लेखक की कलम

पाकिस्तानी साजिशों के निशाने पर है दिल्ली

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने लगातार दो दिनों में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े एक कथित मॉड्यूल का भंडाफोड़ कर पांच संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। ये आरोपी पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर भारत के खिलाफ साजिश रच रहे रहे थे और युवाओं को अपने नेटवर्क से जोड़ने का काम कर रहे थे।
दिल्ली पुलिस के अनुसार इस्लामाबाद में ऑपरेट एक कथित आईएसआई कॉल सेंटर के जरिए भारतीय युवाओं को प्रभावित कर अपने से जोड़ने की कोशिश की जा रही थी। गिरफ्तार आरोपियों को देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस बलों को निशाना बनाने का टास्क दिया गया था। जांच के दौरान कई संदिग्ध वीडियो भी बरामद हुए हैं, जिनमें पुलिस बलों की रेकी और उनकी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी रिकॉर्ड की गई थी। पुलिस का दावा है कि ये वीडियो पाकिस्तान भेजे गए थे। कथित मॉड्यूलों का पर्दाफाश देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है।
पांच आरोपितों की 17 जून को गिरफ्तारी और उससे पहले सात संदिग्धों का पकड़ा जाना यह संकेत देता है कि भारत के खिलाफ सीमा पार से चलाया जा रहा षड्यंत्र अव केवल पारंपरिक आतंकवाद तक सीमित नहीं रहा है। यह नेटवर्क अव स्थानीय अपराधियों, बेरोजगार युवाओं, गैंगस्टरों और डिजिटल माध्यमों के जरिए देश के भीतर अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर रहा है। पुलिस के अनुसार पाकिस्तान में बैठे हैंडलर शहजाद भट्टी और उसके सहयोगियों से जुड़े नेटवर्क के कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि इन मॉड्यूलों को दिल्ली-एनसीआर और आसपास के राज्यों में पुलिसकर्मियों पर हमले, पोस्टरबाजी, ग्रैफिटी और संवेदनशील ठिकानों की रेकी जैसे काम सौंपे गए थे। यह मामला केवल कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत के खिलाफ साजिशों का तरीका अव बदल रहा है। लंबे समय तक आतंकवाद का खतरा मुख्य रूप से सीमा पार से घुसपैठ, हथियारों की आपूर्ति और प्रशिक्षित आतंकियों की गतिविधियों के रूप में देखा जाता था लेकिन अब आईएसआई और उसके संरक्षण में सक्रिय आतंकी अपराधी नेटवर्क ने अपनी रणनीति को अधिक चालाक, अधिक छिपा हुआ और अधिक खतरनाक बना दिया है। अब लक्ष्य ऐसे युवाओं को फंसाना है, जिनका पहले कोई आतंकी रिकॉर्ड नहीं होता। ऐसे लोग सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी में आसानी से नहीं आते और इन्हें रेकी, हथियारों की ढुलाई, प्रचार सामग्री लगाने या छोटे-छोटे हमलों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि नेटवर्क इंटरनेट मीडिया, एन्क्रिप्टेड चैट एप्स, फर्जी सोशल मीडिया खातों और अस्थायी मोबाइल नंवरों का इस्तेमाल कर रहा है। बेरोजगार, आर्थिक रूप से कमजोर या अपराधी प्रवृत्ति के युवाओं को पैसे, हथियारों, विदेश में बसाने या गैंगस्टरों के रसूख का लालच देकर जाल में फंसाया जा रहा है। यह आतंकवाद का नया रूप है, जिसमें विचारधारा से अधिक लालच, अपराध और डिजिटल भ्रम का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह हाइब्रिड और प्रॉक्सी वार की ऐसी शैली है, जिसमें दुश्मन सामने से नहीं, बल्कि समाज के भीतर कमजोर कड़ियों को इस्तेमाल कर हमला करने की कोशिश करता है। