कांगे्रस को 2025 ने सिखाया सबक

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को वर्ष 2025 ने सबक सिखाया है लेकिन उसका नेतृत्व कितना सीख पाता, यह 2026 में दिखाई पड़ेगा।
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अनुशासन की तारीफ करके कांगे्रस की तरफ जो इशारा किया, उसको शशि थरूर और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिला है। वर्ष 2025 मंे अंतिम महीने तो कां्रगेस को विशेष रूप से याद रखने पड़ेगे। बिहार विधानसभा चुनाव मंे कांग्रेस को सिर्फ 6 विधायक मिल पाए। इससे पहले दिल्ली में कांगे्रस का खाता तक नहीं खुला जबकि राजनीतिक समीक्षा में यह बताया गया कि अगर कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया होता तो वहां 27 साल बाद भी भाजपा की सरकार नहीं बन पाती। इसके बाद भी कांग्रेस नहीं समझ सकी और महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश व गोवा के स्थानीय चुनाव मंे भी उसके प्रत्याशी धराशायी हो गये। केरल मंे तो भाजपा का कोई आधार ही नहीं था, जबकि कंाग्रेस वहां कई बार सरकार बना चुकी है। इसके बावजूद तिरुवनंतपुरम में भाजपा का मेयर निर्वाचित हो गया। अगले साल चार बड़े राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। कांग्रेस अपनी गलतियों से सीखे तो बेहतर होगा। कांग्रेस के लिए मनरेगा भी एक मुद्दा है क्योंकि उससे महात्मा गांधी का नाम हटा दिया गया है।
साल 2025 खत्म होने वाला है। ये साल कुछ राजनीतिक पार्टियों के लिए बेहद खास रहा। कुछ राजनीतिक पार्टियों के लिए किसी सदमे से भी कम नहीं रहा। यदि बात की जाए 2025 के दो राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव की तो कांग्रेस को खासा नुकसान हुआ है। दो प्रमुख विधानसभा चुनाव यानी दिल्ली और बिहार में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। इन चुनावों में कांग्रेस कुल मिलाकर मात्र 6 सीटें ही जीत सकीं, जो पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। दिल्ली में तो कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला, जबकि बिहार में महज 6 सीटों पर ही सफलता मिली है। कुल 70 विधानसभा सीटों वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव फरवरी 2025 में हुए थे। इसमें भाजपा की बड़ी जीत मिली थी। बीजेपी ने 48 सीटों पर जीत दर्ज की। दिल्ली में 27 साल बाद बीजेपी की सत्ता में वापसी हुई। आम आदमी पार्टी (आप) सिर्फ 22 सीटें ही जीत सकी। दिल्ली की सत्ता आम आदमी पार्टी के हाथ से चली गई। दिल्ली में कांग्रेस लगातार तीसरी बार विधानसभा में अपना खाता नहीं खोल सकी। पार्टी ने सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई। अरविंद केजरीवाल जैसे बड़े नेता भी हार गए, लेकिन कांग्रेस के लिए यह चुनाव पूरी तरह निराशाजनक रहा। इसके बाद 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा मंे चुनाव नवंबर 2025 में हुए थे। बिहार चुनाव में एनडीए ने 202 सीटें जीतीं। महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा। बिहार में कांग्रेस सिर्फ 6 सीटें ही जीत सकी। बिहार में कांग्रेस ने महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। कुल मिलाकर 2025 में कांग्रेस की सीटों की बात करें तो दिल्ली और बिहार दोनों राज्यों की 313 विधानसभा सीटों (70 दिल्ली ़ 243 बिहार) में कांग्रेस ने कुल 6 सीटें जीतीं। दो राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का ये आंकड़ा पार्टी के गिरते ग्राफ को दर्शाता है।
