विदेश

लेबनान में संयुक्त राष्ट्र की अपील बेअसर

युद्धविराम (सीजफायर) को आमतौर पर किसी भी संघर्ष को रोकने और शांति की दिशा में पहला कदम माना जाता है, लेकिन वास्तविकता अक्सर इससे कहीं अधिक जटिल होती है। हाल के घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्धविराम लागू होने के बाद भी कई क्षेत्रों में हिंसा जारी रह सकती है, खासकर लेबनान में। यह स्थिति बताती है कि केवल समझौते पर हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसे जमीनी स्तर पर लागू करना कहीं अधिक कठिन होता है।
लेबनान जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह लक्ष्य आसानी से हासिल नहीं हो पाता। यहाँ लंबे समय से हिज्बुल्लाह और इजराइल के बीच तनाव बना हुआ है, जो समय-समय पर हिंसक रूप ले लेता है। युद्धविराम की घोषणा के बाद भी दोनों पक्षों के बीच अविश्वास बना रहता है, जिससे संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाता। युद्धविराम के बावजूद हिंसा जारी रहने का एक बड़ा कारण जमीनी स्तर पर सक्रिय छोटे-छोटे गुट हैं। ये गुट अक्सर केंद्रीय नेतृत्व के सीधे नियंत्रण में नहीं होते और अपने स्तर पर हमले जारी रखते हैं। ऐसे में भले ही बड़े स्तर पर युद्धविराम घोषित हो जाए, लेकिन छोटे स्तर पर हिंसा रुकना मुश्किल हो जाता है। लेबनान के दक्षिणी इलाकों में भी यही स्थिति देखने को मिलती है, जहाँ सीमा के पास अक्सर गोलीबारी और रॉकेट हमले होते रहते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण कारण है “युद्धविराम उल्लंघन” के आरोप। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौता तोड़ने का आरोप लगाते हैं। इजराइल का कहना होता है कि हिज्बुल्लाह पहले हमला करता है, जबकि हिज्बुल्लाह का आरोप होता है कि इजराइल जानबूझकर उकसाने वाली कार्रवाई करता है। इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप से स्थिति और बिगड़ जाती है और युद्धविराम कमजोर पड़ जाता है।
लेबनान की आंतरिक स्थिति भी इस समस्या को और जटिल बनाती है। देश पहले से ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में बाहरी हमलों के कारण सरकार के लिए स्थिति को नियंत्रित करना और भी कठिन हो जाता है। सीमित संसाधनों और कमजोर प्रशासनिक ढांचे के चलते युद्धविराम को प्रभावी ढंग से लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इस पूरे परिदृश्य में बाहरी शक्तियों की भूमिका भी अहम है। ईरान, जिसे हिज्बुल्लाह का समर्थक माना जाता है, और संयुक्त राज्य अमेरिका, जो इजराइल का प्रमुख सहयोगी है, इस संघर्ष को सीधे प्रभावित करते हैं। जब इन देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो उसका असर लेबनान और इजराइल के बीच टकराव पर भी पड़ता है। इस प्रकार, एक स्थानीय संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय संकट का रूप ले लेता है। सुरक्षा की धारणा भी इस संघर्ष को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दोनों पक्ष अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। यदि किसी भी पक्ष को लगता है कि दूसरा पक्ष भविष्य में खतरा बन सकता है, तो वह पहले ही कार्रवाई कर देता है। यही मानसिकता युद्धविराम के दौरान भी सैन्य गतिविधियों को पूरी तरह रुकने नहीं देती।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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