अध्यात्म

तृतीय और चतुर्थ ज्योर्तिलिंग की कथा और स्तुति मंत्र

तृतीय ज्योर्तिलिंग श्री महाकालेश्वर
आइये तृतीय ज्योर्तिलिंग श्री महाकालेश्वर के मंत्र और उसके अर्थ को समझते हैं-भगवान महाकाल उज्जैन की स्तुति इसी मंत्र से की जाती है।
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम!।।
अवन्तिकायां विहितावतारं- अवन्तिकापुरी उज्जैन में अवतार धारण करने वाले
मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्-संत जनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए।
अकालमृत्योः परिक्षणार्थं-तथा अकाल मृत्यु से रक्षा करने के लिए।
वन्दे महाकालमहासुरेशम्-मैं महाकाल नाम से विख्यात महादेव भगवान को प्रणाम करता हूँ, उनकी वंदना करता हूँ।
अर्थात जो भगवान शिव संतों और सज्जनों को मोक्ष देने के लिए अवन्तिकापुरी (उज्जैन) में प्रकट हुये हैं तथा जो भक्तों की अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं। मैं उन देवों के देव महाकाल (महाकालेश्वर) को प्रणाम करता हूँ। उनकी वंदना करता हूँ।
तृतीय ज्योर्तिलिंग श्री महाकालेश्वर
मध्य प्रदेश राज्य की प्राचीन ऐतिहासिक नगरी उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग पुण्यसलिता क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। इस नगर को प्राचीन समय में उज्जयिनी और अवन्तिकापुरी भी कहते हैं। यह भारत की परम पवित्र सप्तपुरियों में से एक है।
पुराणों में वर्णित इस ज्योर्तिंलिंग की कथा के अनुसार प्राचीन काल में उज्जयिनी में राजा चन्द्रसेन राज्य करते थे। वे परम शिवभक्त थे। एक दिन श्रीकर नामक एक पांच वर्षीय गोप बालक अपनी मां के साथ उधर से गुजर रहा था। राजा का शिवपूजन देखकर उसे बहुत अच्छा लगा और वह भी शिव पूजन करने के लिए उत्साहित हो गया। उसके पास पूजन सामग्री नहीं थी अतः लौटते समय वह रास्ते से एक पत्थर उठा लाया और शंकर के रूप में उसी पत्थर को स्थापित करके पूजा करने लगा। वह श्रद्धा में डूबकर भगवान शिव की आराधना कर रहा था, उसे खाने-पीने का भी होश नहीं था उसकी मां ने क्रोधित होकर उस पत्थर को दूर फेंक दिया। इससे बच्चा बहुत दुःखी हुआ और रोने लगा। बच्चे की अपने प्रति भक्ति और प्रेम देखकर आशुतोष भगवान शिव प्रसन्न हुए। बच्चे ने रोते हुए जैसे ही आँखंे खोलीं तो देखा कि वहाँ एक बहुत सुन्दर रत्न जड़ित विशाल स्वर्ण मन्दिर खड़ा हुआ है और उसी मन्दिर के भीतर एक अत्यन्त प्रकाशपूर्ण, भास्वर तेजस्वी ज्योर्तिलिंग खड़ा हुआ है। बच्चा प्रसन्नता से शिव भगवान की स्तुति करने लगा। जब उसकी माँ को पता चला तो उसने भी अपने बच्चे को गले से लगा लिया। राजा चन्द्रसेन ने सुना तो वे भी वहीं आ गये और बच्चे की भक्ति की सराहना करने लगे। धीरे-धीरे वहाँ भीड़ जुट गई। इतने में उस स्थान पर हनुमान जी प्रकट हो गए और उन्होंने बताया कि ‘‘भगवान शंकर अतिशीघ्र प्रसन्न होकर फल देने वाले देवता हैं। इस बच्चे की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे ऐसा वरदान दिया है, जो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी अपनी तपस्या से प्राप्त नहीं कर पाते।’’ उन्होंने कहा कि इस गोप बालक की आठवीं पीढ़ी में धर्मात्मा नंद गोप का जन्म होगा। द्वापर युग में भगवान विष्णु कृष्णावतार लेकर तरह-तरह की लीलाएं करेंगे।’’ हनुमान जी इतना कहकर अन्र्तध्यान हो गये। कालान्तर में इस जगह पर श्रीकर गोप और राजा चन्द्रसेन भगवान शिव की आराधना करते हुए शिवधाम चले गये।
महाकाल नाम के सम्बन्ध में कथा
