सातवें और आठवें ज्योतिर्लिंग का स्तुति मंत्र और कथा

सातवें ज्योर्तिलिंग काशी विश्वनाथ श्री विश्वेश्वर भगवान का मंत्र और उसका अर्थ
आइये सातवें ज्योर्तिलिंग श्री काशी विश्वनाथ श्री विश्वेश्वर के मंत्र और उसके अर्थ को समझते हैं। श्री विश्वेश्वर की स्तुति इसी मंत्र से की जाती है।
सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हृदयायवृन्दम।
वाराणसी नाथमनाथनाथं श्री विश्वनाथं शरणं प्रपद्ये।।
अर्थात जो भगवान शंकर आनन्द पूर्ण काशी क्षेत्र में आनन्दपूर्वक निवास करते हैं। जो परमानन्द के विधान यानी आदि कारण हैं, और जो पापों का नाश करने वाले हैं। मैं ऐसे अनाथों के नाथ काशीपति श्री विश्वनाथ की शरण में जाता हूँ। काशी नगरी की महिमा अपरम्पार है, यहाँ प्राण त्यागने से सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सातवें ज्योर्तिलिंग श्री विश्वेश्वर काशी विश्वनाथ की कथा
यह ज्योर्तिलिंग उत्तर भारत की प्रसिद्ध नगरी काशी में स्थित है। कहते हैं इस नगरी का प्रलय काल में में भी लोप नहीं होता है। प्रलय काल आने पर इस पवित्र नगरी को भगवान शंकर अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टिकाल आने पर पुनः धरती पर रख देते हैं। यही कारण है कि काशी को आदि स्थली भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर सृष्टि की कामना से तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। अगस्त्य मुनि ने भी इसी स्थान पर भगवान शिव को संतुष्ट किया था।
बनारस नगरी के बारे में कहा जाता है कि यहां प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा भगवान शंकर उसके कान में तारक मंत्र का पाठ करते हैं जिसके प्रभाव से पापी व्यक्ति भी शिव जी की कृपा से भव सागर की बाधाओं से पार हो जाते हैं। मत्स्य पुराण में इस नगरी को काशी के महत्व को बताते हुए कहा गया है कि ‘‘जप, ध्यान और ज्ञान रहित तथा दुःखों से पीड़ित मनुष्यों के लिए काशी ही एकमात्र परमगति है। श्री विश्वेश्वर के आनन्द कानन में दशाश्वमेघ, लोलार्क, बिन्दुमाधव, केशव और मणिकर्णिका ये पांच प्रमुख तीर्थ हैं जिनकी वजह से काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा जाता है।
काशी में उत्तर की तरफ ऊँकारखण्ड, दक्षिण में केदारखण्ड और बीच में विश्वेश्वर खण्ड हैं। पुराणों में इस ज्योर्तिलिंग के सम्बन्ध में जो कथा बताई गई है, उसके अनुसार भगवान शंकर और पार्वर्ती जी अपने विवाह के बाद कैलाश पर्वत पर रह रहे थे। लेकिन वहां पिता के घर में वैवाहिक जीवन व्यतीत करना पार्वती जी को अच्छा नहीं लगता था। तब उन्होंने शिव जी से कहा, ‘‘आप मुझे अपने घर ले चलिये। यहाँ रहना मुझे अच्छा नहीं लगता। सारी लड़कियाँ शादी के बाद अपने पति के घर जाती हैं और मुझे पिता के घर में रहना पड़ रहा है।’’ भगवान शिव ने उनकी इस बात को स्वीकार कर लिया और माता पार्वती को साथ लेकर अपनी पवित्र नगरी काशी में आ गये। और यहीं वे विश्वेश्वर ज्योर्तिलिंग के रूप में स्थापित हो गए।
मान्यता है कि प्रतिदिन नियम से श्री विश्वेश्वर के दर्शन-पूजन करने वाले अपने समस्त भक्तों के सुख-दुख का समस्त भार शंकर जी अपने ऊपर ले लेते हैं। ऐसा व्यक्ति परमधाम का अधिकारी बन जाता है। शास्त्रों में इस ज्योर्तिलिंग की महिमा बताते हुए बताया गया है कि भगवान शंकर पर आस्था रखने वाले व्यक्ति पर सदैव शिव जी की कृपा बनी रहती है। रोग, शोक, दुःख, दैन्य उसके पास भूल कर भी नहीं जाते।
आठवें ज्योर्तिलिंग त्र्यम्बकेश्वर के मंत्र और उसके अर्थ
आइये आठवें ज्योर्तिलिंग श्री त्र्यम्बकेश्वर के मंत्र और उसके अर्थ को समझते हैं। श्री त्र्यम्बकेश्वर भगवान की स्तुति इसी मंत्र से की जाती है।
सहयाद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरीतीर पवित्र देशे।
यद्दशीनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे।।
सहयाद्रिशीषे-सहयाद्रि पर्वत के शिखर पर
विमले-स्वच्छ, निर्मल या पवित्र।
