लेखक की कलम

धामी: लोकल से ग्लोबल की ओर

नये वर्ष में लोग धार्मिक स्थलों के दर्शन करना शुभ मानते हैं। देव प्रदेश उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लोकल से ग्लोबल का फार्मूला अपनाया है। धामी कहते हैं तीर्थाटन और पर्यटन की दृष्टि से लोग यहां आएं, इसके लिए राज्य सरकार द्वारा जरूरी कदम उठाये जा रहे हैं। उत्तर काशी के मुखवा स्थित मुखी मठ मंे माता गंगा का शीतकालीन प्रवास होता है। इसी तरह खरसाली मंे यमुना मंदिर मंे माता यमुना शीतकालीन प्रवास करती हैं। रुद्र प्रयाग के ऊखी मठ में स्थित ओंकारेश्वर मंदिर मंे बाबा केदारनाथ का शीतकालीन प्रवास होता है तो चमोली के पांडुकेश्वर स्थित योगा ध्यान मंदिर मंे श्री बदरीनाथ जी शीतकालीन प्रवास करते हैं। पर्यटकों को होम स्टे का अनंद उठाने का अवसर धामी सरकार दे रही है। पं. दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास योजना के तहत राज्य में अब तक 5703 से ज्यादा होम स्टे पंजीकृत हो चुके हैं। इससे ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा। योजना का मकसद देशी-विदेशी पर्यटकों को राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में आकर्षित करते हुए उन्हंे उत्तराखण्ड की समृद्ध संस्कृति और खान-पान से परिचित कराना है। राज्य की सबसे ज्यादा चर्चित नगरी हरद्वार मंे ही दर्शनीय स्थलों की कमी नहीं
है। उत्तराखण्ड का पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिकता का अद्भुत सामंजस्य है।
पुष्कर सिंह धामी सरकार ने अपील की है कि अगर आप नए साल पर हरिद्वार आ रहे हैं और 2026 को सुखद बनाना चाहते हैं, तो यहां धार्मिक अनुष्ठान और धार्मिक कार्य करना बेहद सुगम होगा। हरिद्वार यानी भगवान का द्वार। यह एक प्रमुख धार्मिक नगरी है, जहां देश के कोने-कोने से श्रद्धालु और पर्यटक गंगा स्नान व धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए पहुंचते हैं। वेदों, पुराणों और शास्त्रों में हरिद्वार में किए गए धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है। गंगा किनारे बसा यह पवित्र शहर पितृ दोष की शांति और ग्रहों की शांति के लिए किए गए उपायों का संपूर्ण फल प्रदान करता है। पहाड़ों से होकर मां गंगा समतल क्षेत्र हरिद्वार में सबसे पहले प्रवेश करती हैं। आदि-अनादि काल में राजा भागीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा, उनके पूर्वजों का उद्धार करने के लिए स्वर्गलोक से धरती पर अवतरित हुई थीं। नए साल पर पितरों-पूर्वजों के उद्धार और धार्मिक अनुष्ठान के लिए हर की पौड़ी का विशेष महत्व बताया गया है। विश्व विख्यात हर की पौड़ी पर साल भर करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु धार्मिक कार्य करने के लिए पहुंचते हैं। तीर्थ नगरी हरिद्वार में शिवालिक की पहाड़ियों पर स्थित देवी मां का एक चमत्कारी स्थल है। नए साल पर यदि मनसा देवी मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना और देवी मनसा के दर्शन किए जाएं, तो सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और साल भर आरोग्यता बनी रहती है। मनसा देवी एक शक्तिपीठ हैं, जिनका महत्व स्कंद पुराण के केदार खंड में बताया गया है। धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ यहां की यात्रा रोमांच से भी भरपूर है। 1 जनवरी को देवी मां के दर्शन करने और यहां मन्नत का धागा बांधने का विशेष महत्व बताया गया है। नील पर्वत पर स्थित चंडी देवी मंदिर प्रकृति की गोद में बसा एक अद्भुत और अलौकिक स्थल है, जहां साल के पहले दिन दर्शन करने से धार्मिक लाभ के साथ यात्रा भी यादगार बन जाती है। मंदिर तक पहुंचने के लिए कई मार्ग उपलब्ध हैं। आप चाहें तो अपनी यात्रा को खास बनाने के लिए पैदल मार्ग चुन सकते हैं, वहीं 1 जनवरी 2026 को रोपवे के जरिए मंदिर पहुंचकर इस अनुभव को और भी यादगार बना सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंडी देवी मंदिर में साल के पहले दिन पूजा विशेष फलदायी होती है। हरिद्वार में जहां हर की पौड़ी पर धार्मिक अनुष्ठान का विशेष महत्व बताया गया है, वहीं उपनगरी कनखल में भोलेनाथ की ससुराल में स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन और जलाभिषेक करने से साल भर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। साल 2026 के पहले दिन पौष शुक्ल पक्ष का प्रदोष व्रत किया जाएगा। ऐसे में यदि आप हरिद्वार आ रहे हैं, तो भगवान शिव की ससुराल कनखल में भोलेनाथ का जलाभिषेक मात्र करने से ही साल 2026 आपके लिए बेहद सुखद और अनुकूल रहेगा।
