स्टालिन की खेमेबंदी मजबूत

इस साल अर्थात 2026 में पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इनमें दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल के साथ केन्द्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी भी शामिल है। सबसे ज्यादा घमासान पश्चिम बंगाल में हो सकता है लेकिन पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में भी बड़ा मुकाबला होगा। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए ये विधानसभा चुनाव दक्षिण और पूर्व में विस्तार का अवसर माने जा रहे हैं लेकिन कांग्रेस और द्रमुक जैसे दलों के लिये सत्ता में वापसी की परीक्षा होगी। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में यदि सत्ता परिवर्तन हो जाता है तो यह इण्डिया महा गठबंधन को कमजोर कर सकता है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार इस साल और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव 2029 के लोकसभा चुनावों की दिशा भी तय करेंगे। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक गठबंधन इसीलिए अपनी खेमे बंदी मजबूत कर रहा है। द्रमुक की मुख्य प्रतिद्वन्द्वी एडीएमके (अन्ना द्रमुक) है। पिछली बार 2024 के लोकसभा चुनाव में डीएमडीके अन्ना द्रमुक के साथ थी लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव से पहले ही डीएम डीके ने स्टालिन की पार्टी से नाता जोड़ लिया है। तमिलनाडु में अप्रैल और मई में विधानसभा चुनाव की संभावना है।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले डीएमडीके ने पाला बदल दिया है। आगामी चुनाव के लिए पार्टी ने डीएमके के साथ गठबंधन करने का ऐलान किया है। हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव में डीएमडीके और एआईडीएमके ने साथ चुनाव लड़ा था। इसे तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से जुड़ा बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अभिनेता विजयकांत की पार्टी डीएमडीके ने डीएमके गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया है। 2021 विधानसभा चुनाव में यह दल अकेले ही चुनाव लड़ा था और कोई सीट नहीं जीता था। इस बार सत्ताधारी पार्टी के साथ गठबंधन कर डीएमडीके ने अपनी स्थिति मजबूत की है।
चेन्नई में डीएमके चीफ एमके स्टालिन से मिलने के बाद डीएमडीके की जनरल सेक्रेटरी प्रेमलता विजयकांत ने इस गठबंधन का औपचारिक तौर पर ऐलान किया। उन्होंने कहा, हमने डीएमके के साथ अलायंस कर लिया है। हमारी पार्टी के कैडर भी यही चाहते थे। यह अलायंस तब बन जाना चाहिए था, जब कैप्टन विजयकांत जिंदा थे। सीटों की संख्या दोनों पार्टियों के इलेक्शन कमिटी बनाने और उस पर बातचीत करने के बाद तय की जाएगी। हमने डीएमके के साथ अलायंस कर लिया है। यह पहला मौका है, जब डीएमडीके ने डीएमके के साथ गठबंधन किया है। तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव अप्रैल और मई के महीने में हो सकते हैं। मौजूदा सरकार का कार्यकाल 10 मई तक है। ऐसे में चुनाव आयोग को इस तारीख से पहले चुनाव पूरे करने होंगे।
अगले कुछ ही महीनों में देश के 5 राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ये चुनाव भले ही विधानसभा के लिए हो रहे हों, पर राष्ट्रीय राजनीति को भी बहुत मजबूती से प्रभावित करेंगे। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी अपनी सत्ता को कई नए राज्यों में स्थापित करने की कोशिश में है, तो दूसरी तरफ विपक्ष, खासकर कांग्रेस और क्षेत्रीय दल, देश की सबसे बड़ी पार्टी को कोई मौका नहीं देना चाहते हैं।
तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी कि डीएमके सरकार है, जिसने 2021 में 234 में से 133 सीटें जीतीं थीं। इस सूबे में चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं से 1.86 करोड़ लोग लाभान्वित हुए हैं और पार्टी करीब 2.5 करोड़ वोटों का लक्ष्य लेकर चल रही है। हालांकि बेरोजगारी जैसे मुद्दे पार्टी पर भारी पड़ सकते हैं और एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर तो है ही। वहीं, दूसरी तरफ एआईएडीएमके-बीजेपी गठबंधन भी अपना पूरा दम लगाए हुए है, जबकि विजय की टीवीके नई पार्टी के रूप में युवाओं को आकर्षित कर रही है। तमिलनाडु में जीत बीजेपी के लिए ऑर्गेनिक ग्रोथ का बड़ा मौका हो सकती है, जहां हिंदुत्व की सीमाएं हैं। वहीं, विपक्ष के लिए डीएमके की हार इंडिया ब्लॉक को कमजोर करेगी।
केरल में पिनाराई विजयन की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी कि एलडीएफ की सरकार है, जिसने 2021 में 99 सीटें जीतीं। यह गठबंधन एक बार फिर सत्ता में वापसी चाहता है लेकिन पिछले कुछ महीने इसके लिए अच्छे नहीं रहे हैं। विजयन सरकार का सामाजिक कल्याण और विकास पर जोर है, लेकिन आर्थिक चुनौतियां और मुख्यमंत्री की ऑटोक्रेटिक स्टाइल एक बड़ा माइनस पॉइंट है। 2025 स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस-यूडीएफ ने अच्छा प्रदर्शन किया, जो एलडीएफ के लिए चिंता की बात है। वहीं, बीजेपी ने भी इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है और वह अपने पिछले प्रदर्शन से बेहतर करने की कोशिश में है। कुल मिलाकर इन चुनावों में लेफ्ट, कांग्रेस और बीजेपी, तीनों का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है।
पुडुचेरी में एन. रंगासामी के नेतृत्व में ऑल इंडिया एन.आर. कांग्रेस यानी कि टीवीके और बीजेपी का गठबंधन सत्ता में है। 2021 में 30 सीटों वाली विधानसभा में एआईएनआरसी ने 10 और बीजेपी ने 6 सीटें जीती थीं, लेकिन फिलहाल गठबंधन में सब कुछ अच्छा होता नहीं दिख रहा। विपक्ष में कांग्रेस जैसी पार्टियां इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण केंद्र शासित प्रदेश की सत्ता पर अपना दावा मजबूती से पेश करती दिख रही हैं। लोकल गवर्नेंस और विकास के मुद्दे प्रमुख हैं, ऐसे में ये चुनाव बीजेपी के लिए दक्षिण में गठबंधन बचाने का टेस्ट है, जहां एंटी-इनकंबेंसी है। वहीं, अगर कांग्रेस और डीएमके की फिर से हार होती है तो उनके लिए पुडुचेरी में अपना संगठन बचाना मुश्किल हो सकता है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सरकार है, जिसने 2021 के विधानसभा चुनावों में 213 सीटें जीतीं और 48 फीसद वोट शेयर हासिल किया। ममता की लोकप्रियता और कल्याण योजनाएं उनकी ताकत हैं, लेकिन आर्थिक चुनौतियां और गवर्नेंस के विवाद उनकी सरकार पर भारी पड़ सकते हैं। बीजेपी 2021 में 77 सीटों तक पहुंची थी और अब बिहार में बड़ी जीत के बाद काफी आक्रामक है। कांग्रेस यहां कमजोर हो चुकी है और नेतृत्व के अभाव से जूझ रही है। अगर बीजेपी बंगाल में कुछ अच्छा कर जाती है तो यह उसकी राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा बूस्ट साबित हो सकता है। वहीं, टीएमसी की हार उसे उन क्षेत्रीय पार्टियों की लिस्ट में डाल सकती है जो एक समय किसी राज्य में बहुत ताकतवर थीं लेकिन धीरे-धीरे कमजोर होती चली गईं। असम में फिलहाल हिमंत विश्व शर्मा के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार है। 2021 के चुनाव में बीजेपी गठबंधन ने 75 सीटें जीतीं और अब लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की तैयारी कर रहा है। शर्मा ने पिछले कुछ सालों में बीजेपी के फायरब्रांड नेता के साथ-साथ एक ऐसे लीडर की छवि बनाई है जो विकास, सुरक्षा और पहचान की राजनीति पर जोर देता है। वहीं, विपक्ष में कांग्रेस गौरव गोगोई के नेतृत्व में अपनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है। मुस्लिम वोटों के दम पर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने वाली एआईयूडीएफ जैसी पार्टियां भी आने वाले विधानसभा चुनावों में काफी कुछ तय करेंगी।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



