सम-सामयिक

वंदे मातरम् की गरिमा से खिलवाड़

वंदे मातरम् गीत के 150 वर्ष पर चर्चा होने के अवसर पर लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् गीत की गूंज ने न सिर्फ अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी बल्कि पूरे भारत में उत्साह का ऐसा माहौल तैयार किया था जो न सिर्फ स्वतंत्रता का मंत्र बना बल्कि आजाद भारत के लिए भी विजन बनकर सामने आया। यह गीत आजादी का उद्गार बन गया था और हर देशवासी इस गीत से प्रेरित होकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ रहा था। इस गीत से देश में बने नये माहौल को देखकर अंग्रेज बौखला गये थे इसलिए उन्होंने इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया और इसे गाने को अपराध मानकर लोगों पर जुल्म ढहाने शुरू कर दिए थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम् पर चर्चा में कोई पक्ष और प्रतिपक्ष नहीं है क्योंकि इसी गीत से मिली प्रेरणा के कारण हम सब यहां बैठे हैं और यह हम सबके लिए पावन पर्व है।
आपको पता रहे वंदे मातरम को 1950 में भारत के संविधान सभा द्वारा भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया। वंदे मातरम् की रचना शुरू में स्वतंत्र रूप से की गई थी और बाद में इसे बंकिम चंद्र चटर्जी के 1882 में प्रकाशित उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। इसे पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में गाया था। एक राजनीतिक नारे के रूप में वंदे मातरम का पहली बार प्रयोग 7 अगस्त 1905 को हुआ था। इस वर्ष, 7 नवंबर 2025 को भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ थी, जिसका अनुवाद मां, मैं आपको नमन करता हूं, है। गत 8 दिसंबर को सदन में इस पर चर्चा हुई जिस पर सरकार एवं विपक्षियों ने अपनी अपनी राय रखी।
बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित, वंदे मातरम पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुआ था। बाद में, बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने अमर उपन्यास आनंदमठ में भजन को शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ था। इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया था। यह राष्ट्र की सभ्यता, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का एक अभिन्न अंग बन गया है। इस मील के पत्थर को मनाने का अवसर एकता, बलिदान और भक्ति के कालातीत संदेश की पुष्टि करने का अवसर प्रदान करता है। ये ऐसे दौर में हो रहा है जब विपक्ष एसआईआर पर चर्चा चाहता है। राज्यसभा बुलेटिन में वंदे मातरम को भी जय हिंद और दूसरे शब्दों के साथ शामिल किया गया है। ममता बनर्जी का भी इस मुद्दे पर मुखर हो जाना, वंदे मातरम के बंगाल कनेक्शन की तरफ खास इशारे कर रहा है। वंदे मातरम् पर यह बहस केवल एक रस्म नहीं है बल्कि यह ऐसे समय पर हो रही है जब इस गीत को लेकर राजनीति गरम है। नवंबर महीने में इस गीत के 150 साल पूरे होने पर पीएम मोदी ने कहा था कि कांग्रेस ने 1937 के अधिवेशन में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के कुछ जरूरी हिस्से हटा दिए। कांग्रेस का यह कदम विभाजन के बीज बोने जैसा था। पीएम मोदी का आरोप था कि राष्ट्रगीत को टुकड़ों में बांटकर इसकी मूल भावना कमजोर कर दी गई है। सबसे पहले वंदे मातरम् की रचना की बात करें तो बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस राष्ट्रगीत की रचना की थी। इसे पहली बार सात नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया गया था। उस दिन से लेकर आजतक यह गीत करोड़ों देशवासियों के हृदय में देशभक्ति की अलख जगा रहा है। मातृभूमि की आराधना के प्रतीक इस गीत को सुनते ही ब्रिटिश अफसरों के कान खड़े हो जाते। अंग्रेजों द्वारा वंदे मातरम् गीत को गाने या छापने पर भी बैन लगा दिया गया था। आगे चलकर यह छह छंदों वाला गीत मूल रूप से बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में संयासी विद्रोह की कहानी के माध्यम से बंकिम ने ने भारत को मां दुर्गा के रूप में चित्रित किया इसमें सुजला, सुफला, मलयजशीतलाम…। यह गीत गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत को समृद्धि और शक्ति का सपना दिखाता था। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इस गीत को एक नई पहचान मिली। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतमय रूप दिया और इसे कलकत्ता के अधिवेशन में गाया। संगीतमय प्रस्तुति ने इस गीत को अमर कर दिया। यह गीत जनमानस में तेजी से लोकप्रिय होने लगा। उसके बाद 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान स्वदेशी आंदोलन में यह नारा बन गया। कालांतर में इस गीत को लेकर मुसलमानों की तरफ से आपत्ति जताई जाने लगी। 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् गायन के समय तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर मंच से उठकर चले गए थे। इस गीत को लेकर मुस्लिम पक्ष की आपत्ति है कि वंदे मातरम् के जरिए उन पर हिंदू देवी देवताओं की पूजा का दवाव डाला जा रहा है। वंदे मातरम् में मंदिर और दुर्गा शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में तय किया कि राष्ट्रीय आयोजनों में इस गीत के केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे। यही कारण रहा कि 1937 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के केवल दो छंद ही गाए गए।
उस समय से इसी नियम का पालन किया जाने लगा। आजादी के बाद इसे नियम बनाते हुए 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत घोषित कर दिया। वंदे मातरम् को आज भी आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला हुआ है लेकिन सरकारी समारोहों में इसके पहले के दो छंदों का ही गायन होता है। हालांकि बाल कया था। गंगाधर तिलक ने इसे राष्ट्रीय प्रार्थना और अरविंदो घोष ने मंत्र कहते हुए इसे राष्ट्रगान का दर्जा देने की की मांग की थी। यह गीत राष्ट्र गान की जगह तो नहीं ले
सका लेकिन राष्ट्रगीत के तौर पर आज भी करोड़ों देशवासियों को
प्रेरणा दे रहा है। वंदे मातरम् आनंद मठ के संतानों द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह देशभक्ति के धर्म के
प्रतीक के रूप में खड़ा था, जो आनंद मठ का केंद्रीय विषय था। अपने मंदिर में, उन्होंने मातृभूमि का प्रतिनिधित्व करने वाली मां की तीन मूर्तियां स्थापित कीं।
वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी (1838-1894) 19वीं सदी के बंगाल के सब सबसे प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। उन्नीसवीं सदी के दौरान बंगाल के बौद्धिक और साहित्यिक इतिहास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। एक प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवि और निबंधकार के रूप में, उनके योगदान ने आधुनिक बंगाली गद्य के विकास और उभरते भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। आनंदमठ (1882), दुर्गेशनंदिनी (1865), कपालकुंडला (1866) और देवी चैधरानी (1884) सहित उनकी उल्लेखनीय रचनाएं, आत्म-पहचान के लिए प्रयासरत एक उपनिवेशित समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चिंताओं को दर्शाती हैं। (मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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