मॉडल को अपनाया है।
समान नागरिक संहिता का अर्थ एक ऐसा कानून है, जो देश के सभी नागरिकों (धर्म, जाति या लिंग की परवाह किए बिना) के लिए विवाह, तलाक, विरासत, संपत्ति के बंटवारे और बच्चा गोद लेने जैसे मामलों में समान रूप से लागू होता है।वर्तमान में भारत में हिंदुओं, मुस्लिमों, ईसाइयों और पारसियों के लिए अपने अलग धार्मिक पर्सनल लॉ हैं। यूसीसी लागू होने पर ये सभी समाप्त होकर सभी के लिए एक समान नियम हो जाएंगे। इसका मुख्य उद्देश्य सभी नागरिकों, विशेष रूप से महिलाओं को व्यक्तिगत और संपत्ति के मामलों में लैंगिक न्याय व समान अधिकार प्रदान करना है।सरल शब्दों में, धर्म आधारित कानूनों की जगह सभी नागरिकों के लिए एक निष्पक्ष और समान नागरिक कानून ही यूसीसी है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि राज्य पूरे भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। गोवा में पहले से ही 1867 का पुर्तगाली नागरिक संहिता लागू है। इसके अतिरिक्त, फरवरी 2024 में उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने अपने नागरिकों के लिए यूसीसी विधेयक पारित कर इसे लागू किया है।
नागरिक संहिता किसी देश या राज्य के नागरिक कानून का एक व्यवस्थित, व्यापक और लिखित संग्रह होता है। इसका मुख्य उद्देश्य नागरिकों के निजी अधिकारों, कर्तव्यों और उनके बीच के कानूनी संबंधों को विनियमित करना है। यह निजी कानून की रीढ़ है और इसमें मुख्य रूप से संपत्ति, अनुबंध, विवाह, तलाक, परिवार, उत्तराधिकार और दायित्वों से संबंधित मूल कानून शामिल होते हैं। नागरिक संहिताओं का ऐतिहासिक आधार प्राचीन रोमन कानून में निहित है, विशेष रूप से छठी शताब्दी में बीजान्टिन सम्राट जस्टिनियन प्रथम द्वारा संकलित कॉर्पस ज्यूरिस सिविलिस में। हालांकि, आधुनिक नागरिक संहिताओं के विकास में सबसे बड़ा मोड़ 1804 में आया, जब फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट ने नेपोलियन कोड लागू किया। इस संहिता ने पुराने और जटिल सामंती कानूनों को समाप्त कर पूरे देश के लिए एक स्पष्ट, सुलभ और समान कानूनी ढांचा तैयार किया। इसके बाद, 1900 में लागू हुई जर्मनी की नागरिक संहिता ने भी दुनिया भर की कानूनी प्रणालियों, विशेषकर जापान और चीन के कानूनों को गहराई से प्रभावित किया।
भारत में आजादी के बाद उत्तराखंड पहला राज्य बना जहां यूसीसी लागू हुई। अब मध्यप्रदेश भी इसी कड़ी में जुड़ गया है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



