गोला-बारूद में आत्म निर्भरता

समय और परिस्थिति के अनुसार प्रत्येक चीज की अहमियत होती है। हमारे देश में कहा भी गया है-जहां काम आवे सुई, काह करै तलवारि। यह बात सेना पर भी लागू होती है। लड़ाई केवल टैंकों और मिसाइलों से ही नहीं जीती जा सकती है। कहीं-कहीं गोला-बारूद महत्वपूर्ण हो जाता है। हम 2026 के नये सूरज का जब इंतजार कर रहे थे। तभी यह खुश खबरी मिली कि हमारी सेना गोला-बारूद के मामले में लगभग आत्म निर्भर हो गयी है। भारतीय सेना अपनी जरूरत का 90 फीसद से अधिक गोला-बारूद देश के अंदर ही बना रही है। हमारी सेना को लगभग 200 अलग-अलग श्रेणियों के गोला-बारूद का इस्तेमाल करना पड़ता है। अब तक हम रूस और इजरायल से इसका आयात करते थे। अब सिर्फ 10 प्रतिशत के लिए हमें दूसरे देशो की मदद लेनी पड़ेगी और उम्मीद यह है कि यह 10 फीसद गोला-बारूद भी शीघ्र ही मेड इन इंडिया हो जाएगा। देश के अंदर गोला-बारूद ही नहीं हैवी वेट टारर्बपीडो और सीक्यूवी काबाॅइन भी हमारी सेना और नौ सेना की ताकत को बढ़ाएंगी। इसके लिए वर्ष 2025 के अंतिम दिनों में 4666 करोड़ का डिफेंस करार सम्पन्न हुआ है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार बीते साल सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए 1 लाख 82 हजार 492 करोड़ के पूंजीगत अनुबंध भी किये जा चुके हैं।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध केवल अत्याधुनिक टैंकों या मिसाइलों से नहीं जीते जाते, बल्कि युद्ध क्षेत्र में गोला-बारूद की निर्बाध सप्लाई को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता से जीते जाते हैं। भारतीय सेना ने इसी ‘सस्टेनेबिलिटी’ को अपनी रणनीति का केंद्र बनाया है। पहले भारत को महत्वपूर्ण गोला-बारूद और प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन (सटीक हमला करने वाले गोले) के लिए रूस, इजरायल या पश्चिमी देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे संकट के समय आपूर्ति बाधित होने का खतरा बना रहता था। अब यह निर्भरता लगभग समाप्त हो गई है। बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों और युद्ध के नए तौर-तरीकों को देखते हुए भारतीय सेना ने अपनी सामरिक तैयारियों में एक ऐतिहासिक बदलाव किया है। यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने यह साबित कर दिया है कि अब युद्ध केवल कुछ दिनों का नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाला ‘लॉजिस्टिक्स गेम’ बन गया है। इसी वास्तविकता को स्वीकारते हुए, भारतीय सेना ने गोला-बारूद की आपूर्ति में अभूतपूर्व आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। सेना अब अपने शस्त्रागार के 90 प्रतिशत से अधिक गोला-बारूद का निर्माण देश के भीतर ही कर रही है।
भारतीय सेना वर्तमान में करीब 200 अलग-अलग श्रेणियों के गोला-बारूद और प्रिसिजन म्यूनिशन का इस्तेमाल करती है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से 90 फीसदी अब ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार हो रहे हैं। शेष 10 फीसदी विशिष्ट श्रेणी के गोला-बारूद के लिए भी सेना, सरकारी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर तेजी से काम कर रही आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले तीन वर्षों में भारतीय रक्षा कंपनियों को लगभग 26,000 करोड़ रुपये के गोला-बारूद के ऑर्डर दिए गए हैं। इसके अलावा, सेना ने ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत करीब 16,000 करोड़ रुपये का एक नया ‘ऑर्डर बास्केट’ तैयार किया है, जो अगले कुछ वर्षों में घरेलू उद्योग को मिलेगा।
इस रणनीति का सबसे बड़ा फायदा भारतीय रक्षा निर्माण क्षेत्र को मिला है। खरीद प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाने से निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है। अब स्थिति यह है कि कई महत्वपूर्ण गोला-बारूद श्रेणियों के लिए सेना के पास एक नहीं, बल्कि एक से अधिक घरेलू सप्लायर मौजूद हैं। यह प्रतिस्पर्पाा न केवल कीमतों को नियंत्रित कर रही है, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार ला रही है।
सिर्फ निर्माण ही नहीं, बल्कि सेना अब पूरी सप्लाई चेन को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है। इसमें गोला-बारूद बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करना, पुरानी फैक्ट्रियों का आधुनिकीकरण और उत्पादन की गुणवत्ता पर सख्त निगरानी शामिल है।
पिछले दिनों रक्षा मंत्रालय ने 4,666 करोड़ के दो बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किए। ये समझौते सेना और नौसेना की युद्ध क्षमता को और मजबूत करेंगे। कॉन्ट्रैक्ट नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुए। पहला कॉन्ट्रैक्ट ‘क्लोज क्वार्टर बैटल कार्बाइन’ के लिए है। इसके तहत सेना और नौसेना के लिए 4.25 लाख से ज्यादा ब्फठ कार्बाइन खरीदी जाएंगी। ये आधुनिक और हल्की कार्बाइन तंग जगहों में लड़ाई के लिए बेहद कारगर होंगी। इससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा मिलेगा।
दूसरा कॉन्ट्रैक्ट ‘हेवीवेट टॉरपीडो’ के लिए है। लगभग 1,896 करोड़ के रुपये इस सौदे के तहत नौसेना के 48 टॉरपीडो खरीदे जाएंगे। इन टॉरपीडो की आपूर्ति अप्रैल 2028 से शुरू होकर 2030 की शुरुआत तक पूरी होगी। इससे नौसेना की पनडुब्बियों की मारक क्षमता और आधुनिक तकनीकी ताकत बढ़ेगी। रक्षा मंत्रालय ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए 1,82,492 करोड़ रुपए के पूंजीगत अनुबंध किए जा चुके हैं। कुछ दिन पहले ही रक्षा मंत्रालय ने सेना की युद्ध क्षमता को मजबूत करने के लिए 79,000 करोड़ रुपये मूल्य के लंबी दूरी के रॉकेट, मिसाइल, रडार सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरणों की खरीद को मंजूरी प्रदान की थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) ने प्रस्तावों को हरी झंडी दे दी। बयान में कहा गया कि लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से भेदने के लिए पिनाका रॉकेट प्रणालियों की मारक क्षमता और सटीकता को बढ़ाने के वास्ते लंबी दूरी के दिशा निर्देशित रॉकेटों की खरीद की जा रही है। उन्नत रेंज वाली एकीकृत ड्रोन पहचान और अवरोधन प्रणाली (एमके-2) सामरिक युद्ध क्षेत्र तथा भीतरी इलाकों में भारतीय सेना की महत्वपूर्ण संपत्तियों की रक्षा करेगी। इसके साथ ही भारतीय नौसेना के लिए, उच्च आवृत्ति सॉफ्टवेयर रेडियो (एचएफ एसडीआर) मैनपैक की खरीद और उच्च ऊंचाई तथा लंबी दूरी वाली तथा दूर से संचालित विमान प्रणाली (आरपीएएस) को पट्टे पर लेने की मंजूरी भी दी गई है।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



