ग्रामीण रोजगार गारंटी का नया अध्याय

नरेन्द्र मोदी की सरकार का तीसरा कार्यकाल महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) का नया अध्याय शुरू करने जा रहा है। इसका उद्देश्य है कि इस योजना में सुधार, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भर भारत की दिशा तय हो। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने में मनरेगा (पूर्व में नरेगा) की भूमिका ऐतिहासिक रही है। वर्ष 2005 में शुरू हुई इस योजना ने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को कठिन समय में सहारा दिया लेकिन किसी भी बड़ी सामाजिक योजना की तरह, समय के साथ इसके ढांचे में सुधार और बदलाव आवश्यक हो जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा लाया गया नया कानून इसी सुधारवादी सोच का प्रतिबिंब है, जिसे केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि प्रशासनिक और दीर्घकालिक दृष्टि से देखे जाने की जरूरत है।
नई व्यवस्था के तहत रोजगार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करना यह दर्शाता है कि सरकार ग्रामीण मजदूरों की जरूरतों को समझती है और उन्हें अधिक अवसर देना चाहती है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि 15 दिनों के भीतर काम नहीं मिलता, तो बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। यानी रोजगार का अधिकार समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसे और व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया है। वित्तीय संरचना में बदलाव कर जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच खर्च का अनुपात 90 अनुपात 10 से बदलकर 60 अनुपात 40 किया गया है, को विपक्ष ‘कटौती’ के रूप में पेश कर रहा है लेकिन सच यह है कि इससे राज्यों की भागीदारी और जवाबदेही बढ़ेगी। जब राज्य अधिक वित्तीय योगदान देंगे, तो वे योजना के क्रियान्वयन में भी अधिक गंभीर और सक्रिय होंगे।
यह सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप है, जहाँ केंद्र दिशा देता है और राज्य जमीन पर बेहतर अमल सुनिश्चित करते हैं। सरकार का यह भी तर्क है कि योजना को अधिक पारदर्शी, तकनीक-सक्षम और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाया जाए। बीते वर्षों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, आधार-आधारित भुगतान और डिजिटल मस्टर रोल जैसे कदमों ने फर्जी जॉब कार्ड और लीकेज पर काफी हद तक रोक लगाई है। नई कानूनी संरचना इन सुधारों को और मजबूत करती है। आलोचक यह कहते हैं कि योजना को ‘डिस्क्रेशनरी’ बनाया जा रहा है, लेकिन यह तर्क अधूरा है। वास्तविकता यह है कि देश के अलग-अलग राज्यों की प्रशासनिक क्षमता अलग है। आर्थिक सर्वेक्षण ने भी संकेत दिया है कि ज्यादा रोजगार सृजन अक्सर उन राज्यों में हुआ है जहाँ प्रशासनिक दक्षता बेहतर है, न कि केवल वहाँ जहाँ गरीबी अधिक है। ऐसे में केंद्र का नियामक रोल यह सुनिश्चित करता है कि संसाधनों का उपयोग प्रभावी और न्यायसंगत हो।
प्रधानमंत्री मोदी की सोच हमेशा से “गरीबी हटाओ” के नारे से आगे बढ़कर “सशक्तिकरण” पर रही है। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों को स्थायी समाधान नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार का फोकस साथ-साथ बुनियादी ढांचे, ग्रामीण आवास, सड़क, बिजली, जल जीवन मिशन और कौशल विकास पर है, ताकि ग्रामीण भारत को केवल राहत नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता मिले। आज जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, तो यह जरूरी है कि सामाजिक योजनाएँ भी बदलती जरूरतों के अनुरूप आधुनिक हों। मनरेगा का नया स्वरूप उसी दिशा में एक संतुलित कदम है जो सहायता भी देता है, जवाबदेही भी तय करता है और विकास की दीर्घकालिक राह भी प्रशस्त करता है।
मनरेगा की शुरुआत साल 2005 में हुई थी उस समय इसे नरेगा कहा जाता था। बाद में साल 2009 में इसका नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) किया गया। इस योजना के तहत ग्रामीण इलाकों के हर परिवार को हर साल कम से कम 100 दिन का मजदूरी वाला काम देने की गारंटी दी जाती है। अगर परिवार का कोई भी वयस्क बिना हुनर वाला काम करने को तैयार हो।
इस प्रकार मनरेगा गांवों में रहने वाले गरीब परिवारों के लिए कमाई का बड़ा सहारा रही है। खासकर तब जब गांवों में काम की कमी होती है। यह योजना पंचायतों के जरिए लागू होती है और कई सालों से ग्रामीण इलाकों में रोजगार का अहम जरिया बनी हुई है। इस बिल के लागू होने से राज्यों को फंड वितरण में महत्वपूर्ण लाभ मिलेगा और ग्रामीण घरों के लिए रोजगार की गारंटी भी बढ़ाई जाएगी। एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार बिल की नई वित्तीय संरचना से राज्यों को कुल मिलाकर लगभग 17,000 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ होने की संभावना है।
एसबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि नए वीबी-जीरामजी बिल के तहत केंद्र और राज्यों के बीच फंडिंग अनुपात 60ः40 निर्धारित किया गया है। हालांकि आपको बता दें, कि कुछ आलोचनाओं के अनुसार यह राज्यों पर वित्तीय दबाव डाल सकता है, लेकिन एसबीआई ने स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव से राज्यों को पिछले सात वर्षों के औसत आवंटन की तुलना में करीब 17,000 करोड़ रुपये का फायदा मिलेगा। इसमें केवल दो राज्यों ने मामूली नुकसान दर्ज किया, जो लगभग मामूली माना गया। बता दें कि सबसे ज्यादा लाभ पाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र रहे, जबकि बिहार, छत्तीसगढ़ और गुजरात भी प्रमुख लाभार्थी बने। वीबी-जीरामजी बिल के तहत ग्रामीण परिवारों को प्रति वर्ष 125 दिन का रोजगार सुनिश्चित किया जाएगा, जो पहले 100 दिन था। यह रोजगार उन वयस्क सदस्यों को मिलेगा जो अस्किल्ड मैन्युअल कार्य करने के इच्छुक हैं। इस बदलाव से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सुरक्षा और आजीविका के अवसर बढ़ेंगे। बिल का उद्देश्य रोजगार वितरण में समानता और दक्षता दोनों बनाए रखना है। रिपोर्ट के अनुसार राज्यों को अपनी 40 प्रतिशत हिस्सेदारी का प्रभावी उपयोग करके अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने का मौका मिलेगा। नए मानदंडों के तहत फंड आवंटन अधिक पारदर्शी और संतुलित होगा, जिससे विकसित और पिछड़े दोनों प्रकार के राज्य समान रूप से लाभान्वित होंगे। एसबीआई ने कहा कि सही तरीके से आकलनों की जांच करने पर यह साफ दिखता है कि नया फंडिंग सिस्टम राज्यों के लिए फायदेमंद है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



