नीतीश की मजबूरी या मर्जी

बिहार में होली के रंग में सराबोर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चेहरा कितना सच बोल रहा है और कितना छिपा रहा है, यह बताना मुश्किल है। लगभग दो दशक से बहुमत न होने के बावजूद नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते रहे हैं। वह कभी भी राज्य सभा में जा सकते थे। इसलिए पटना में जब 5 मार्च को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अमित शाह से मुलाकात के बाद राज्य सभा के लिए नामांकन दाखिल किया और कहा कि राज्य सभा का सदस्य बनना मेरी दिली इच्छा थी, तब किसी को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा है। सभी जानते हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्य सभा जाना कौन पसंद करेगा? बहरहाल इस बार विधानसभा चुनाव से पहले जो अटकलें लग रही थीं वे सच साबित हो रही हैं। भाजपा अब ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने अब बिहार में अपना सीएम बनाने का रास्ता साफ कर दिया है, बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार को यह आभास हो गया था कि बड़ी संख्या में उनके विधायक टूट सकते हैं। इस प्रकार नीतीश ने अपनी कुर्सी का बलिदान देकर पार्टी को बचाने का प्रयास किया है। नीतीश कुमार ने 6 मार्च को अपने आवास पर (जद) यू के सांसदों, विधायको और विधान परिषद के सदस्यों की बैठक भी इसी उद्देश्य से बुलाई।
बिहार की राजनीति में इन दिनों भारी उठापटक चल रही है। सीएम नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन कर दिया है। ऐसे में बिहार की कमान किसके हाथों में होगी, इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं। इस बीच बिहार के नीतीश कुमार ने अपने आधिकारिक आवास पर जेडीयू के सभी विधायकों, सांसदों और विधान पार्षदों की बैठक बुलाई । बता दें कि 20 साल तक सीएम रहने के बाद नीतीश कुमार अब दिल्ली का रुख करने जा रहे हैं।नीतीश कुमार के राज्यसभा का रुख करने के बीच चर्चा ये चल रही है कि बिहार में नित्यानंद राय सीएम बन सकते हैं, वह यादव हैं और केंद्र में मंत्री हैं। ये तो तय हो गया है कि बिहार में अब बीजेपी का ही मुख्यमंत्री बनेगा। बिहार की राजनीति ने पिछले 35 साल में दो ही चेहरे देखे हैं- लालू यादव और नीतीश कुमार। लालू अपने बेटे तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश में लगे रहे तो वहीं नीतीश कुमार ने बेटे को कभी आगे आने नहीं दिया। हालांकि अब नीतीश के बेटे की भी राजनीति में एंट्री की अटकलें तेज हैं।
बिहार में सरकारें बदलीं, गठबंधन बदले, चुनाव आए-गए, लेकिन एक छोटी सी अवधि को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही बने रहे। सन् 2005 से बिहार की राजनीति को दिशा देने वाले इस नेता ने अब राज्यसभा जाने की तैयारी कर ली है और इसके साथ ही सूबे की सियासत में एक बड़ा बदलाव शुरू होने वाला लगता है। अगर हम चुनाव के आंकड़ों को देखें, तो कहानी और भी रोचक हो जाती है। 2020 के बाद एनडीए में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। सीटों की संख्या साफ दिखा रही थी कि भाजपा के पास ज्यादा विधायक हैं, फिर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे। आखिर ऐसा क्यों? इसके 2 मुख्य कारण अक्सर बताए जाते हैं। पहला कारण उनका सामाजिक आधार है। बिहार में नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्गों (जद) यू और महिला मतदाताओं से बहुत मजबूत जुड़ाव बनाया है। शराबबंदी जैसी नीतियां और महिलाओं के लिए कल्याण योजनाओं ने उन्हें एक भरोसेमंद और विश्वसनीय नेता की छवि दी है। यह वोट बैंक गठबंधन की जीत के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है लेकिन नीतीश कुमार की राजनीति कभी पूरी तरह एक लाइन पर नहीं चली। सन् 2020 के चुनावों के बाद उन्होंने भाजपा के साथ सरकार बनाई, लेकिन कुछ साल बाद वे पक्ष बदलकर राजद के साथ नई सरकार बना बैठे। उस समय लगा कि भाजपा से उनका गठबंधन खत्म हो गया। लेकिन राजनीति में हालात बहुत जल्दी बदल जाते हैं। कुछ समय बाद नीतीश कुमार फिर एनडीए में लौट आए, और 2025 के विधानसभा चुनाव में उस गठबंधन का नेतृत्व करके उन्होंने बड़ी जीत दिलाई।
