सरस्वती पुत्र महाकवि निराला

बसंत पंचमी हिन्दुओं का एक महान पर्व है। इस दिन माता सरस्वती का ब्रह्माजी के कमण्डल से जन्म हुआ और सृष्टि की नीरसता वीणा की ध्वनि से समाप्त हो गयी। इसीलिए माता सरस्वती को ज्ञान, वाणी और संगीत की देवी समझा जाता है। बसंत ऋतु में सबसे ज्यादा सुहाना मौसम होता है। इस दिन जन्म लेने वाले भी ज्ञान, वाणी और संगीत से समृद्ध रहते हैं। सरस्वती माता के हाथों मंे वीणा, पुस्तक और माला रहती है जो संगीत, ज्ञान और विद्या का प्रतीक है। सरस्वती का जन्म ब्रह्मा द्वारा सृष्टि को पूर्णता और ज्ञान प्रदान करने के लिए हुआ था, इसलिए उसका प्रभाव बसंत पंचमी मंे भी समाया हुआ है। माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी होती है और इसी दिन हिन्दी के अमर कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला; का जन्म हुआ था। निरालाजी ने भी मुक्त छंद का आविष्कार किया था। इसीलिए उनकी रचनाओं मंे आग है, पौरुष है और सड़ी-गली परम्पराओं के प्रति विद्रोह। निराला जी का जन्म पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में 21 फरवरी 1899 को पंडित राम सहाय तिवारी और श्रीमती मनोहरा देवी के घर बसंत पंचमी के दिन हुआ था। ये दोनों मूलरूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव के गढ़ा कोला निवासी थे जहां आज भी निरालाजी की जयंती धूमधाम से बसंत पंचमी को मनायी जाती है। निराला जी ने अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, वेला, आराधना, राम की शक्ति पूजा जैसी कविताएं लिखीं। उपन्यास और अनुवाद भी उनके पठनीय हैं। निराला की एक कविता ‘दान’ मानवता के प्रति उनके लगाव
और सड़ी-गली परम्पराओं
के उपहास को चित्रित
करती है।
कविता इस प्रकार है-
निकला पहला अरविन्द आज,
देखता अनिन्द्य रहस्य-साज।
सौरभ-वसना समीर बहती,
कानों में प्राणों की कहती।
गोमती क्षीण-कटि नटी नवल,
नृत्यपर मधुर-आवेश-चपल।
मैं प्रातः पर्यटनार्थ चला
लौटा, आ पुल पर खड़ा हुआ।
सोचा–विश्व का नियम निश्चल,
जो जैसा, उसको वैसा फल
देती यह प्रकृति स्वयं सदया,
सोचने को न कुछ रहा नया।
सौन्दर्य, गीत, बहु वर्ण, गन्ध,
भाषा, भावों के छन्द-बन्ध,
और भी उच्चतर जो विलास,
प्राकृतिक दान वे, सप्रयास
या अनायास आते हैं सब,
सब में है श्रेष्ठ, धन्य, मानव।
फिर देखा, उस पुल के ऊपर
बहु संख्यक बैठे हैं वानर।
एक ओर पथ के, कृष्णकाय
कंकालशेष नर मृत्यु-प्राय
बैठा सशरीर दैन्य दुर्बल,
भिक्षा को उठी दृष्टि निश्चल।
अति क्षीण कण्ठ, है तीव्र श्वास,
जीता ज्यों जीवन से उदास।
ढोता जो वह, कौन सा शाप?
भोगता कठिन, कौन सा पाप?
यह प्रश्न सदा ही है पथ पर,
पर सदा मौन इसका उत्तर!
जो बडी दया का उदाहरण,
वह पैसा एक, उपायकरण!