अब साल के अंतमें कांग्रेस के सीनियर नेता दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक से पहले बीजेपी और आरएसएस की संगठन शक्ति की तारीफ कर पार्टी के लिए असहज हालात पैदा कर दिया। हालांकि बाद में उन्होंने सफाई भी दी और कहा कि वे पीएम नरेंद्र मोदी और आरएसएस की नीतियों के धुर विरोधी हैं। लेकिन तब तक पार्टी के अंदरूनी हालात काफी असहज हो चुके थे। सूत्रों के मुताबिक रविवार को पार्टी की स्थापना दिवस के मौके पर कार्यक्रम के दौरान जब राहुल गांधी की मुलाकात दिग्विजय सिंह से हुई तो उन्होंने मजाकिया लहजे में दिग्विजय सिंह को कहा-श्आप अपना काम कर गए। आप बदमाशी कर गए। उधर, तेलंगाना के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के सीनियर नेता रेवंत रेड्डी की भी इस मामले में एंट्री हुई। उन्होंने दिग्विजय सिंह का नाम तो नहीं लिया लेकिन इशारों में पलटवार किया। रेवंत रेड्डी ने कहा कि कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 1991 में पीवी नरसिम्हा राव और 2004 और 2009 में डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर बहुत अच्छा फैसला लिया था। रेड्डी के इस बयान को दिग्विजय सिंह की पोस्ट से जोड़कर देखा जा रहा है।
दिग्विजय सिंह ने कार्य समिति की बैठक के दौरान भी पार्टी संगठन में विक्रेंद्रीकरण की पैरवी की। हालांकि दिग्विजय को कुछ सीनियर नेताओं ने टोका और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी टोकते हुए यह कहा कि अभी और नेताओं को बोलना है। कार्य समिति की बैठक शुरू होने से पहले दिग्विजय सिंह ने ‘एक्स’ पर एक पुरानी तस्वीर शेयर की जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगे की तरफ नीचे बैठे हुए हैं तथा उनके पीछे बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी कुर्सी पर बैठे नजर आ रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने पोस्ट किया, ‘‘कोरा वेबसाइट पर मुझे यह चित्र मिला। बहुत ही प्रभावशाली है। किस प्रकार आरएसएस का जमीनी स्वयंसेवक व जनसंघ भाजपा का कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में फर्श पर बैठकर प्रदेश का मुख्यमंत्री व देश का प्रधानमंत्री बना। यह संगठन की शक्ति है। जय सियाराम।’’ उनके इस पोस्ट के बाद विवाद खड़ा हो गया।
दिग्विजय सिंह ने सफाई दी। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने संगठन की तारीफ की है। मैं आरएसएस और मोदी जी का घोर विरोधी था, घोर विरोधी हूं और रहूंगा।’’ यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने कार्य समिति की बैठक में विकेंद्रीकरण की पैरवी की है, सिंह ने कहा, ‘‘मुझे जो कहना था, वो मैंने बैठक के दौरान कह दिया।’’ उन्होंने यह भी कहा, ‘‘क्या संगठन को मजबूत करना या उसकी तारीफ करना, बुरी बात है।’’ मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘अगर आप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर मेरे कार्यकाल को देखेंगे तो पाएंगे कि मैंने विकेंद्रीकृत तरीके से काम किया। यह मेरा विचार है।’’ कार्य समिति की बैठक से पहले और बैठक के दौरान दिग्विजय का यह रुख कांग्रेस नेताओं को असहज करने वाला था।
सीडब्ल्यूसी की बैठक में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जीरामजी योजना पर कहा, मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं थी। मनरेगा अधिकार आधारित अवधारणा थी। मनरेगा से देश में करोड़ों लोगों को एक न्यूनतम मजदूरी मिलती थी। मनरेगा पंचायती राज में सीधा राजनीतिक हिस्सेदारी और फाइनेंस सपोर्ट का साधन था। मोदी सरकार अधिकारों के विचार और संघीय ढांचे पर हमला कर रही है। ये प्रत्यक्ष अधिकार आधार की जो अवधारणा है उस पर आक्रमण है, राज्यों की जो संघीय संरचना है उस पर भी ये आक्रमण है। राज्यों से केंद्र पैसे छीन रहा है। यह सत्ता का केन्द्रीकरण और फाइनेंस का केन्द्रीकरण है। इससे देश को नुकसान होगा, गरीब जनता को नुकसान होगा।
राहुल गांधी ने कहा, मुझे बताया गया है कि ये फैसला सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से कैबिनेट से बिना पूछे लिया गया है। प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल से पूछे बिना, मामले का
अध्ययन किए बिना ही मनेरगा को अकेले ही समाप्त कर दिया। यह राज्यों और गरीब लोगों पर प्रधानमंत्री द्वारा अकेले किया गया एक विनाशकारी हमला है, ठीक उसी तरह जैसे नोटबंदी में हुआ था। इसी तरह खरगे ने भी मनरेगा का नाम बदलने पर आंदोलन की चेतावनी दी है। सवाल यह है कि बिखरी कांग्रेस 2026 में कोई आंदोलन सफलतापूर्वक कैसे चलाएगी।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