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसने कथित तौर पर ऐसे नेटवर्क को शुरुआती चरण में पकड़ने का दावा किया है। यदि ये मॉड्यूल सक्रिय रहते, तो इनके जरिए पुलिसकर्मियों पर हमले, अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियां और सोशल मीडिया आधारित प्रचार को बढ़ावा दिया जा सकता था। किसी भी देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों का मनोबल अत्यंत महत्वपूर्ण होत्ता है। ऐसे में पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने की साजिश केवल कानून-व्यवस्था पर हमला नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति और समाज के भरोसे को कमजोर करने की कोशिश भी है। आईएसआई की पुरानी रणनीति भारत में अशांति फैलाने के लिए अलगाववाद, आतंकवाद और सीमा पार नेटवर्क का इस्तेमाल करने की रही है लेकिन अब इसमें गैंगस्टर, हवाला, मादक पदार्थ तस्करी और डिजिटल भर्ती को जोड़ दिया गया है।
पाकिस्तान में बैठे अपराधी तत्वों और आतंकियों का गठजोड़ भारत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। दाऊद इब्राहिम जैसे पुराने अंडरवर्ल्ड नेटवर्क से लेकर नए गैंगस्टर समूहों तक, यदि ये सब आईएसआई के संरक्षण में भारत विरोधी गतिविधियों में लगते हैं, तो यह केवल पुलिस की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती है। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल गिरफ्तारी काफी नहीं है। सुरक्षा एजेंसियों को तकनीकी निगरानी, वित्तीय खुफिया तंत्र और स्थानीय सूचना नेटवर्क को और मजबूत करना होगा। सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रेडिक्टिव इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक साधनों का उपयोग बढ़ाना होगा। साथ ही, क्रिप्टोकरेंसी, हवाला और संदिग्ध बैंक लेन-देन पर कड़ी निगरानी आवश्यक है, क्योंकि ऐसे नेटवर्क पैसों के बिना लंबे समय तक काम नहीं कर सकते।
इसके साथ ही समाज की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। किसी युवा के व्यवहार में अचानक बदलाव, संदिग्ध लोगों से संपर्क, अचानक आए पैसों का दिखावा या ऑनलाइन कट्टर और आपराधिक सामग्री से जुड़ाव, इन संकेतों को परिवार और समाज को गंभीरता से लेना होगा। कम्युनिटी पुलिसिंग को मजबूत कर स्थानीय स्तर पर पुलिस और जनता के बीच भरोसा बढ़ाया जाना चाहिए। यदि समाज सतर्क रहेगा, तो ऐसे नेटवर्क युवाओं को आसानी से अपने जाल में नहीं फंसा पाएंगे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी, राज्य पुलिस, आतंकवाद निरोधक इकाइयों और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल भी जरूरी है। कई बार ऐसे नेटवर्क एक राज्य से दूसरे राज्य तक फैले होते हैं। इसलिए सूचना साझा करने, संयुक्त कार्रवाई करने और गिरफ्तार आरोपितों से मिले डिजिटल डाटा का त्वरित विश्लेषण करने की व्यवस्था और तेज होनी चाहिए। जेलों से संचालित अपराधी नेटवर्क और विदेशों में बैठे गैंग्स्टरों की संपत्तियों पर भी कड़ा प्रहार जरूरी है।
भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार दुश्मन की साजिशों को समय रहते नाकाम किया है। यह राहत की बात है, लेकिन संतोष का कारण नहीं। आने वाले समय में खतरा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, गेमिंग एप्स, फर्जी पहचान और स्थानीय अपराधी नेटवर्क के जरिए भी सामने आएगा। इसलिए सतर्कता, तकनीकी क्षमता और सामाजिक जागरूकता तीनों को साथ लेकर चलना होगा। आईएसआई का उद्देश्य भारत में भय, भ्रम और अस्थिरता फैलाना है। इसका जवाब केवल कठोर कार्रवाई से नहीं, बल्कि मजबूत समाज, जागरूक युवा और सजग सुरक्षा व्यवस्था से दिया जा सकता है। समय की मांग है कि इस डिजिटल और आपराधिक जाल की जड़ों पर प्रहार किया जाए। देश की आंतरिक सुरक्षा से समझौता नहीं हो सकता। आईएसआई के इस जाल को हर हाल में तोड़ना जरूरी है।(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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