नौवें और दसवें ज्योतिर्लिंग के स्तुति मंत्र और कथा

नौवें ज्योर्तिलिंग श्री वैद्यनाथ का स्तुति मंत्र और उसका अर्थ
आइये नौंवे ज्योर्तिलिंग श्री वैद्यनाथ के मंत्र और उसके अर्थ को समझते हैं। श्री वैद्यनाथ भगवान की स्तुति इसी मंत्र से की जाती है।
इस मंत्र को उत्तम स्वास्थ्य, रोग से मुक्ति, और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए बहुत शक्तिशाली माना जाता है।
ऊँ त्र्यम्बकम् यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।
ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे-हम तीनों नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं।
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्-जो हमारे जीवन को सुगन्धित, पुष्ट और संवर्धित करने वाले हैं।
ऊर्वारुकमिव बन्धनान्-जैसे ककड़ी या खरबूजा अपनी बेल के बन्धन से पक कर स्वतः अलग हो जाता है।
मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात-वैसे ही हे प्रभु हमें भी मृत्यु और संसार के बन्धनों से मुक्त करो।
नवें ज्योर्तिलिंग श्री वैद्यनाथ की कथा
श्री वैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग झारखण्ड राज्य के देवधर में स्थित है यह मनोकामना लिंग के रूप में प्रसिद्ध है। शास्त्र और लोक देानेां में इसकी बड़ी मान्यता है। इस ज्योर्तिलिंग की स्थापना के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है।
एक बार महाप्रतापी रावण ने हिमालय पर जाकर भगवान शिव के दर्शन प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। रावण ने तपस्या के दौरान एक-एक करके अपने सिर काटकर अपने स्व निर्मित शिवलिंग पर चढ़ाने प्रारम्भ किये। इस तरह उसने नौ सिर चढ़ा दिये जब दसवां सिर काटने जा रहा था तभी उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव साक्षात प्रकट हुये और रावण से वर मांगने के लिए कहा और उसको दसवाँ सिर काटने से उसे रोक दिया। रावण ने अति विनम्रता पूर्वक शंकर भगवान से वहाँ स्थित शिवलिंग को अपनी राजधानी लंका में ले जाने का अनुरोध किया। भगवान शिव ने रावण को यह वरदान तो दे दिया पर उन्होंने एक शर्त भी रख दी कि ‘‘इसे तुम ले जा सकते हो पर इसे कहीं भी रास्ते में जमीन में मत रखना अन्यथा यह वहीं अचल स्थिर हो जायेगा, और फिर तुम इसे कभी नहीं हिला सकोगे। रावण ने बात स्वीकार कर ली और शिवलिंग को लेकर लंका की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे निवृत्त होने के लिए रुकना पड़ा तब उसने एक राहगीर को शिवलिंग को पकड़े रहने के लिये कहा लेकिन शिवलिंग का भार वह सहन नहीं कर सका और उसने उसे वहीं ज़मीन पर रख दिया। जब रावण लौटा तब उसने देखा कि वह जमीन में रखा है उसने बहुत प्रयास किया पर बहुत प्रयत्न करने के बाद भी वह उसे हिला भी नहीं सका। अन्त में निरूपाय होकर उस पवित्र शिवलिंग पर अपने अंगूठे का निशान बनाया और उसे वहीं छोड़कर लंका लौट आया। उसके बाद ब्रह्मा विष्णु आदि देवताओं ने वहाँ आकर उस शिवलिंग का पूजन किया, और वहीं उस शिवलिंग की प्रतिष्ठा करके वे लोग अपने-अपने धाम लौट गये। यही ज्योर्तिलिंग श्री वैद्यनाथ के नाम से जाना जाता है।
कहते हैं यह ज्योर्तिलिंग अनन्त फलों को देने वाला है। इस पर अँगूठे के आकार का निशान है। कहा जाता है कि यह वही निशान था जो रावण ने अपने अँगूठे से बनाया था। यहाँ दूर-दूर से तीर्थों का जल लाकर चढ़ाने का विधान है। रोग मुक्ति के लिए भी इस ज्योर्तिलिंग की महिमा प्रसिद्ध है।
