ब्रिटिश संसद में उठा पाक में हिन्दुओं के शोषण का मामला

लंदन। आतंकवाद को नेशनल पॉलिसी बनाने और मानने वाले पाकिस्तान में अल्संख्यकों की क्या स्थिति है, इसकी सूरत-ए-हाल एक बार फिर सामने आ गई है। पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे बर्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए, प्रवासी संगठन ने 28 अक्टूबर को ब्रिटिश संसद के सामने ऐसे ठोस सबूत पेश किए, जिनसे पता चलता है कि पाकिस्तान में हिंदुओं को किस तरह सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया गया, उनकी संपत्ति छीनी गई और उन्हें खत्म करने की कोशिश की गई।
पाकिस्तान में हिंदुओं का धार्मिक उत्पीड़न नाम की अपनी तीखी रिपोर्ट को ब्रिटिश हिंदुओं के लिए सर्वदलीय संसदीय समूह के सामने पेश करते हुए, इस संगठन ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और आज के समय की दिल दहला देने वाली गवाहियों को एक साथ रखा। इससे यह साफ हो गया कि सीमा पार हिंदुओं को किस तरह के सुनियोजित भेदभाव, धार्मिक स्वतंत्रता पर हमलों और जान-माल व सम्मान के लिए खतरों का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट की शुरुआत एक ऐसे आंकड़े से होती है जो उत्पीड़न की पूरी कहानी बयां कर देता है। 1941 की भारत की जनगणना के अनुसार, उस इलाके में, जो बाद में पश्चिम पाकिस्तान बना, हिंदुओं की आबादी 14.6 प्रतिशत थी। बंटवारे के बाद, यह संख्या तेजी से गिर गई। आज, पाकिस्तान की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सात दशकों तक लगातार हुई इतनी बड़ी गिरावट, इस्लामाबाद के उस दावे पर सवाल खड़े करती है जिसमें वह कहता है कि वह अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है। इन आंकड़ों के पीछे हिंसा और आर्थिक रूप से घोंटने का एक लंबा इतिहास छिपा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 1947 के दंगों के बाद से ही इस समुदाय को समय-समय पर हिंसा की लहरों का सामना करना पड़ा है। हजारों हिंदू परिवारों को वहां से भागना पड़ा या विस्थापित होना पड़ा। उन्हें एनिमी प्रॉपर्टी लॉ (शत्रु संपत्ति कानून) जैसे कठोर कानूनों के जरिए उनकी पुश्तैनी जमीन और खेतों से बेदखल कर दिया गया। इस कदम ने पूरे समुदाय को गरीबी और हमेशा के लिए विस्थापन की स्थिति में धकेल दिया।



