ओली की गिरफ्तारी से नेपाल की राजनीति में नया मोड़

नेपाल की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सत्ता, जवाबदेही और युवा शक्ति-तीनों एक साथ टकराते दिखाई दे रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की गिरफ्तारी ने इस टकराव को और भी स्पष्ट कर दिया है। उन्हें 28 मार्च 2026 को उस मामले में हिरासत में लिया गया, जो बीते वर्ष हुए “जेन-जी” विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और मौतों से जुड़ा है।सितंबर 2025 में नेपाल की सड़कों पर उतरी युवा पीढ़ी केवल विरोध नहीं कर रही थी, बल्कि वह एक ऐसी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठा रही थी, जिससे वह खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक उदासीनता के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही हिंसक हो गया। दो दिनों के भीतर 76 लोगों की मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। यह केवल एक कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं थी, बल्कि शासन की संवेदनहीनता का प्रतीक बन गया। इसी पृष्ठभूमि में गठित जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा कि तत्कालीन सरकार स्थिति को संभालने में विफल रही। रिपोर्ट में विशेष रूप से के.पी. शर्मा ओली पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने समय रहते आवश्यक हस्तक्षेप नहीं किया। उनके साथ उस समय के गृह मंत्री रमेश लेखक को भी हिरासत में लिया गया है। यह कदम नेपाल में उच्च राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक अहम संकेत माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब देश में नई राजनीतिक धारा उभर रही है।
बालेंद्र शाह ने गत 27 मार्च कोप्रधानमंत्री पद की शपथ ली है। एक समय रैपर और काठमांडू के मेयर रहे शाह का सत्ता में आना इस बात का संकेत है कि नेपाल की जनता, विशेषकर युवा वर्ग, पारंपरिक राजनीति से अलग कुछ नया चाहती है। उनकी जीत को “जेन-जी आंदोलन” की राजनीतिक परिणति के रूप में भी देखा जा रहा है।ओली की गिरफ्तारी पर देश दो हिस्सों में बंटा हुआ नजर आता है। एक वर्ग इसे न्याय और लोकतंत्र की मजबूती के रूप में देख रहा है, जबकि दूसरा इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा है लेकिन इस बहस के बीच एक बात साफ है नेपाल की नई पीढ़ी अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार बन चुकी है। यह घटनाक्रम दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए भी एक बड़ा संकेत है। यह बताता है कि लोकतंत्र में सत्ता केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रह सकती। उसे हर निर्णय के लिए जवाबदेह भी होना होगा। नेपाल में उठी यह आवाज केवल एक देश की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलते समय की झलक है, जहाँ युवा अपने भविष्य को खुद तय करना चाहते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में जाती है लेकिन इतना तय है कि इस घटना ने नेपाल की राजनीति में एक नया अध्याय खोल दिया है जहाँ सत्ता से ज्यादा ताकत अब जनता, खासकर युवाओं के हाथ में दिखाई दे रही है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



