…तो बदल जाता इतिहास

भारत ने कुछ दिन पहले ही स्वतंत्रता की 79वीं वर्ष गांठ मनायी। उससे एक दिन पहले विभाजन की विभीषिका को याद किया गया और उन सैकड़ों बल्कि हजारों लोग की नृशंसता पूर्वक की गयी हत्या पर आक्रोश मिश्रित शोक जताया गया। यह कड़वी हकीकत है लेकिन एक सच्चाई पर पर्दा डाल दिया गया जिससे न सिर्फ भारत का बंटवारा रुक सकता था बल्कि हजारों लोगों की मौत को भी टाला जा सकता था। अभी 18 अगस्त को खबर आयी कि पाकिस्तान मुंबई के दो डाक्टर्स को अपना सर्वोच्च सम्मान देने जा रहा है। यह सम्मान जिन्ना की मौत के बाद 2027 में इस्लामाबाद में दिया जाएगा। ये दोनों वही डाक्टर्स थे जिन्होंने देश के विभाजन की मांग करने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की जानलेवा बीमारी के बारे में गलत रिपोर्ट देकर उसे छिपाया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर नेहरू तक यह समझ रहे थे कि मोहम्मद अली जिन्ना देश के दो टुकड़े करवा कर ही रहेंगे क्योंकि मुसलमानों को उन्होंने भड़का रखा था। उसी समय जिन्ना गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे और उनका ज्यादा दिन जिंदा रहना नामुमकिन था। जिन्ना मर जाते तो बंटवारे की मांग का आंदोलन भी दब जाता। ब्रिटिश भारत के आखिरी वायसराय लार्ड माउंट बेटन ने भी यह बात मानी थी कि अगर उन्हें जिन्ना की बीमारी की गंभीरता का पता चल जाता तो शायद वे बंटवारे को टाल देते। हाँ तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली को यह बात पता चल गयी थी और उन्होंने धूर्तता का परिचय देते हुये भारत को आजादी घोषित समय से पहले इसीलिए दे दी ताकि जिन्ना के जीवित रहते भारत के टुकड़े हो जाएं। जिन्ना को क्षय रोग (टीवी) अंतिम स्टेज में थी। जिन्ना ने अपनी बीमारी की गंभीरता को छिपाया था ताकि उनका नेतृत्व कमजोर न पड़ जाए। मुंबई के फिजिशियन डा0 जल रतन जी पटेल ओर रेडियोलाॅजिस्ट डा0 जल धाय मोकू ने इसमें जिन्ना की मदद की। उनकी बीमारी की रिपोर्ट गलत दे दी। जिन्ना की गंभीर बीमारी के बारे में उनके परिवार के कुछ सदस्यों को जानकारी थी जो एटली तक पहुंची थी। भारत का बंटवारा 1947 में हुआ और 11 सितम्बर 1948 को मोहम्मद अली जिन्ना की र्मौत हो गयी।
खबर आई है कि मुंबई के दो डॉक्टर्स को पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलने जा रहा है। ये दोनों डॉक्टर्स पारसी थे। भारतीय पारसी डॉक्टर्स को पाकिस्तान ये खास सम्मान क्यों दे रहा है। तो इसका कारण बंटवारे से पहले का है। इन दोनों ही भारतीय पारसी डॉक्टर्स ने 1947 में बंटवारे से ठीक पहले के समय में मोहम्मद अली जिन्ना की गंभीर बीमारी की जानकारी को गोपनीय रखा था। इसी बात के लिए पाकिस्तान इनको सम्मानित कर रहा है। हालांकि दोनों ही डॉक्टर्स अब जीवित नहीं हैं। उनको ये सम्मान मरणोपरांत दिया जा रहा है।
पाकिस्तान मंे योजना, विकास और विशेष पहल के संघीय मंत्री और पुरस्कार समिति के प्रमुख अहसान इकबाल ने कहा कि इस्लामाबाद ने फिजिशियन डॉ। जल रतनजी पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉ। जल धायभो-कू को निशान-ए-इम्तियाज अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया है। उनको ये सम्मान उनकी शांत लेकिन असाधारण सेवा के लिए दिया जा रहा है। उन्होंने अपना फर्ज निभाते हुए जिन्ना की गंभीर बीमारी की जानकारी को उनके करीबी लोगों तक ही सीमित रखा था। अहसान इकबाल ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि डॉ। पटेल और डॉ. धायभो-कू ने 1946 में जिन्ना के एक्स-रे की जांच की थी। उनको पता चला कि उनकी टीबी की बीमारी बहुत बढ़ गई है। उनके पास सिर्फ एक या दो साल का ही वक्त बचा है। दोनों डॉक्टर्स ने जिन्ना की बीमारी को गोपनीय रखते हुए अपना फर्ज बखूबी निभाया। कई इतिहासकारों का मानना है कि ये एक ऐसा राज था जो अगर खुल जाता, तो शायद भारत का बंटवारा न होता। अखंड भारत बना रहता।
