अध्यात्म

एकादशी व्रत से भगवान विष्णु की मिलती कृपा

भारतीय परम्परा मंे एकादशी व्रत का बहुत महत्व है। महीने मंे दो बार व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णु जी की कृपा से पाप, दोष, रोग, दुख से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही पितृ दोष भी मिट जाता है। एकादशी व्रत करने वालों को भगवान विष्णु अपने धाम अर्थात् बैकुंठ मंे निवास देते हैं। इसी प्रकार मार्गशीर्ष अमावस्या को स्नान-दान से शनि की साढ़े साती समाप्त हो जाती है। मार्गशीर्ष अष्टमी को 12 नवम्बर को काल भैरव जयंती मनायी जाएगी। काल भैरव की पूजा से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।
एकादशी व्रत हर माह में दो बार आता है, एक शुक्ल पक्ष में और दूसरा कृष्ण पक्ष में। एकादशी व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और अगले दिन पारण करके व्रत को पूरा किया जाता है। एकादशी व्रत करने से पाप, दुख, रोग, दोष आदि मिटते हैं, पितृ दोष की शांति होती है, पितरों का उद्धार होता है और जीवन के अंत में मोक्ष भी मिलता है। एकादशी व्रत करने वालों को बैकुंठ धाम में स्थान प्राप्त होता है। यदि आपको एकादशी व्रत की शुरूआत करनी है तो वह शुभ घड़ी आ गई है, जब एकादशी व्रत का शुभारंभ करना अच्छा माना जाता है।
जो लोग इस साल एकादशी व्रत की शुरूआत करना चाहते हैं, उन लोगों को मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि से एकादशी व्रत शुरू करना चाहिए। मार्गशीर्ष माह को अगहन भी कहा जाता है। मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी व्रत उत्पन्ना एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है। इस साल उत्पन्ना एकादशी 15 नवंबर शनिवार को है। पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी तिथि 15 नवंबर को 12.49 एएम से लेकर 16 नवंबर को 02.37 एएम तक है। 15 नवंबर 2025 से आप एकादशी व्रत का प्रारंभ कर सकते हैं। यह एक बेहद शुभ दिन है। पौराणिक कथा के अनुसार, मार्गशीर्ष एकादशी तिथि को देवी एकादशी की उत्पत्ति हुई थी, उन्होंने विश्राम कर रहे भगवान विष्णु की रक्षा दैत्य मुर से की थी। देवी एकादशी के हाथों मुर मारा गया था। इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उस देवी से कहा कि आपकी उत्पत्ति एकादशी को हुई है, इसलिए एकादशी के दिन आपकी भी पूजा की जाएगी। यह एकादशी उत्पन्ना एकादशी कहलाएगी। इस वजह से उत्पन्ना एकादशी के दिन से एकादशी व्रत का शुभारंभ करना उत्तम माना जाता है। उत्पन्ना एकादशी के अलावा आप चैत्र, वैशाख और माघ की एकादशी से भी एकादशी व्रत का शुभारंभ कर सकते हैं।
एकादशी व्रत की शुरूआत करने वाले व्यक्ति को दो दिन पहले से ही सात्विक भोजन करना चाहिए। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का त्याग कर देना चाहिए। तामसिक वस्तुओं से दूर रहना चाहिए। एकादशी व्रत के दिन प्रातःकाल में स्नान करके व्रत और विष्णु पूजा का संकल्प लेते हैं। शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु और देवी एकादशी की पूजा करते हैं। उस समय एकादशी व्रत कथा सुनना जरूरी है। एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना होता है। एकादशी व्रत में पूरे दिन फलाहार करते हैं, अन्न का सेवन वर्जित है। पानी पीने पर रोक नहीं है। एकादशी की रात जागरण करते हैं। उस समय भजन, कीर्तन, नाम जप आदि करना उत्तम रहता है। हरि वासर के समापन के बाद द्वादशी तिथि में एकादशी व्रत का पारण किया जाता है। एकादशी व्रत के पारण से पूर्व किसी ब्राह्मण को अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल आदि का दान करना चाहिए। एकादशी व्रत आप पूरे 12 माह यानि 24 एकादशी तक कर सकते हैं। उसके बाद एकादशी व्रत का उद्यापन कर सकते हैं। यदि आपकी क्षमता है तो आप एकादशी व्रत 3, 5, 7, 11 साल तक कर सकते हैं।