मैंने झुक नीचे को देखा,
तो झलकी आशा की रेखा-
विप्रवर स्नान कर चढ़ा सलिल
शिव पर दूर्वादल, तण्डुल, तिल,
लेकर झोली आये ऊपर,
देखकर चले तत्पर वानर।
द्विज राम-भक्त, भक्ति की आश
भजते शिव को बारहों मास।
कर रामायण का पारायण
जपते हैं श्रीमन्नारायण।
दुख पाते जब होते अनाथ,
कहते कपियों से जोड़ हाथ,
मेरे पड़ोस के वे सज्जन,
करते प्रतिदिन सरिता-मज्जन।
झोली से पुए निकाल लिये,
बढ़ते कपियों के हाथ दिये।
देखा भी नहीं उधर फिर कर
जिस ओर रहा वह भिक्षु इतर।
चिल्लाया किया दूर दानव,
बोला मैं–धन्य श्रेष्ठ मानव!
निराला के बचपन में उनका नाम सुर्जकुमार रखा गया। उनके पिता पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) जिले गढ़ाकोला गाँव के रहने वाले थे। वह महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषा और साहित्य का ज्ञान उन्होंने स्वाध्याय से अर्जित किया। उनका जीवन उनके ही शब्दों में कहें तो दुःख की कथा-सा है। तीन वर्ष की आयु में उनकी माँ का और बीस वर्ष के होते-होते उनके पिता का देहांत हो गया। बेहद अभावों में संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए निराला पर एक और आघात तब हुआ, जब पहले महायुद्ध के बाद फैली महामारी में उनकी पत्नी मनोहरा देवी का भी निधन हो गया। इस महामारी में उनके चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। इसके बाद की उनकी जीवन-स्थिति को उनकी काव्य-पंक्तियों से समझा जा सकता है रू
‘‘धन्ये, मैं पिता निरर्थक का,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय
लख कर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।’’
ये पंक्तियाँ निराला की कालजयी कविता ‘सरोज-स्मृति’ से हैं। यह कविता उन्होंने मात्र उन्नीस वर्ष आयु में मृत्यु को प्राप्त हुई अपनी बेटी सरोज की स्मृति में लिखी।उनका कविता लेखन सामाजिक यथार्थ, मानवीय भावनाओं, प्रकृति और देशभक्ति से ओतप्रोत था। उन्होंने पारंपरिक छन्दबद्धता से हटकर नए मुक्त छन्द और भावमयी कविता लिखी, जिससे हिन्दी कविता को एक नया आयाम मिला। निराला की कविताएँ उनके जीवन की पीड़ा, उनके देश और समाज के प्रति उनका प्रेम एवं उनकी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।
निराला का व्यक्तित्व घनघोर सिद्धांतवादी और साहसी था। वह सतत संघर्ष-पथ के पथिक थे। यह रास्ता उन्हें विक्षिप्तता तक भी ले गया। उन्होंने जीवन और रचना अनेक संस्तरों पर जिया, इसका ही निष्कर्ष है कि उनका रचना-संसार इतनी विविधता और समृद्धता लिये हुए है। हिंदी साहित्य संसार में उनके आक्रोश और विद्रोह, उनकी करुणा और प्रतिबद्धता की कई मिसालें और कहानियाँ प्रचलित हैं। उनके जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता। वहीं दारागंज नाम के मुहल्ले में 15 अक्टूबर 1961 को उनका देहावसान हुआ।
‘अनामिका’ (1923), ‘परिमल’ (1930), ‘गीतिका’ (1936), ‘तुलसीदास’ (1939), ‘कुकुरमुत्ता’ (1942), ‘अणिमा’ (1943), ‘बेला’ (1946), ‘नए पत्ते’ (1946), ‘अर्चना’ (1950), ‘आराधना’ (1953), ‘गीत कुंज’ (1954), ‘सांध्य काकली’ और ‘अपरा’ निराला की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं।
‘लिली’, ‘सखी’, ‘सुकुल की बीवी’ उनके प्रमुख कहानी-संग्रह और ‘कुल्ली भाट’, ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ उनके चर्चित उपन्यास हैं। ‘चाबुक’ शीर्षक से उनके निबंधों की एक पुस्तक भी प्रसिद्ध है।
वर्ष 1976 में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया जा चुका है।
(मोहिता स्वामी-हिफी फीचर)