पुराणों में कहा गया है कि श्री वैद्यनाथ के दर्शन से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। शिव की कृपा सदैव बनी रहती है तथा उसे दैहिक, दैविक और भौतिक किसी भी प्रकार के कष्ट उसके पास भूलकर भी नहीं आते। कहते हैं श्री वैद्यनाथ की कृपा प्राप्त व्यक्ति का अन्तःकरण निर्मल हो जाता है वह सभी प्राणियों के कल्याण में लगा रहता है तथा ईष्र्या, द्वेष, वैर, क्रोध और घृणा से वह सदा के लिए मुक्त हो जाता है। ये भगवान वैद्यनाथ अमोद्य फल देने वाले हैं।
दसवें ज्योर्तिलिंग रामेश्वर का श्लोक और उसका अर्थ
आइये नागेश्वर ज्योर्तिलिंग के श्लोक और उसके अर्थ के बारे में जानते हैं। इसी श्लोक से इस ज्योर्तिलिंग की स्तुति की जाती है।
याम्ये सदंगे नगरेऽतिरम्ये
विभूषितांगं विविधैश्च भोगैः।
सदभक्ति मुक्ति प्रदमीशमेकं
श्री नागनाथं शरण प्रपधे।।
अर्थात जो भगवान शिव दक्षिण दिशा में स्थित सदंग नामक नगर में विभिन्न प्रकार के भोगों से और आभूषणों से सुशोभित हैं, जो एकमात्र सच्ची भक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाले हैं, मैं उन अद्वितीय श्री नागनाथ भगवान की शरण में जाता हूँ।
दसवें ज्योर्तिलिंग श्री नागेश्वर की कथा
भगवान शिव का यह ज्योर्तिलिंग गुजरात के द्वारकापुरी के पास दारूकवन में स्थित है। इसकी पौराणिक कथा एक भक्त की सच्ची निष्ठा और राक्षस के अन्त से जुड़ी हुई है। पुराणों में दी गई कथा के अनुसार सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह शिव का अनन्य भक्त था। वह निरन्तर शिवार्चन में ही तल्लीन रहता था जिसे देखर दारूक नामक राक्षस बहुत क्रोधित हो जाता था और पूजा में व्यवधान डालने की कोशिश करता रहता था।
एक बार सुप्रिय वैश्य नाव से कहीं जा रहा था तभी दारूक राक्षस ने उस पर आक्रमण करके उसके सहयोगियों के साथ उसको बंदी बना लिया लेकिन सुप्रिय ने भगवान शिव का पूजन नहीं रोका वह वहां भी पूजा करता और अन्य बन्दियों को भी पे्ररित करता रहता। उसको एक दिन ध्यान में देखकर राक्षस क्रोधित हो गया और उसने सुप्रिय वैश्य पर आक्रमण कर दिया। फिर भी सुप्रिय वैश्य की समाधि भंग नहीं हुई। अब तो वह दारूक राक्षस अत्यधिक आक्रामक हो गया और उसने तत्काल सुप्रिय वैश्य और सभी बन्दी जो पूजा अर्चना में व्यस्त थे उनको मार डालने का आदेश अपने अनुचरों को दिया। सुप्रिय दारूक राक्षस के इस आदेश से ज़रा भी विचलित नहीं हुआ। उसे पूर्ण विश्वास था कि मेरे आराध्य शिव जरूर आयेंगे। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर शिव जी एक दिन प्रकाश के साथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुये। उन्होंने सुप्रिय को साक्षात दर्शन भी दिये तथा उसे अपना पाशुपत अस्त्र भी प्रदान किया। उसी अस्त्र से दारूक तथा उसके सहायकों का वध करके सुप्रिय शिवधाम को चला गया। भगवान शिव के आदेशानुसार ही इस ज्योर्तिलिंग का नाम नागेश्वर पड़ा।
इस पवित्र ज्योर्तिलिंग के दर्शन की शास्त्रों में बड़ी महिमा बताई गई है। कहते हैं जो श्रद्धापूर्वक इसकी
उत्पत्ति और माहात्म्य की कथा सुनेगा वह सारे पापों से छुटकारा पाकर समस्त सुखों का भोग करता हुआ अन्त में भगवान शिव के परम धाम को प्राप्त करता है।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



