अध्यात्मनारी शक्ति

शबरी से मिलने गये स्वयं प्रभु राम

साल 2026 का पहला महीना जनवरी जाने वाला है और साल का दूसरा मास फरवरी आने वाला है। इस महीने में 28 दिन होते हैं। यह मास वसंत ऋतु की शुरुआत में आता है और इस मास में ठंड कम होने लगती है और हल्की गर्मी की शुरुआत होने लगती है। हर चार साल में एक बार कलेंडर को सही करने के लिये फरवरी में 29वां दिन जोड़ा जाता है जिसे लीप वर्ष कहते हैं। इसी के साथ भारतीय वर्ष का फाल्गुन मास भी प्रारंभ हो जाता है। यह महीना मौसम में परिवर्तन लाता है। साल का अंतिम मास होने के नाते यह एक महत्वपूर्ण अवधि है जिसमें कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाये जाते हैं। राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और महत्वपूर्ण दिनों के साथ-साथ इस मास में कई त्योहार भी मनाये जाते हैं। इस साल 2026 में फाल्गुन की महाशिवरात्रि, माघ पूर्णिमा और फुलेरा दूज जैसे त्योहार आने वाले हैं। शबरी जयंती और होलास्टक भी इसी महीने में पड़ेंगे।

इस मास की 1 फरवरी को माघ पूर्णिमा व्रत मनाया जाता है। इस दिन रविवार है। इस दिन लोग नदियों में स्नान, दान और पुण्य कर्म करते हैं। इस मास की दूसरी तारीख 2 फरवरी सोमवार को फाल्गुन मास का आरंभ है। इस दिन से फाल्गुन मास की तैयारी धार्मिक अनुष्ठानों और उत्सवों का सिलसिला शुरू हो जाता है। 5 फरवरी (शनिवार) को यशोदा जयंती है। यह भगवान श्रीकृष्ण की माता यशोदा के जन्मोत्सव के रूप में मनायी जाती है। इस मास की 8 तारीख (8 फरवरी) को शबरी जयंती है और भानु सप्तमी है। इस दिन क्रमशः सूर्य और माता शबरी की विशेष पूजा-अर्चना का विधान है। 9 फरवरी (सोमवार) को जानकी जयंती और मासिक कालाष्टमी है।

यह जयंती माता सीता और मासिक कालाष्टमी पर काल भैरव की उपासना होती है। 13 फरवरी को
शुक्रवार को विजेता एकादशी ओर कुंभ संक्रांति है। यह एकादशी विजय और सफलता का प्रतीक मानी जाती है। कुंभ संक्रांति में सूर्य का कुंभ राशि में प्रवेश होता है। 14 फरवरी (शनिवार) को शनि त्रयोदशी और कृष्ण प्रदोष व्रत है। शनि त्रयोदशी शनि देव और प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की आराधना होती है। 15 फरवरी को महाशिवरात्रि है। इस दिन भगवान शिव की उपासना का सबसे बड़ा प्रमुख पर्व है। 17 फरवरी को फाल्गुन अमावस्या है यह पित्र तर्पण और शांति कर्मों के लिये होता है। यहां हम भक्त शिरोमणि माता शबरी की कथा बताएंगे जिनकी जयंती 8 फरवरी को है।

शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा बताया गया है। इन्होंने शबर जाति में जन्म लिया जिस कारण इनका नाम शबरी पड़ गया। संतजन कहते हैं कि इन्होंने भगवान श्री राम का इतना सब्र किया कि इनका नाम ही सबरी पड़ गया। शबरी के पिता भीलों के राजा थे। शबरी को श्रीराम के प्रमुख भक्तों में गिना जाता है। शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने एक दूसरे भील कुमार से उसका विवाह पक्का कर दिया और धूमधाम से विवाह की तैयारी की जाने लगी। विवाह के दिन सैकड़ों बकरे-भैंसे बलिदान के लिए लाए गए। बकरे-भैंसे देखकर शबरी ने अपने पिता से पूछा- ‘ये सब जानवर यहां क्यों लाए गए हैं?’ पिता ने कहा- ‘तुम्हारे विवाह के उपलक्ष्य में इन सबकी बलि दी जाएगी। यह सुनकर बालिका शबरी को अच्छा नहीं लगा और सोचने लगी यह किस प्रकार का विवाह है, जिसमें इतने निर्दोष प्राणियों का वध किया जाएगा। यह तो पाप कर्म है, इससे तो विवाह न करना ही अच्छा है। ऐसा सोचकर वह रात्रि में उठकर जंगल में भाग जाती है।