कुछ लोग जीवनपर्यंत तक एकादशी का व्रत रखते हैं और जब शरीर कमजोर हो जाता है तो भगवत आज्ञा से उसका उद्यापन कर देते हैं।
भगवान विष्णु हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं और उन्हें सृष्टि का पालनहार माना जाता है। उन्हें नारायण और हरि के नाम से भी जाना जाता है और वे वैष्णववाद के सर्वोच्च देवता हैं, जो हिंदू धर्म की एक प्रमुख परंपरा है। विष्णु का मुख्य कार्य धर्म की रक्षा करना और ब्रह्मांड में व्यवस्था बनाए रखना है, जिसके लिए वे समय-समय पर अवतार लेते हैं, जिनमें राम और कृष्ण सबसे प्रसिद्ध हैं।
मार्गशीर्ष अमावस्या
मार्गशीर्ष अमावस्या को अगहन अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन स्नान-दान और तर्पण करने का विशेष महत्व माना जाता है। इसके अलावा इस दिन कुछ खास उपायों को करने से शनि की साढ़े साती और शनि ढैय्या से भी राहत मिल जाती है। बता दें वर्तमान में कुंभ, मीन और मेष राशि वालों पर शनि साढ़े साती चल रही है तो वहीं सिंह और धनु वालों पर शनि ढैय्या का साया है। ऐसे में जानिए इन राशि के लोग मार्गशीर्ष अमावस्या पर किन उपायों को करके शनि की खास कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
मार्गशीर्ष अमावस्या पर शनि स्रोत का पाठ जरूर करें इससे आपको शनि नहीं सताएंगे और शनि की दशा का भी बुरा प्रभाव कम हो जाएगा। इस दिन स्नान के बाद पीपल के पेड़ में जल अर्पित करें और दीपक भी जलाएं। इससे आपको हर समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। इस दिन शं हृीं शं शनैश्चराय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें। इससे शनि का बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस दिन घर में शमी का पौधा लगाना बेहद शुभ माना जाता है। कहते हैं शमी की पूजा से शनि देव का भय नहीं रहता। ऐसे में मार्गशीर्ष अमावस्या पर किसी गमले में ये पौधा लगाएं और उसके चारों तरफ काले तिल डाल दीजिये और उसके आगे सरसों के तेल का दीपक जलाकर शनि देव के किसी भी मंत्र का 11 बार जप करें।
12 नवम्बर को काल भैरव जयंती
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी तिथि को काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए हर साल उस तिथि पर काल भैरव जयंती मनाई जाती है। इस बार काल भैरव जयंती पर 2 शुभ योग बन रहे हैं। काल भैरव की पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव की उत्पत्ति मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। इस वजह से हर साल इस तिथि को काल भैरव जयंती मनाई जाती है। काल भैरव की पूजा करने से सभी प्रकार की नकारात्मकता दूर हो जाती है। तंत्र और मंत्र की सिद्धि के लिए भी काल भैरव पूज्यनीय हैं। ग्रह दोषों से मुक्ति के लिए भी काल भैरव की पूजा होती है। काल भैरव की जयंती के दिन व्रत और पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है, रोग और दोष भी मिट जाते हैं। पंचांग के अनुसार, काल भैरव जयंती के लिए मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी तिथि का प्रारंभ 11 नवंबर को रात में 11 बजकर 8 मिनट से होगा। अष्टमी तिथि 12 नवंबर को रात 10 बजकर 58 मिनट तक मान्य रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर काल भैरव जयंती 12 नवंबर दिन बुधवार को मनाई जाएगी।
(पं. आरएस द्विवेदी-हिफी फीचर)

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