उत्तराखंड राज्य अपनी अलग पर्वतीय संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां के परिवेश और खानपान में भी काफी भिन्नता पाई जाती है। यहां उगने वाले जैविक उत्पाद सेहत के लिए काफी फायदेमंद हैं, जिनका उपयोग करके यहां के लोग निरोगी रहते हुए लंबी उम्र तक जीते हैं। उत्तराखंड के मोटे अनाजों को सुपर फूड कहा जाता है। पहाड़ों में संस्कृति के साथ-साथ यहां के पकवानों में भी भिन्नता पाई जाती है। यहां के लोग सदियों से इन पकवानों का दैनिक जीवन में उपयोग कर स्वस्थ जीवन जीते आए हैं। भट्ट की चुड़कानी भी पहाड़ के पौष्टिक और स्वादिष्ट व्यंजनों में से एक है। पहाड़ में भट्ट की दाल काफी मात्रा में होती है। काले भट्ट की दाल में प्रोटीन भी ज्यादा होता है। यह पहाड़ में पसंद किया जाने वाला सबसे स्वादिष्ट व्यंजन है। भट्ट की दाल को उबाल कर आटे के घोल के साथ पकाया जाता है। भटिया यानी डुबुके भी भट की दाल से बनाया जाता है जिसे यहां अनेक रोगों के उपचार में भी इस्तेमाल किया जाता है। काले-सफेद भट की दाल को भिगाने के बाद पीसकर चावल के साथ लोहे की कढ़ाई में काफी देर उबालने के बाद ये पौष्टिक व्यंजन तैयार किया जाता है जो पहाड़ के लोगों का मुख्य भोजन भी है जिससे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। मडुवे का आटा या मडुवे की फसल उत्तराखंड में परंपरागत रूप से पैदा की जाने वाली गर्म तासीर वाली फसल है। मडुवे में प्रोटीन, फैट, खनिज आदि पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। वैसे तो मडुवे का आटा शरीर को कई फायदे और बीमारियों से दूर रखता है, लेकिन, ठंड के मौसम में इसका महत्व और बढ़ जाता है। मडुवे के आटे से न केवल रोटी बनाई जाती है बल्कि, हलवा, बिस्किट, केक आदि कई खाने की चीजें अब तैयार किए जा रहे हैं। आटे के साथ साथ नट्स, बीन्स और सब्जियां जैसे पत्ता गोभी, आलू जैसे फाइबर में समृद्ध खाद्य पदार्थ कब्ज में मदद कर सकते हैं। फाइबर से भरपूर आहार न सिर्फ शरीर की अशुद्धियों को निकालता है, बल्कि कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। भांग की चटनी की बात ही कुछ और है। यह उत्तराखंड की प्रसिद्ध चटनी है। चटनी और पहाड़ का रिश्ता काफी पुराना है। यह भांग के बीज, जीरा, लहसुन के पत्तों, इमली, और नमक से तैयार की जाती है। ये चटनी पहाड़ी व्यंजनों के स्वाद को बढ़ाती है। वहीं गहत की दाल के परांठे उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध पकवान है। यह परांठे गहत की दाल को गेहूं या मडुए के आटे के मिश्रण में भरकर तैयार किया जाता हैं। साथ ही गहत की दाल का फाणु भी बनाया जाता है। फाणु भात उत्तराखंड में बहुत ज्यादा खाया जाता है।बाड़ी भी उत्तराखंड के उन व्यजनों में से एक है जो काफी मशहूर है। बाड़ी को मंडुए के आटे से बनाया जाता है, बाड़ी में भरपूर मात्रा में पोषक तत्त्व होते हैं। मंडुए को पानी में घी के साथ पकाकर इसे बनाया जाता है।
चेन्सू भी एक प्रोटीन युक्त लाजवाब व्यंजन है, जो कि काली दाल (उड़द की दाल) से बनाया जाता है, और
यह हर पहाड़ी के लिए एक लोकप्रिय भोजन विकल्प है। वहीं थिन्चैड़ी
भी स्थानीय लोगों के खान-पान में शामिल है ये सभी चीजें उत्तराखंड मंे शीतकालीन भ्रमण का आनंद दोगुना कर देती हैं।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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