स्मृति विशेष

स्वामी विवेकानन्द का प्रारम्भिक जीवन

राष्ट्रीय युवा दिवस

प्रारम्भिक जीवन

स्वामी विवेकानन्द ने भारत में हिन्दू धर्म का पुनरुद्धार तथा विदेशों में सनातन सत्यों का प्रचार किया। इस कारण वे प्राच्य एवं पाश्चात्य देशों में सर्वत्र समान रूप से श्रद्धा एवं सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 ई०, सोमवार के दिन प्रातःकाल सूर्योदय के किंचित काल बाद 6 बजकर 49 मिनट पर हुआ था। मकर संक्रान्ति का वह दिन हिन्दू जाति के लिये महान उत्सव का अवसर था और भक्तगण उस दिन लाखों की संख्या में गंगाजी को पूजा अर्पण करने जा रहे थे। अतः जिस समय भावी विवेकानन्द ने इस धरती पर पहली बार साँस लिया, उस समय उनके घर के समीप ही प्रवाहमान पुण्यतया भागीरथी लाखों नर-नारियों की प्रार्थना, पूजन एवं भजन के कलरव से प्रतिध्वनित हो रही थी।

स्वामी विवेकानन्द के जन्म के पर्व अन्य धर्मप्राण हिन्दू माताओं के समान ही, उनकी माताजी ने भी व्रत-उपवास किये थे तथा एक ऐसे सन्तान के लिये प्रार्थना की थी, जिससे उनका कुल धन्य हो जाय। उन दिनों उनके मन-प्राण पर त्यागीश्वर शिव ही अधिकार जमाये हुए थे, अतः उन्होंने वाराणसी में रहने वाली अपने रिश्ते की एक महिला से वहाँ के वीरेश्वर शिव के मन्दिर में विशेष पूजा चढ़ाकर आशीर्वाद माँगने को अनुरोध किया था। एक रात उन्होंने स्वप्न में महादेव जी को ध्यान करते देखा, फिर उन्होंने नेत्र खोले और उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वचन दिया। नींद खुलने के बाद उनके आनन्द की सीमा न रही थीखेतड़ी नरेश ने दिया था विवेकानंद नाम

 

माता भुवनेश्वरी देवी ने अपने पुत्र को शिवजी का प्रसाद माना और उसे वीरेश्वर नाम दिया। परन्तु परिवार में उनका नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था और संक्षेप में उन्हें नरेन्द्र तथा दुलार में नरेन कह कर सम्बोधित किया जाता था।

कलकत्ता के जिस दत्त वंश में नरेन्द्रनाथ का जन्म हुआ था, वह अपनी समृद्धि, सहृदयता, पाण्डित्य एवं स्वाधीन मनोवृत्ति के लिये सुविख्यात था। उनके दादा श्री दुर्गाचरण ने अपने प्रथम पुत्र का मुख देखने के बाद ही ईश्वरप्राप्ति की अभिलाषा से गृहत्याग कर दिया था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता थे। उन्होंने अंग्रेज़ी तथा फ़ारसी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। उनके मतानुसार बाइबिल तथा हाफ़िज़ के काव्य में जगत् के सर्वश्रेष्ठ विचार निहित हैं। वे बहुधा उक्त दोनों ग्रन्थों के उद्धरण दुहरा कर अपना एवं मित्रों का मनोरंजन करते थे। उत्तर भारत के शिक्षित मुस्लिम समुदाय के साथ घनिष्ठ सम्पर्क में आने के फलस्वरूप उन्हें इस्लामी संस्कृति का अच्छा ज्ञान था। वकालत के व्यवसाय में उन्हें अच्छी-ख़ासी आय हो जाती थी और वे अपने पिता के स्वभाव के विपरीत सांसारिक जीवन का खूब आनन्द लेते थे। वे पाकविद्या में भी निपुण थे तथा उत्तम व्यंजन बनाकर मित्रों के साथ उपभोग करते थे। भ्रमण उनका एक अन्य शौक़ था।स्वामी रामकृष्ण परमहंस के ध्यान में मां काली

धर्म के मामले में वे अज्ञेयवादी थे और सामाजिक रीति-रिवाज़ों के प्रति उपहास का भाव रखने के बावजूद उनका हृदय विशाल था। यहाँ तक कि वे अपने कुछ निर्धन आलसी सम्बन्धियों को अपने घर में रखकर उनकी देखभाल किया करते थे। इन सम्बन्धियों में से किसी-किसी को नशे की लत भी थी। उनकी इस विचारशक्ति के अभाव पर नरेन्द्र ने एक दिन विरोध प्रकट किया। इस पर वे बोले— “मानव जीवन के महान दुःख-दर्द को भला तुम कैसे समझोगे? जब तुम मानवीय पीड़ा का गहराई से अनुभव करोगे, तो मादक द्रव्यों की सहायता से अपने दुःखों को क्षण-भर के लिये भूलने का प्रयास

करणावाले इन अभागे प्राणियों के प्रति तुम्हारे मन में सहानुभूति ही जागेगी।’ नरेन्द्र के पिता अपनी सन्तानों पर तीक्ष्ण दृष्टि रखते थे, और सन्मार्ग से उनका थोड़ा भी विचलन सहन न कर पाते थे। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी एक अलग ही साँचे में ढली थीं। वे देखने में गम्भीर और आचरण में उदार थीं तथा प्राचीन हिन्दू परम्परा का प्रतिनिधित्व करती थीं। वे एक भरे-पूरे परिवार की मालकिन थीं और अपने अवकाश का समय सिलाई एवं भजन गाने में बिताती थीं।

रामायण एवं महाभारत में उनकी विशेष रुचि थी तथा इन ग्रन्थों के अनेक अंश उन्हें कण्ठस्थ भी थे। निर्धनों के लिये वे आश्रय थीं। अपनी ईश्वर-भक्ति, आन्तरिक शान्ति तथा अपनी व्यस्तता के बीच तीव्र अन्तर्दृष्टि के फलस्वरूप वे सबके सम्मान की अधिकारिणी हुई थीं। नरेन्द्रनाथ के अतिरिक्त उन्हें और भी दो पुत्र तथा चार पुत्रियाँ हुईं, परन्तु उनमें से दो पुत्रियाँ अल्प आयु में ही चल बसी थीं।

नरेन्द्र एक मधुर, प्रफुल्ल एवं चंचल बालक के रूप में बड़ा होने लगा। उसकी अदम्य शक्ति को वश में लाने के लिये दो नौकरानियों की आवश्यकता होती थी। वह अपनी बहनों को भी चिढ़ा-चिढ़ाकर परेशान किये रहता था। उसे शान्त करने का अन्य कोई उपाय न देख, उसकी माँ ‘शिव-शिव’ कहते हुए उसके सिर पर जल डालने लगती थी। इससे वह हर बार शान्त हो जाता था। बच्चों का पशु-पक्षियों के प्रति स्वाभाविक प्रेम होता है और नरेन्द्र भी इसका कोई अपवाद न था। पशु-पक्षियों के प्रति उसका यह गहरा लगाव उसके जीवन के अन्तिम पर्व में पुनः व्यक्त हो उठा था। बचपन में उसके दुलारे पशु-पक्षी थे—एक गाय, एक बन्दर, एक बकरी, एक मोर, कुछ कबूतर तथा एक गिनी पिग। पहाड़ी, कोड़े तथा भड़कीले पोशाक में सजे अपने परिवार के साईस का व्यक्तित्व उसे बड़ा लुभावना लगता था। वह प्रायः बड़े होकर वैसा ही बनने की आकांक्षा व्यक्त करता था।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button