भारत को व्यापार में नए संतुलन की तलाश

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत इस महीने पूरी होने की उम्मीद जताई जा रही है। भारत के वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, दोनों पक्ष “काफी करीब” हैं और कोशिश है कि नई दिल्ली में होने वाले भारत-ईयू शिखर सम्मेलन से पहले ही समझौते को अंतिम रूप दे दिया जाए। यदि ऐसा होता है, तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होगा- ऐसे समय में जब अमेरिका की टैरिफ नीतियों के दबाव के बीच भारत नए बाजारों की तलाश कर रहा है।
वर्ष 2024 में भारत-ईयू द्विपक्षीय व्यापार 120 अरब यूरो तक पहुँच गया, जिससे यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया। यह समझौता दोनों पक्षों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है- चीन और रूस पर निर्भरता घटाने और आपूर्ति ़ऋंखलाओं को विविध बनाने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि, राह पूरी तरह आसान नहीं है। बातचीत का सबसे बड़ा अड़ंगा कारों और स्टील को लेकर है। यूरोपीय संघ चाहता है कि भारत, यूरोप से आने वाली कारों पर लगने वाले 100 प्रतिशत से अधिक के आयात शुल्क में भारी कटौती करे। वहीं भारत की चिंता यह है कि ईयू का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ और सुरक्षा उपाय उसके स्टील निर्यात को सीमित कर देंगे। इससे भारतीय स्टील उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। यदि समझौता हो जाता है, तो भारत का विशाल और अब तक काफी हद तक संरक्षित उपभोक्ता बाजार, जिसकी आबादी 1.4 अरब से अधिक है- यूरोपीय वस्तुओं के लिए खुलेगा। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार प्रवाह में भी बदलाव देखने को मिल सकता है, खासकर ऐसे दौर में जब संरक्षणवाद बढ़ रहा है और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता फिलहाल ठहरी हुई है। कृषि क्षेत्र इस समझौते से बाहर रखा गया है। भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कृषि और डेयरी सेक्टर को किसी भी व्यापार समझौते में नहीं खोला जाएगा, क्योंकि इससे करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, ईयू कारों, चिकित्सा उपकरणों, वाइन, स्पिरिट्स और मांस पर टैरिफ में बड़ी कटौती और बौद्धिक संपदा अधिकारों के कड़े प्रावधान चाहता है। भारत श्रम-प्रधान वस्तुओं के लिए शुल्क-मुक्त पहुँच और अपने ऑटोमोबाइल व इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की तेज मान्यता की मांग कर रहा है। सामानों के अलावा, यह समझौता सेवाओं, निवेश, डिजिटल व्यापार, बौद्धिक संपदा और हरित तकनीकों में सहयोग को भी विस्तार देने की संभावना रखता है। इससे भारतीय विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और अवसंरचना क्षेत्रों में यूरोपीय निवेश को बढ़ावा मिल सकता है। फिर भी, नियामकीय सामंजस्य, संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा और श्रम व पर्यावरण मानकों पर सहमति जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। यूरोपीय संघ का जोर है
कि उसके व्यापार साझेदार अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों और पेरिस जलवायु
समझौते जैसी प्रतिबद्धताओं का पालन करें। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