दंडकारण्य में वह देखती है कि हजारों ऋषि-मुनि तप कर रहे हैं। बालिका शबरी अशिक्षित होने के साथ ही कथित निम्न जाति से थी। वह समझ नहीं पा रही थीं कि किस तरह वह इन ऋषि-मुनियों के बीच यहां जंगल में रहें जबकि मुझे तो भजन, ध्यान आदि कुछ भी नहीं आता।
लेकिन शबरी का हृदय पवित्र था और उसमें प्रभु के लिए सच्ची चाह थी, जिसके होने से सभी गुण स्वतः ही आ जाते हैं। वह रात्रि में जल्दी उठकर, जिधर से ऋषि निकलते, उस रास्ते को नदी तक साफ करती, कंकर-पत्थर हटाती ताकि ऋषियों के पैर सुरक्षित रहे। फिर वह जंगल की सूखी लकड़ियां बटोरती और उन्हें ऋषियों के यज्ञ स्थल पर रख देती। इस प्रकार वह गुप्त रूप से ऋषियों की सेवा करती थी। इन सब कार्यों को वह इतनी तत्परता से छिपकर करती कि कोई ऋषि देख न ले। यह कार्य वह कई वर्षों तक करती रही। अंत में मतंग ऋषि ने उस पर कृपा की। जब मतंग ऋषि मृत्यु शैया पर थे तब उनके वियोग से ही शबरी व्याकुल हो गई। महर्षि ने उसे निकट बुलाकर समझाया-बेटी! धैर्य से कष्ट सहन करती हुई साधना में लगी रहना। प्रभु राम एक दिन तेरी कुटिया में अवश्य आएंगे। प्रभु की दृष्टि में कोई दीन-हीन और अस्पृश्य नहीं है। वे तो भाव के भूखे हैं और अंतर की प्रीति पर रीझते हैं।’

महर्षि की मृत्यु के बाद शबरी अकेली ही अपनी कुटिया में रहती और प्रभु राम का स्मरण करती रहती थी। राम के आने की बाट जोहती शबरी प्रतिदिन कुटिया को इस तरह साफ करती थीं कि आज राम आएंगे। साथ ही रोज ताजे फल लाकर रखती कि प्रभु राम आएंगे तो उन्हें मैं यह फल खिलाऊंगी।

रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में माता शबरी और प्रभु श्रीराम का मिलन का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है।

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी के आश्रम पगु धारा।
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।

उदार प्रभुश्रीराम कबन्ध नामक राक्षस को गति देकर शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्री रामचंद्रजी को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया।
आज मेरे गुरुदेव का वचन पूरा हो गया। उन्होंने कहा था की राम आयेंगे। और प्रभु आज आप आ गए। निष्ठा हो तो शबरी जैसी। बस गुरु ने एक बार बोल दिया की राम आयेंगे और विश्वास हो गया। हमे भगवान इसलिए नहीं मिलते क्योंकि हमे अपने गुरु के वचनों पर भरोसा ही नही होता। जब शबरी ने श्री राम को देखा तो आँखों से आंसू बहने लगे और चरणों से लिपट गई है। (सबरी परी चरन लपटाई)। मुंह से कुछ बोल भी नहीं पा रही हैं चरणों में शीश नवा रही हैं। फिर सबरी ने दोनों भाइयों राम, लक्ष्मण जी के चरण धोये हैं। कुटिया के अंदर गई है और बेर लाई है। वैसे रामचरितमानस में कंद-मूल लिखा हुआ है। लेकिन संतों ने कहा की सबरी ने तो रामजी को बेर ही खिलाये। सबरी एक बेर उठाती है उसे चखती है। बेर मीठा निकलता है तो रामजी को देती है अगर बेर खट्टा होता है तो फेक देती है। भगवन राम एक शब्द भी नहीं बोले की मैया क्या कर रही है। तू जूठे बेर खिला रही है। भगवान प्रेम में डूबे हुए हैं। बिना कुछ बोले बेर खा रहे है। माँ एकटक राम जी को निहार रही है।(चक्षु स्वामी-हिफी फीचर)

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