इकबाल ने कहा कि अवॉर्ड्स कमेटी के चेयरमैन के तौर पर, मुझे दो बेहतरीन डॉक्टरों-एक फिजिशियन और एक रेडियोलॉजिस्ट- को निशान-ए-इम्तियाज के लिए नॉमिनेट करने का सौभाग्य मिला। ये दोनों डॉक्टर बॉम्बे के पारसी समुदाय से थे। उन्होंने कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना की जानलेवा बीमारी की बात को पूरी ईमानदारी से गोपनीय रखा था। उन्होंने कहा कि इन डॉक्टरों ने नाजुक समय में पूरी तरह से प्रोफेशनल गोपनीयता बनाए रखकर एक शांत लेकिन असाधारण सेवा की। प्रोफेशनल शपथ के प्रति उनकी निष्ठा अनजाने में ही उन हालात में एक अहम योगदान बन गई, जिनकी वजह से पाकिस्तान का बनना संभव हो पाया।
जिन्ना की मौत के 78 साल बाद डॉ. पटेल और डॉ. धायभो-कू को पाकिस्तान का यह सम्मान मिल रहा है। दोनों को मरणोपरांत यह सम्मान मार्च 2027 में एक समारोह के दौरान औपचारिक रूप से दिया जाएगा। पाकिस्तानी मंत्री के मुताबिक, ब्रिटिश भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने बाद में माना था कि अगर उनको जिन्ना की बीमारी की गंभीरता का पता चल जाता तो शायद वे बंटवारे को टाल देते, जिससे इतिहास की धारा ही बदल सकती थी।
इतिहासकार और एकेडमिक अकबर अहमद ने अपनी किताब जिन्ना, पाकिस्तान एंड इस्लामिक आइडेंटिटी: द सर्च फॉर सलादीन में लिखा है कि जिन्ना 1930 के दशक से ही टीबी की बीमारी से पीड़ित थे। ये बात उनकी बहन फातिमा जिन्ना समेत कुछ करीबियों को ही पता थी।
उस समय टीबी बहुत खतरनाक बीमारी थी। इसका कोई असरदार एंटीबायोटिक इलाज मौजूद नहीं था। नेहरू की पत्नी का निधन भी टीवी से हुआ था। कहा जाता है कि जिन्ना ने अपनी बीमारी की गंभीरता लोगों से इसलिए छिपाकर रखा था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उनकी राजनीतिक छवि और नेतृत्व पर बुरा असर पड़ सकता है। 1947 में भारत के बंटवारे के समय तक जिन्ना की सेहत बहुत खराब हो चुकी थी। बंटवारे के एक साल बाद ही 11 सितंबर 1948 को पल्मोनरी टीबी की वजह से उनका निधन हो गया। इससे पूर्व 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि अंग्रेज भारत छोड़ देंगे और 3 जून को, वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन ने अगले 72 दिनों में सत्ता हस्तांतरण की योजना जारी की। इस काम में उपमहाद्वीप का बंटवारा, उसकी सेना, सिविल सेवा, रेलवे, पुलिस और डाक प्रणाली का बंटवारा, और यहां तक की ऑफिस इक्विपमेंट आदि तक की संपत्ति का उचित हिस्सा तय करना शामिल था। माउंटबेटन की मेज पर एक टियर-ऑफ कैलेंडर था, जो दिखाता था कि काम पूरा होने में कितने दिन बचे हैं। सीमा के दूसरी तरफ, 14 अगस्त को पाकिस्तान बना। यह रमजान के महीने का 26वां दिन था। उसी दिन मोहम्मद अली जिन्ना ने लॉर्ड माउंटबेटन के लिए लंच रखा था, जबकि नए बने इस्लामिक देश में बहुत से लोग रोजा रख रहे थे। कानूनी तौर पर पाकिस्तान को 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में आना चाहिए था। लेकिन 14 अगस्त आधिकारिक तारीख बन गई, क्योंकि माउंटबेटन को कराची से नई दिल्ली जाना था।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



