चीनी विद्वानों ने कहा भगवत गीता है ज्ञान का अमृत

प्राचीन भारतीय ग्रंथ भगवद्गीता को चीनी विद्वानों ने आधुनिक विश्व के लिए ‘ज्ञान का अमृत’ तथा ‘भारतीय सभ्यता का लघु इतिहास’ करार दिया है। प्रसिद्ध चीनी विद्वानों ने कहा कि यह आधुनिक युग में लोगों के समक्ष उभरने वाली आध्यात्मिक एवं भौतिक दुविधाओं का समाधान प्रस्तुत करती है। यह इस प्राचीन ग्रंथ की सार्वजनिक प्रशंसा का एक दुर्लभ उदाहरण है।
भारतीय दूतावास द्वारा 25 अक्टूबर को आयोजित ‘संगमम-भारतीय दार्शनिक परंपराओं का संगम’ विषयक संगोष्ठी में भगवद्गीता पर चर्चा करते हुए चीनी विद्वानों ने इसे भारत का दार्शनिक विश्वकोश बताया। उन्होंने भौतिक एवं आध्यात्मिक क्रियाकलापों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली इसकी कालजयी अंतर्दृष्टि पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता 88 वर्षीय प्रोफेसर झांग बाओशेंग थे, जिन्होंने भगवद्गीता का चीनी भाषा में अनुवाद किया है। गीता को आध्यात्मिक महाकाव्य तथा भारत का दार्शनिक विश्वकोश बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका अनुवाद आवश्यक था, क्योंकि यह भारत के आध्यात्मिक दृष्टिकोण को उजागर करता है। कर्तव्य, कर्म तथा वैराग्य के प्रति उसके विचार, जो आज भी भारतीय जीवन को प्रतिपादित करते हैं।प्रोफेसर झांग ने 1984-86 के दौरान भारत में अपने अनुभवों का वर्णन किया, जो दक्षिण के केप कोमोरिन (अब कन्याकुमारी) से उत्तर के गोरखपुर तक फैले हुए थे। उन्होंने कहा कि एक जीवंत नैतिक एवं आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में हर स्थान पर उन्होंने भगवान कृष्ण की उपस्थिति महसूस की। ऐसे अनुभवों से उन्होंने देखा कि गीता कोई दूरस्थ धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह भारतीय मनोविज्ञान, नैतिकता एवं सामाजिक जीवन पर जीवंत प्रभाव डालता है। उन्होंने इसे भारतीय आत्मा का ‘सांस्कृतिक नृविज्ञान’ कहा। प्रोफेसर झांग ने भगवद्गीता को ‘भारतीय सभ्यता का लघु इतिहास’ करार दिया, जिसके संवाद नैतिक संकट, दार्शनिक संश्लेषण तथा धार्मिक पुनर्जागरण को प्रतिबिंबित करते हैं।