वसन्तं-निवास करने वाले।
गोदावरीतीश्पवितदेशे-गोदावरी नदी के तट के पवित्र स्थान पर
त्र्यम्बकमीशमीडे-त्र्यम्बकेश्वर भगवारन की मैं वंदना करता हूँ।
आठवें ज्योर्तिलिंग श्री त्र्यम्बकेश्वर की कथा
यह ज्योर्तिलिंग महाराष्ट्र प्रान्त के नासिक से तीस कि.मी. पश्चिम में स्थित है।
शिव पुराण में इसके विषय में यह कथा दी गई है। एक समय की बात है कि गौतम ऋषि के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ किसी बात पर ऋषि पत्नी अहल्या से नाराज हो गईं। उन्होंने अपने पतियों को ़ऋषि गौतम का अपमान करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके लिए गणेश जी की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर गणेश भगवान प्रकट हुए और वर मांगने के लिए कहा। उन ब्राह्मणों ने गणेश भगवान से कहा ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकलवा दीजिये। उनकी इस बात से पहले तो गणेश जी सहमत नहीं हुए पर उनके अपने आग्रह पर अटल रहने के कारण गणेश जी को उनकी बात मानने के लिए विवश होना पड़ा। अपने भक्तों का मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ़ऋषि गौतम के खेत में जाकर चरने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ़ऋषि ने अत्यन्त विनम्रता से तिनके से उसको हांकने का प्रयास किया। इन तिनको का स्पर्श होते गाय अचानक गिर पड़ी और मृत हो गई। सब तरफ शोर शुरू हो गया। सारे ब्राह्मण गोहत्या के दोषी ऋषि गौतम की निन्दा करने लगे। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत दुःखी हुये और अचम्भित भी। सारे ब्राह्मणों ने गौतम ऋषि को आश्रम से दूर जाने के लिए विवश कर दिया। वे अपनी पत्नी अहल्या के साथ वहां से एक कोस दूर जाकर रहने लगे लेकिन ब्राह्मणों ने वहां भी उनका रहना मुश्किल कर दिया। उनका कहना था कि ऋषि गौतम क्योंकि मोहल्ला के आरोपों हैं अतः उन्हें वेद-पाठ और यज्ञादि कार्य करने का अधिकार नहीं रह गया।
गौतम ऋषि ने ब्राह्मणों से अनुरोध किया कि वे उन्हें प्रायश्चित करने का अवसर दें। तब उन्होंने ऋषि को कहा, ‘‘गौतम तुम अपने इस पाप को सबको बताते हुए तीन बार पृथ्वी की परिक्रमा करो, फिर लौटकर यहां आकर एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद 101 बार ब्रह्मर्षि की परिक्रमा करने के बाद तुम्हारी शुद्धि होगी। फिर वहां गंगा को लोकर उसमें स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा, अर्चना करो। फिर सौ नदियों के जल से स्नान करो तब तुम्हारा उद्धार होगा। ब्राह्मणों के अनुसार कहे अनुसार गौतम ऋषि सब कुछ करने के बाद पत्नी के साथ पूरी निष्ठा से शिव की आराधना करने लगे। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी प्रकट हुये और उन्हें साक्षात दर्शन दिये। गौतम ऋषि ने शिव जी से कहा ‘‘मुझे गोहत्या के पाप से मुक्त कर दीजिये।’’ तब शिव जी ने बताया कि ‘‘गोहत्या का पाप तुम्हंे छल से लगाया गया था मैं उन ब्राह्मणों को सबक सिखाना चाहता हूँ।’’ तब गौतम ऋषि ने उन्हें ऐसा करने से मना किया और कहा कि मैं उन ब्राह्मणों की वजह से ही आप तक पहुँचा हूँ अतः कोई दण्ड मत दीजिये। बस आप यहीं सदा के लिये निवास कर लीजिये। भगवान शिव ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब त्र्यम्बक के स्वरूप में भगवान शिव वहीं स्थित हो गये। और गौतम ऋषि द्वारा लाई गई गंगा गोदावरी नाम से वहीं प्रवाहित होने लगीं। कहते हैं कि यह ज्योर्तिलिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला होता है।
अर्थात यह श्लोक महाराष्ट्र के नासिक के पास स्थित त्र्यम्बकेश्वर भगवान की महिमा बताता है। जो भगवान शिव सहयाद्रि पर्वत के स्वच्छ शिखर पर गोदावरी नदी के तट पर निवास करते हैं, तथा जिनके दर्शन मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, उन त्र्यम्बकेश्वर भगवान की मैं स्तुति करता हूँ।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



