बीएमसी में शिंदे पर भारी उद्धव

बीएमसी अर्थात बृह्न्न मुंबई कारपोरेशन के चुनाव ने उद्धव ठाकरे को निश्चित रूप से एक मामले में राहत प्रदान की है। उद्धव ठाकरे के गुट की शिवसेना दोयम दर्जे पर पहुंच गयी थी। हालांकि उसका पहला विभाजन राजठाकरे ने किया था लेकिन तब बाला साहेब ठाकरे जीवित थे और शिवसेना का कोई खास नुकसान नहीं हुआ था। शिव सेना को करारा झटका 2022 में लगा जब एकनाथ शिंदे ने कई विधायकों के साथ पार्टी छोड़ दी। इतना ही नहीं शिवसेना के असली नाम और चुनाव चिन्ह को भी उन्होंने छीन लिया था। एकनाथ शिंदे कहते थे कि असली शिवसेना वही है लेकिन बीएमसी के चुनाव में मुंबईकरो ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को ही असली शिवसेना माना है। उद्धव की पार्टी शिवसेना (यूबीटी) को 7,17738 मत मिले जो कुल डाले गये वोटों का 13.13 प्रतिशत है। इसके साथ ही उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राजठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने बीएमसी में 6 सीटें जीतीं और उसे 74946 मत मिले जो कुल वोटों का
1.37 फीसद है। इस प्रकार उद्धव की शिवसेना को लगभग 8 लाख वोट मिले हैं जबकि एकनाथ शिंदे को 20 सीटें मिली हैं और 273326 वोट मिल पाये। उद्धव के गठबंधन ने बीएमसी में 71 सीटों पर विजयश्री प्राप्त की है। बीएमसी में ओवैसी की एआईएमआईएम ने भी 68072 वोटों के साथ 8 सीटें जीती हैं। यह कुल वोटों का 4 प्रतिशत है जबकि एकनाथ शिंदे को भी 5 प्रतिशत ही वोट मिल पाये हैं। यह अलग बात है कि राज्य की कुल महानगर पालिकाओं में एकनाथ शिंदे का पलड़ा भारी रहा है। मुंबई वालों ने माफिया अरुण गवली को भी सबक सिखाया है।
बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों के बाद शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की तरफ से पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। इस प्रतिक्रिया में उन्होंने संकेत दिया है कि महाराष्ट्र में राजनीतिक लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और तब तक जारी रहेगी जब तक मराठी समुदाय को वह सम्मान नहीं मिल जाता जिसका वह हकदार है। शिवसेना (ओबीटी) ने एक्स पर पोस्ट में कहा, यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। यह तब तक ऐसे ही जारी रहेगी जब तक मराठी व्यक्ति को वह सम्मान नहीं मिल जाता जिसका वह हकदार है!
बीएमसी चुनावों में बीजेपी-शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) गठबंधन को बड़ी जीत हासिल हुई, वहीं शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) गठबंधन पिछड़ गया। चुनाव आयोग द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भाजपा ने 89 सीटें जीतीं, जिसमें उसे 11,79,273 वोट मिले, जो कुल डाले गए वोटों का 21.58 प्रतिशत है। सभी जीतने वाले उम्मीदवारों में, भाजपा का वोट शेयर 45.22 प्रतिशत रहा, जिससे यह नगर निकाय में सबसे बड़ी पार्टी बन गई। इसके गठबंधन सहयोगी, शिव सेना (एकनाथ शिंदे गुट) ने 29 सीटें हासिल कीं और 2,73,326 वोट मिले, जो कुल वोट शेयर का 5 प्रतिशत है।
वहीं दूसरी तरफ, एमएनएस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही शिवसेना (यूबीटी) ने 65 सीटें जीतीं। यूबीटी के नेतृत्व वाली शिवसेना को 7,17,736 वोट मिले, जो कुल डाले गए वोटों का 13.13 प्रतिशत था। डछै ने गठबंधन के खाते में 6 सीटें जोड़ीं, उसे 74,946 वोट और 1.37 प्रतिशत वोट शेयर मिला। इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 24 सीटें हासिल कीं, उसे 2,42,646 वोट मिले, जो कुल वोट शेयर का 4.44 प्रतिशत है।