दूसरा बड़ा कारण गठबंधन में भरोसा था। 2020 के नतीजों के बाद भाजपा के नेतृत्व, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा था कि नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहेंगे। यह वादा निभाना सिर्फ बिहार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश में गठबंधन की राजनीति के लिए मजबूत संदेश था लेकिन 2025 विधानसभा चुनाव से पहले और जीत के बाद भी राजनीतिक गलियारों में एक ही सवाल बार-बार उठता रहा, क्या इस बार भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाएगी? क्योंकि गठबंधन में भाजपा की ताकत बहुत बढ़ गई थी। फिर भी सारी अटकलों के बावजूद भाजपा नेतृत्व ने नीतीश कुमार का साथ दिया, और वह मुख्यमंत्री बने रहे।
नीतीश का राज्यसभा जाना सिर्फ पद का बदलाव नहीं है। यह करीब 5 दशक लंबी राजनीतिक यात्रा का एक नया अध्याय भी हो सकता है। हाल ही में नीतीश कुमार ने खुद कहा है कि अपनी लंबी राजनीतिक जिंदगी में वे बिहार विधानसभा के सदस्य, विधान परिषद के सदस्य और लोकसभा के सांसद रह चुके हैं। अब वे राज्यसभा में भी सेवा देना चाहते हैं। और उसके बाद अगर उन्हें केंद्र सरकार में कोई भूमिका मिली, तो बिहार की राजनीति का यह बड़ा चेहरा फिर से राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिख सकता है।
हालांकि विपक्ष इसे अलग नजरिए से देख रहा है। राजद का दावा है कि भाजपा धीरे-धीरे नीतीश कुमार को किनारे कर रही है। राजनीतिक गलियारों में एक और तस्वीर भी चर्चा में है। नीतीश के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भाजपा को आखिरकार बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिल रहा है। इस प्रकार सरकार पर भाजपा का सीधा नियंत्रण और मजबूत हो जाएगा। राजद के कार्यकारी अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा, बीजेपी ने बिहार में महाराष्ट्र जैसा खेल कर दिया है, लेकिन इसके लिए नीतीश कुमार खुद ही जिम्मेदार हैं। हमारे साथ गठबंधन में रहते हुए हमने अधिक विधायक होने के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री का समर्थन दिया, लेकिन उन्होंने दो बार साथ छोड़ दिया।
जनता दल यूनाइटेड के अंदर भी असंतोष है। इसका अंदाजा समाज कल्याण मंत्री और (जद) यू के वरिष्ठ नेता मदन साहनी की टिप्पणी से लगाया जा सकता है। साहनी ने कहा, जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर हम स्तब्ध हैं। यह विश्वास करना मुश्किल है कि यह नीतीश कुमार का अपना फैसला हो सकता है। उन्होंने कहा कि उन्हें यह जानकर हैरानी हो रही है कि नीतीश कुमार की लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा-तीनों सदनों का सदस्य बनने की लंबे समय से इच्छा थी, जिसे वह मौजूदा द्विवार्षिक चुनावों में राज्यसभा सदस्य बनकर पूरा करना चाहते हैं।
पार्टी के अंदर इस फैसले को लेकर जबरदस्त नाराजगी है। जदयू कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के पास जाने से पुलिस द्वारा रोक दिये जाने पर पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ कर अपना गुस्सा जताया। वे इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि उनके नेता, जिन्हें दिवंगत सुशील कुमार मोदी समेत बीजेपी के कुछ प्रशंसक कभी प्रधानमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार मानते थे, इस तरह का अपमानजनक प्रस्थान स्वीकार कर सकते हैं।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