इस ज्योर्तिलिंग का नाम महाकाल क्यों पड़ा। इस सम्बन्ध में भी एक कथा प्रचलित है। एक समय में अवन्तिकापुरी यानी उज्जैन में एक तेजस्वी ब्राह्मण रहते थे। एक दिन दूषण नामक एक अत्याचारी बहुत शक्तिशाली हो गया था। उसके अत्याचार से चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई थी। यह दूषण नाम का असुर तपस्वी ब्राह्मण की तपस्या में विघ्न डालने के प्रयास करता रहता था। ब्राह्मण को कष्ट में देखकर प्राणि मात्र का कल्याण करने वाले भगवान शंकर वहां प्रकट हो गये। उन्होंने एक ही हुंकार से उस रावण को भस्म कर दिया। भगवान वहां हुंकार सहित प्रकट हुए इसलिए उनका नाम महाकाल पड़ गया। महाभारत, शिवपुराण एवं स्कन्दपुराण में इस ज्योर्तिलिंग की महिमा का विस्तृत वर्णन है।
चतुर्थ ज्योर्तिलिंग का मंत्र और उसका अर्थ
आइये चतुर्थ ज्योर्तिलिंग श्री आंेकारेश्वर अमलेश्वर के मंत्र और उसके अर्थ को समझते हैं। भगवान आंेकारेश्वर अमलेश्वर की स्तुति इसी मंत्र से की जाती है।
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वस्न्तम् आंेकारमीशं शिवमेकमीडे।।
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे-जो कावेरी और नर्मदा नदी के संगम स्थल के पास।
सज्जनतारणाय-संत जनों के उद्धार के लिए।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोन्कारमीशं-मान्धातापुर में निवास करने वाले आंकारेश्वर भगवान।
शिवमेकमीडे-शिव का मैं वंदन अभिनन्दन करता हूँ उन्हें प्रणाम करता हूं।
अर्थात जो भगवान शिव ओंकारेश्वर सज्जन पुरुषों को संसार सागर से पार उतारने वाले हैं और जो नर्मदा और कावेरी के पवित्र संगम के पास मान्धाता पर्वत पर निवास करते हैं, मैं उन एकमात्र कल्याणकारी भगवान आंेकारेश्वर की स्तुति करता हूँ।
चतुर्थ ज्योर्तिलिंग श्रीओंकारेश्वर अमलेश्वर की कथा
यह ज्योर्तिलिंग मध्य प्रदेश में पवित्र नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। नर्मदा के दो धाराओं में विभक्त होने से यहाँ जो टापू बना उसका नाम मान्धाता पर्वत या शिवपुरी पड़ा। नदी की एक धारा उत्तर और दूसरी दक्षिण की ओर बहती है। दक्षिण वाली धारा ही मुख्य धारा मानी जाती है। इसी मान्धाता पर्वत पर श्री आंेकारेश्वर अमलेश्वर स्थित हैं। कहते हैं ‘‘प्राचीन काल में राजा मान्धाता ने यहाँ अपनी तपस्या से शिव भगवान को प्रसन्न किया था इसीलिए इसका नाम मान्धाता पर्वत पड़ा।
यहाँ ज्योर्तिलिंग के दो स्वरूप हैं। आंेकारेश्वर और अमलेश्वर। पृथक होते हुए भी दोनों की गणना एक ही रूप में की जाती है। इनके दो स्वरूप होने के सम्बन्ध में पुराणों में एक कथा है। एक बार विन्ध्य पर्वत ने भगवान शिव की पार्थिव अर्चना के साथ छः महीनों तक कठिन तपस्या की। उनकी इस उपासना से प्रसन्न होकर शंकर जी प्रकट हुए और विन्ध्य को मन वांछित फल दिये। इस मौके पर अन्य ऋषि गण और मुनि भी आये। उनकी प्रार्थना पर शिव जी ने आंेकारेश्वर नामक लिंग को दो भाग किए एक का नाम आंेकारेश्वर और दूसरे का अमलेश्वर पड़ा। इन दोनों की सत्ता और स्वरूप एक ही माना गया है।
इस ज्योर्तिलिंग मन्दिर के भीतर दो कोठरियों से होकर जाना पड़ता है। भीतर अंधेरा रहने के कारण यहाँ निरन्तर दिया जलता रहता है ताकि प्रकाश बना रहे। कहते हैं यह ज्योर्तिलिंग प्रकृति द्वारा निर्मित है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है। मान्धाता पर्वत को शिव का स्वरूप ही माना जाता है। इसी कारण इसे शिवपुरी भी कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ मेला लगता है। यहाँ शान्ति शयन की भव्य आरती होती है। शिवपुराण में इस ज्योर्तिलिंग की महिमा का विस्तृत वर्णन है। कहते हैं सभी को इस
क्षेत्र की यात्रा अवश्य करनी चाहिये इससे लौकिक, पारलौकिक दोनों फलों की प्राप्ति ओंकारेश्वर भगवान की कृपा से सहज हो जाती है और मोक्ष की प्राप्ति
होती है।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

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