दूसरी पार्टियों में, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने 68,072 वोटों के साथ 8 सीटें जीतीं, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (छब्च्) को 3 सीटें मिलीं, समाजवादी पार्टी ने 2 सीटें जीतीं, और छब्च् (शरदचंद्र पवार) ने 1 सीट जीती। गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली को बीएमसी चुनाव में बड़ा झटका लगा है। बीएमसी चुनाव में गवली की दोनों बेटियां पहली बार चुनाव लड़ रही थीं लेकिन उन्हें हार मिली। गीता और योगिता गवली अपने पिता की बनाई पार्टी अखिल भारतीय सेना के टिकट पर चुनाव लड़ रही थीं। गीता गवली को बायकुला के वार्ड 212 में समाजवादी पार्टी की अमरीन शहजान अब्राहानी ने हराया जबकि योगिता गवली वार्ड 207 में बीजेपी के रोहिदास लोखंडे से हार गईं।
अरुण गवली एक खतरनाक गैंगस्टर था जो 1970 के दशक में मुंबई अंडरवर्ल्ड में आया था। वह और उसका भाई किशोर बायकुला कंपनी का हिस्सा थे, जो एक क्रिमिनल गैंग था और सेंट्रल मुंबई के बायकुला, परेल और सात रास्ता इलाकों में काम करता था।
अरुण गवली ने 1988 में गैंग संभाला और 80 और 90 के दशक के आखिर में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के गैंग के साथ पावर की लड़ाई में शामिल रहा।
उसे 1980 के दशक में शिवसेना के बड़े नेता बालासाहेब ठाकरे का पॉलिटिकल सपोर्ट मिला लेकिन बीच में शिवसेना से अनबन के बाद उन्होंने अपनी खुद की पॉलिटिकल पार्टी
बनाई और 2004 से 2009 के बीच चिंचपोकली चुनाव क्षेत्र से विधायक रहे। अरुण गवली को 2008 में मुंबई शिवसेना के एक पार्षद की हत्या के आरोप में जेल हुई थी। वह 17 साल जेल में रहे।
महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) को करारी हार का सामना करना पड़ा है। राज ठाकरे की पार्टी ने राज्य की कुल 2869 सीटों में से सिर्फ 13 पर जीत हासिल की, जबकि मुंबई की बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की 227 सीटों में मात्र 6 सीटें मिलीं। यह चुनाव महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में हुए थे, जहां बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया और कई प्रमुख शहरों में बहुमत हासिल किया। बीएमसी में महायुति को स्पष्ट बहुमत मिला, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 65 सीटें मिलीं। मनसे का प्रदर्शन राज ठाकरे की उम्मीदों से काफी कम रहा, और पार्टी 22 शहरों में खाता भी नहीं खोल पाई। हार के बाद राज ठाकरे ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट शेयर की, जिसमें उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं और चुने हुए नगरसेवकों का उत्साहवर्धन किया। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा, जय महाराष्ट्र, सबसे पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना के सभी निर्वाचित नगरसेवकों को दिल से बधाई। इस बार का चुनाव आसान नहीं था। अपार धनशक्ति और सत्ता की ताकत के सामने शिवशक्ति की लड़ाई थी लेकिन ऐसी कठिन लड़ाई में भी दोनों दलों के कार्यकर्ताओं ने बेहतरीन संघर्ष किया। इसके लिए उनका जितना भी प्रशंसा की जाए, कम है। हमारी लड़ाई मराठी मानुष की, मराठी भाषा की, मराठी अस्मिता की और समृद्ध महाराष्ट्र की है। यही लड़ाई हमारा अस्तित्व है। ऐसी लड़ाइयां दीर्घकालीन होती हैं, इसका भान आप सभी को है। बाकी क्या गलत हुआ, क्या रह गया, क्या कमी रही और आगे क्या करना होगा, इसका विश्लेषण और आवश्यक कदम हम सब मिलकर करेंगे ही।
राज ठाकरे ने लिखा, असल में यह कहने की जरूरत नहीं है, लेकिन फिर भी कहता हूं, पूरे राज्य में, मराठी मानुष को नुकसान पहुंचाने का कोई भी मौका सत्ताधारी और उनके समर्थक छोड़ने वाले नहीं हैं। इसलिए हमें अपने मराठी मानुष के साथ मजबूती से खड़ा रहना है। यह चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, जहां ठाकरे परिवार की पारंपरिक ताकत को चुनौती मिली है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



